Archive | फ़रवरी 2013

पत्रकारों से आम आदमी की अपेक्षा

प्रेस परिषद के रिपोर्ट के बाद बिहार और बिहार के बाहर काटजू सुर्खियों में है– बिहार में मीडिया के स्वतंत्रता को लेकर विरोध मार्च हो रहे हैं। सोशलसाईट से लेकर चौक चौराहे तक मीडिया और मीडियामैंन पर बहस छिड़ी हुई है ।हर कोई अपने अपने तरीके से परिषद के रिपोर्ट का विशलेषण कर रहे हैं। लेकिन इन सब के बीच पत्रकारिता पर कही कोई चर्चा नही हो रही है। फोकस में सिर्फ और सिर्फ नीतीश और नीतीश के इशारे पर नाचते मीडिया की चर्चा हो रही है मैं भी उस विवाद में पड़ गया था लेकिन आज मुझे लगा कि कहां बूरे फस गये थे अपना काम छोड़ कर वहां ऐसा कि आज सुबह मेरे ससुराल से फोन आया फोन उठाये तो मेरे साले जी पत्नी लाईन पर थी सीधा सवाल था उनका 20 और 21 फरवरी को बिहार बंद है उसका प्रभाव इंटर के परीक्षा पर भी पड़ेगा क्या परिक्षाये रद्द तो नही हो गयी मैंने कहा नही अभी तक तो कोई सूचना नही है फिर वो बोली अखबार में भी इसको लेकर कुछ भी नही छपा है मैने कहा आज बात करके शाम में बता देगे।फिर बच्चो को छोड़ने स्कूल चला गया लौटने के दौरान फिर से देखते हैं ससुराल वालो का ही फोन है साली महोदया, लाईन पर थी हलाकि उनके फोन करने का यह वक्त नही था। मुझे लगा क्या हुआ भाई चलते चलते बाईक पर फोन उठा लिया और क्या सब ठिक है अरे उनके बांस आने वाले हैं 20 और 21 को किसी चीज का बंद है क्या मैंने कहा है ट्रेड यूनियन का 20 और 21 फरवरी को भारत बंद है। और इसका प्रभाव भी पड़ेगा खास करके हवाई और रेल मार्ग पर इसका असर पड़ सकता है इसी को लेकर कल रात प्रधानमंत्री ने ट्रेड यूनियन के नेता से हड़ताल वापल लेने का आग्रह किया है चलिए पहले उनको बता देते है फिर बात करते हैं।घर पहुंचने के बाद मैंने कांल किया उन्होने बतायी सामने तीन अखबार है कसी में भी इसको लेकर कोई खबर नही है। खबर है तो आशाराम बापू की आप पत्रकारो को तो देश निकाला दे देना चाहिए क्या तरीका है पाठक को आप समान्य सी जानकारी भी नही दे सकते अभी सोच रहे थे गूंगल सर्च करे लेकिन फिर लगा मुझे आपके पास जानकारी हो सकती है।ये साली जी हमारे टीचर भी है चैनल पर लाईफ चल रहा हो या फिर फोनिंग या फिर मेरी खबरों की सबसे बड़ी भ्यूर हैं।खबर खत्म होते ही इनका फोन या फिर मैंसेज जरुर आता है क्या सुधार करना है या फिर क्या इस खबर में औऱ क्या हो सकता है-वही फेसबूक पर भी हमारे हर पोस्ट पर इनकी पैंनी नजर रहती है और कभी मैं इनका बुद्धू तो कभी छलिया तो कभी दिवाना रहता हूं अरे इनके बारे में बताते बताते मैं मुद्धा से ही भटक गया था।पत्रकार मित्रों ये पाठक है और एक संवेदनशील पाठक हैं एक पाठक की अपेक्षाओ पर हमलोग कहां तक खड़े उतर रहे है जरा सोचिए शायद इस तरह की खबरे लिखने पर नीतीश जी की और से मनाही नही होनी चाहिए इसको हमलोग जगह दे सकते हैं कहने का मतलब यह है कि हमलोग पाठक को आम सूचना भी दे पाने में विफल रह रहे है और लोगो में गुस्सा इसी बात को लेकर है।

____________________________________साभार —-> रंजू संतोष कि कलम से _____

Advertisements

मीडिया और अभिव्यक्ति

मित्रों ये मोबाईल भी गजब की चीज है जहां तक आप सोच नही सकते मोबाईल वहां भी दस्तक देने से बाज नही आता है। आज सुबह मुख्यमंत्री के कार्यक्रम में जाने की जल्दी में बिस्तर से उठने के साथ ही भाग दौर शुरु हो गया इसी दौरान हमारे एक खास मित्र का फोन आया हाई हेलो हुआ और फिर मैं रात में बात करने की बात कर फोन रखने लगे। लेकिन मित्र इतने से शांत होने वाले नही थे। बात शुरु हुई प्रेस परिषद के रिपोर्ट और उसके बाद पटना की सड़कों पर निकले जुलुस को लेकर मैंने सीधा पल्ला झाड़ लिया भाई उस जुलुस में मुझे भी जाना था लेकिन निकलते वक्त एक फेसबूक फ्रेंड दिल्ली से आये इसी से नही जा सका ।उन्होने कहा बढिया है आपके मित्र ने गलत काम करने से रोक दिया मैंने कहा ऐसा क्या है। जिस समय जुलुस डाकबंगला से गुजर रहा था उस वक्त मैं भी डाकबंगला पर ही था। अरे यार तुम पटना में हो नही दिल्ली पहुंच गया सौभाग्यशाली था जो मैं उस मार्च को देख सका खोज रहा था तुम्हे उस जुलुस में लेकिन मुझे पूरा विश्वास था की तुम नही होगे ।क्या मजाक है सबसे आगे नवल किशोर चौधरी बैनर लिए बढ रहे थे मुझे बड़ी हस्सी आयी नवल किशोर चौधरी तो मीडिया के आईकोन बने हुए है जब भी नीतीश के सरकार पर प्रहार करना हो सारे चैनल पर चौधरी जी लगभग रोजाना मौजूद रहते हैं। फिर दिखे बीबीसी वाले मणीकांत ठाकुर जी क्या बात है पिछले सात वर्षो को उनकी स्टोरी निकला लो उनकी हर स्टोरी में नीतीश की ऐसी की तैसी किये रहते हैं हाल में भी शिक्षा से जुड़ी योजनाओ के खोटाले पर खबरे लिखे हैं। एक था जो कोई आईएस आईपीएस का पोटल चलाता है नौकशाही की बात कर रहे हो क्या—हा हा देखते है तुम बड़े प्रभावित रहते हो ।उनका सारा पोस्ट पढते है वो क्या लिखते है इसकी समझ मुझे भी है अधिकारियो के चूचलेबाजी के अलावा रहता क्या है और चले है मीडिया के फ्रिंडम की बात करने क्यो नही लिखते हैं यहां के भ्रष्ट अधिकारियो के बारे में कैसे थाने की बोली लगायी जाती है क्यो नही लिखते हैं कौन उनको रोक रखा है।और मीडिया का मतलब सिर्फ अखबार ही नही होता है क्या जरा पुछिए बंदर के हाथ में बिहार लिखने वाले पत्रकार का क्या हुआ जरा पुंछिए ना खबर के काऱण टाईम्स आंफ इंडिया के सम्पादक पर कार्यलय से निकलते वक्त गोली मारी गयी थी। पुछुए मीडिया के इन रहनुमाओ से क्या हाल था लालू राबड़ी के 15 वर्षो के कार्यकाल में कितने पत्रकार पीटे गये इन रहनुमाओ को आज याद नही होगा ।उस वक्त भी यहां के बड़े अखबार लालू के खिलाफ खबर लिखने से बचते थे।रही बात प्रेस परिषद के रिपोर्ट का तो मीडिया का मतलब बिहार में सिर्फ अखबार ही है क्या — भिजुउल मीडिया तो हर वक्त नीतीश की बैंड बजाता रहता है क्या वह मीडिया नही है।जरा इन रहनुमाओ से पुछिए ब्रमेश्वर मुखिया से शव यात्रा के दौरान एक अखबार ने लिखा था (गो बेंक अभ्यानंद गो बेंक) ये खबर किसी लंदन के अखबार ने नही छापी थी।इस मसले पर खुली बहस होनी चाहिए नेता का बयान कहा छपता है यह प्रबंधन तय करता है इसमें किसी पत्रकार की कोई भूमिका नही होती है और जिसे बिहार की जनता ने ही नकार दिया है उसे मीडिया कितने दिनों तक छापते चलेगा। और फिर अपने राज में मीडिया को कभी ब्रह्ममणवादी तो कभी सर्वणवादी कह कर गाली देने वाले महाश्य किसी मीडिया वाले से सम्बन्ध भी बना कर नही रखे कौन उनकी वकालत करेगा। और सुनो संतोष उस प्रतिरोध मार्च में भी वही अधिकांश लोग थे जो कभी मीडिया को पानी पी पीकर गाली दे रहे थे। सूनते सूनते मेरा कान पक गया था मैंने कहा बस कर यार अब रात में बात करते हैं। लेकिन हल्के अंदाज में ही इसने जो कह दिया वह साचने वाली बात तो जरुर है और आप भी गौर करिए और अगर आपके पास वर्तमान सरकार के खिलाफ कोई वैसी खबर है तो भेजिए छापने और दिखाने वाले वीर पुरुष बिहार में अभी भी मौंजूद है लेकिन सीधे सीधे मीडिया पर सवाल खड़े करने से बाज आये।

साभार ————–रंजू संतोष कि कलम से ———-

बिहार में प्रिंट मीडिया….

“बिके हुए अखबारों को खरीदना बंद करो”

क्या दुर्भाग्य है कि आज मां सरस्वती की पूजा का दिन है, लेकिन हमें चर्चा यह करनी पड़ रही है कि बिहार में मां सरस्वती के अखबारों में काम करने वाले बेटे-बेटियों के लिखने की आज़ादी जेपी के उन चेलों ने ही अखबार-मालिको को विज्ञापन की घूस खिलाकर खरीद ली है, जो इमरजेंसी का विरोध करके सियासत में पैदा हुए थे।

अगर सचमुच आत्मा जैसी किसी चीज़ का अस्तित्व होता होगा, तो आज निश्चित रूप से लोकनायक की आत्मा कलप रही होगी कि किस तरह के फ़र्ज़ी लोगों को उन्होंने सियासत की ज़मीन मुहैया कराई। अभिव्यक्ति की आज़ादी के लिए लड़ने का ढोंग करने वालों ने पहला मौका मिलते ही अभिव्यक्ति की आज़ादी का गला घोंटा।

तानाशाही का विरोध करने वाले ज़्यादा बड़े तानाशाह निकले। इमरजेंसी का विरोध करने वालों ने अपनी सरहद में अघोषित इमरजेंसी लगा दी। सादगी की सियासत करने वालों में आत्म-प्रचार की इतनी भूख होगी कि उसे हर रोज़ अपने राज्य में छपने वाले सभी अखबारों के पहले पन्ने पर अपनी बड़ी-सी फोटो और गुणगान चाहिए- यह कल्पना से भी परे था।

इस दुनिया में बहुत सारे लोग लंबे समय तक यह समझने की कोशिश करते रहे कि आइंस्टीन के दिमाग में क्या था, लेकिन हम उस नेता का दिमाग समझना चाहते हैं, जिसने अपनी ही सत्ता रहते हुए राजधानी की सड़कों पर होर्डिंग्स लगवाकर एलान कर दिया कि मैं बिहार हूं। उसे यह भी याद नहीं रहा कि बिहार में साढ़े दस करोड़ लोग और भी हैं। कोई एक व्यक्ति राष्ट्र या राज्य नहीं हुआ करता।

हमें अफसोस है कि जब नेताजी ने राज्य के प्रिंट मीडिया को पूरी तरह ग्रिप में ले लिया, तब उन्हें इलेक्ट्रॉनिक मीडिया की ग्रोथ भी खटकने लगी। जिस भाषण में उन्होंने राष्ट्रपिता महात्मा गांधी की खिल्ली उड़ाने वाले शराब-कारोबारी का जमकर प्रशस्ति-गान किया, उसी भाषण में उन्होंने इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के तथाकथित ग्रोथ का मखौल उड़ाया।

हद तो तब हो गई, जब वो चाहते थे कि उनकी और डीजीपी की मौजूदगी में आपराधिक इतिहास वाले एक विधायक-पति द्वारा कार्बाइन लहराने और आम लोगों पर लाठियां बरसाने की तस्वीरें राज्य का इलेक्ट्रॉनिक मीडिया नहीं दिखाए। इसके लिए उनके प्रवक्ता ने इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के ख़िलाफ़ जमकर अपनी भड़ास निकाली।

दुर्भाग्यपूर्ण है, शर्मनाक है, पर सच है कि राज्य में प्रिंट मीडिया पूरी तरह सत्ता की दलाली करने में जुटा हुआ है। हम तो अब तक यही समझते थे कि चाहे नेता हो या पत्रकार, चाहे सरकार हो या अखबार- किसी लोकतंत्र में उसकी प्रथम और अंतिम जवाबदेही जनता के ही प्रति होती है। लेकिन यह क्या? यहां तो अखबार सरकार के प्रति जवाबदेह हैं।

मीडिया घरानों और सरकार के नेक्सस में जनता की आवाज़ कहीं गुम-सी हो गई है। जनता के ही पैसे ख़र्च करके जनता को ज़रूरी सूचनाओं, जानकारियों और ख़बरों से वंचित रखा जा रहा है। जन-आंदोलनों की आवाज़ दबाई जा रही है। राज्य में पुलिसिया बर्बरता बेइंतहां बढ़ गई है। मौत बांटने वाली शराब का धंधा बड़े-बड़े लोगों के संरक्षण में फल-फूल रहा है।

अब अपराधी ही नहीं, पुलिस वाले भी रंगदारी मांगते हैं। राज्य में शिक्षा और स्वास्थ्य व्यवस्था ध्वस्त हो चुकी है। हाथों में पत्थर लेकर बच्चे भी सड़कों पर हैं, हाथों में चप्पलें लेकर शिक्षक भी सड़कों पर हैं। इन सबके बीच भग्नावशेषों से बदतरहाल उनके स्कूल अपनी किस्मत को कोस रहे हैं। राज्य के सरकारी अस्पतालों में प्राइवेट नर्सिंग होम्स ने दलाल फिट कर रखे हैं। प्रतिरोध हो, तो पीएमसीएच जैसे अस्पताल में गोलियां चल जाती हैं। मरीज़ की जान की परवाह किसी को नहीं, लेकिन उसकी जेब पर सबकी निगाहें हैं।

सात साल में एक यूनिट बिजली नहीं बनी। एक गांव में पीने का साफ़ पानी नहीं पहुंचाया जा सका। भ्रष्टाचार का देश का सबसे ऊंचा पहाड़ पटना में खड़ा हो गया है। ग़रीब जनता कराहती हुई पूछ रही है कि इंसाफ़ किस चिड़िया का नाम है, कम से कम उसकी फोटो ही दिखा दो। मां-बहनों के साथ बलात्कार हो जाए, तो यह राज्य उसे इंसाफ़ दिलाने के लिए नहीं, मामला दबाने के लिए काम करता है।

फिर भी कहिए कि बिहार में सब चकाचक है। अखबारों के पन्नों पर संपूर्ण सुशासन है और सत्तासीनों के कंठ में लच्छेदार भाषण है। पिछले टर्म में केंद्र के पैसे से कुछ सड़कें बन गईं और कुछ लड़कियों को साइकिलें बांट दी गईं। अब बिहार को कुछ और नहीं चाहिए। क्रेडिट भी मिल गया। दोबारा सत्ता भी मिल गई। अब मीडिया से अपेक्षा यह है कि हमारी लूट-खसोट पर अपना मुंह बंद रखो।

अंग्रेज़ों की फूट डालो और राज करो वाली नीति यहां भी एप्लाई की गई। बिहार में बेहद चालाकी से प्रिंट मीडिया और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया की एकता तोड़ दी गई। आज दोनों दो ध्रुव की तरह दिखाई देते हैं। किसी इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के पत्रकार के साथ कुछ हो जाए, तो बिहार का प्रिंट मीडिया नहीं बोलेगा। उस वक्त न वो पत्रकार का, न बिहार का, बल्कि सरकार का हित देखेगा।

इसके बावजूद हम यही कहेंगे कि कसूर प्रिंट के पत्रकारों का नहीं, सरकार का है और मीडिया घरानों का है। दोनों के नेक्सस में बेचारा पत्रकार पिस रहा है, डरा हुआ है, लाचार है। उसका भी परिवार है। उसके भी बीवी-बच्चे हैं। क्या करेगा वह? अपनी नौकरी बचाए या क्रांति करे? उसकी इसी मजबूरी और डर का फ़ायदा यह नापाक गठजोड़ उठा रहा है।

और ये बेचारे काटजू साहब बिहार के अखबारों को सेंसरशिप से क्या मुक्त कराएंगे, ख़ुद उन्हीं की ख़बर को यहां के अखबारों ने सेंसर कर दिया। हालत यह हो गई कि काटजू की जांच टीम की रिपोर्ट से जुड़ी ख़बर तक सरकारी विज्ञापन की घूस खाने वाले बिहार के बड़े अखबारों ने नहीं छापी। जहां इतनी गुलामी हो, वहां आज़ादी की लड़ाई लड़ने के लिए कौन आगे आएगा?

ऐसे में अगर प्रिंट मीडिया के हमारे भाई-बहन अपनी ही लड़ाई के लिए आगे नहीं आ रहे, तो हम उनका डर भी समझते हैं और मजबूरी भी। किडनैप हुए किसी व्यक्ति से यह उम्मीद नहीं की जा सकती कि वह किडनैपर से लड़े, इसलिए अभी उनकी यह लड़ाई हमें ही शुरू करनी होगी, पर एक दिन जब किडनैपर के किले में छेद हो जाएगा, तब हमें यकीन है कि उनका भी हौसला बढ़ेगा। वो भी दहाड़ेंगे और किडनैपर की सारी हेकड़ी भुला देंगे।

फिलहाल इस लड़ाई में बिहार की क्रांतिधर्मी जनता का समर्थन सबसे ज़्यादा ज़रूरी है। उनके भीतर से आवाज़ें उठनी चाहिए। अपनी सरकार से उन्हें सवाल पूछने चाहिए। अपने जनप्रतिनिधियों का घेराव करना चाहिए। अगर वह मानते हैं कि वे बिके हुए अखबारों को खरीद रहे हैं, तो उन्हें खरीदना तत्काल बंद कर देना चाहिए।

सड़कों पर उतरकर उन अखबारों को जला देना चाहिए, जिन अखबारों का एक-एक शब्द बिका हुआ है। जिन अखबारों में पत्रकारों की सच्चाई की स्याही नहीं, मजबूरी का ख़ून छपा हुआ है, उन अखबारों को ख़रीदकर उनका धंधा चमकाना बंद करना चाहिए। बिहार में स्वतंत्र पत्रकारिता का परचम बुलंद हो और पत्रकारों को आज़ादी मिले- इसके लिए यह बेहद ज़रूरी है।

यह होगा- तभी मीडिया घरानों को यह संदेश जाएगा कि सरकार के साथ मिलकर जो नापाक गठजोड़ उन्होंने बनाया है, उसकी वजह से पाठक उनके अखबार से नफरत करने लगे हैं। और सरकार को भी इतनी अकल आ जाएगी कि जैसे चुनाव-पूर्व मनपसंद सर्वेक्षण कराकर चुनाव नहीं जीते जाते, वैसे ही अखबारों में फ़र्ज़ी रिपोर्ट छपवाकर न सुशासन लाया जाता है, न जनता का दिल जीता जाता है।

इसलिए हमारी आज की आखिरी पंक्ति यही होगी कि बिहार और देश के कलम के सिपाहियो एक हो। ये लोग ज़मी बेच देंगे, गगन बेच देंगे। कली बेच देंगे, चमन बेच देंगे। कलम के सिपाही अगर सो गए तो, वतन के ये मसीहा वतन बेच देंगे। जय कलम। जय हिन्द।

…………………………………………………………………………अभिरंजन कुमार कि कलम से..

श्रद्धांजलि

साथियों,

“गम का खज़ाना तेरा भी है मेरा भी…”
आज मेरे साहेब- जगजीत सिंह साहेब जी कि जयंती है, न मेरी कुवत है न मेरी कलम में इतना जादू कि अपनी भावनाओं को शब्दों में पिरो कर कुछ कह सकूँ… लेकिन कुछ नहीं कहा तो फिर किया क्या. साहेब के नगमों के चंद लाईनों को आपके सामने रख रहा हूँ…

साहेब… चिठ्ठी न कोई सन्देश, जाने वो कौन सा देश जहाँ तुम चले गए…
साहेब.. चाक जिगर के सी लेते हैं.. जैसे भी हो जी लेते हैं…
साहेब.. रंज और गम कि बस्ती का मैं बासिन्दा हूँ.. ये तो बस मैं हूँ कि इस हाल में भी जिंदा हूँ..
साहेब.. शाम से आँख में नमी सी है.. आज फिर आपकी कमी सी है..
साहेब.. किसका चेहरा मैं देखूं.. तेरा चेहरा देख कर..
साहेब.. तुम को देखा तो ये ख्याल आया.. ज़िन्दगी धूप.. तुम घना साया..
साहेब.. अपने होठों पर सजाना चाहता हूँ.. आज फिर तुम्हे गुनगुनाना चाहता हूँ..
साहेब.. हजारों ख्वाशियें ऐसी कि हर ख्वाहिश पर दम निकले, बहुत निकले मेरे अरमान, लेकिन फिर भी कम निकले
साहेब.. होश वालों को खबर क्या बेखुदी क्या चीज़ है..आपको सुनिए फिर समझिये जिंदगी क्या चीज़ है..
साहेब.. मैंनू तेरा शवाब ले बैठा.. मैंनू जद भी तुस्सी हो याद आये.. दिन दिहारे शराब ले बैठा..
साहेब.. झुकी-झुकी सी नज़र बेक़रार आज भी है..
साहेब.. किसी नज़र को तेरा इंतज़ार आज भी है..
साहेब.. होठों से छू लो तुम मेरा गीत अमर कर दो..
साहेब.. दुनिया जिसे कहते हैं.. मिट्टी का खिलौना है..
साहेब.. तेरा चेहरा कितना सुहाना लगता है.. तेरे आगे चाँद पुराना लगता है..
साहेब.. कल चौदवीं कि रात थी.. शब्-भर रहा चर्चा तेरा..
साहेब.. कैसे-कैसे हादसे सहते रहे.. फिर भी हम हसतें रहें.. जीते रहें..
साहेब.. ये दौलत भी ले लो..ये शोहरत भी ले लो.. भले छीन लो मुझ से मेरी जवानी.. मगर फिर कुछ सुनाओ आप अपनी जुबानी..
साहेब.. “क्या भूलूं क्या याद करूं..”

बात निकली है तो दूर तलक जाएगी..

………………………………………………………………………………………….प्रभात रंजन झा

बिहार का विकाश

जब बात होती है बिहार में परिवर्तन की तो हम उत्साह के साथ यह कहते हैं कि हाँ बिहार बदल रहा है. सही बात है परिवर्तन कि जो लहर हम अभी देख रहे हैं वह सराहनीय है.. लेकिन यहाँ कुछ बातें विचार योग्य भी है, मसलन कि जिस रफ़्तार से परिवर्तन हो रहा है क्या यही सही है? क्योंकि जब मुख्य मंत्री खुद ही यह स्वीकार करते हैं कि अभी बिहार को औसत राष्ट्रीय स्तर पर पहुँचने के लिए ३५ वर्ष लगेंगे. विचारनीय विषय यह है कि अगर हम निरंतर इसी गति से विकाश करते हैं तो क्या राष्ट्रीय विकाश के स्तर के आस-पास पहुंचेंगे भी? क्योंकि जिस गति से राष्ट्रीय विकाश हो रहा है उस गति से हमारा विकाश तो होता नहीं दिख रहा है . ३५ क्या ३५० वर्षों में भी यह संभव नहीं हो पायेगा.

दूसरी आवश्यक बात जो अत्यंत जीवंत है वो है विकाश और भ्रटाचार के बीच का समानुपाती औसत. हम निरंतर विकाश कर हैं लेकिन भ्रष्टाचार भी उसी तेजी से हमारे बीच अपनी पैठ बना रहा है. सरकारी ऑफिश में काम तो हो रहा है लेकिन बिना पैसे के कुछ भी नहीं. आज ईमानदारी कि परिभाषा यह है कि जो आपके दिए पैसों पर आपका काम बिना हिल-हुज्ज़त के कर दे वो इमानदार और जो अधिक मांगे वो भ्रष्ट. क्या ये सही है? मुद्दा विचारनीय है..

नरेगा, इंदिरा आवास योजना, सरक निर्माण विभाग, स्वास्थ्य योजना, शिक्षा संस्थान या फिर राज्य सरकार द्वारा संचालित किसी भी योजना में भ्रष्ट लोगों ने सेंध लगा रखी है और उसके समुचित दोहन कर रहें हैं. सवाल ये है कि अगर आम आदमी इससे त्रस्त है और इसके बारे में जानता है तो क्या सरकार अनजान है? या फिर ये माना जाये कि सरकार ने इसकी मौन स्वीकृति दे रखी है.. पुलिस महकमे के बारे में कुछ नहीं कहा जाए तो ही अच्छा है…

पंडित नेहरु ने कहा था कि सरकारें लोक-कल्याणकारी होनी चाहिए.. लेकिन अगर लोक कल्याण  कि ये ही परिभाषा है तो ये सरासर गलत है. लेकिन आम आदमी करे क्या.. वो तो दो समय का खाना जुटाने में ही सारी उर्जा खपा देता है तो और बातों के लिए समय कहाँ से निकाले..

हे बिहार के निति-नियंताओं कृपा कर इन विषयों पर भी कभी-कभी सोंचा करिए.. हम आम जनता आपकी ओर आशा कि दृष्टि से देखते हैं..

धन्यवाद्

………………………………………………………………………………………………….प्रभात रंजन झा

परिचय

निर्भीक सोंच.. बेबाक अंदाज़… दैनिक भारत…..
सम-सामयिक विषयों पर विस्तृत विवरण

स्नेह भरा आमंत्रण मेहमान स्तंभकार बंधुओं को..

अपनी रचनाओं को प्रेषित करें हमारे न्यूज़ साईट  पर….

dainikbharatnews@gmail.com

This entry was posted on फ़रवरी 4, 2013, in Home.