बिहार का विकाश

जब बात होती है बिहार में परिवर्तन की तो हम उत्साह के साथ यह कहते हैं कि हाँ बिहार बदल रहा है. सही बात है परिवर्तन कि जो लहर हम अभी देख रहे हैं वह सराहनीय है.. लेकिन यहाँ कुछ बातें विचार योग्य भी है, मसलन कि जिस रफ़्तार से परिवर्तन हो रहा है क्या यही सही है? क्योंकि जब मुख्य मंत्री खुद ही यह स्वीकार करते हैं कि अभी बिहार को औसत राष्ट्रीय स्तर पर पहुँचने के लिए ३५ वर्ष लगेंगे. विचारनीय विषय यह है कि अगर हम निरंतर इसी गति से विकाश करते हैं तो क्या राष्ट्रीय विकाश के स्तर के आस-पास पहुंचेंगे भी? क्योंकि जिस गति से राष्ट्रीय विकाश हो रहा है उस गति से हमारा विकाश तो होता नहीं दिख रहा है . ३५ क्या ३५० वर्षों में भी यह संभव नहीं हो पायेगा.

दूसरी आवश्यक बात जो अत्यंत जीवंत है वो है विकाश और भ्रटाचार के बीच का समानुपाती औसत. हम निरंतर विकाश कर हैं लेकिन भ्रष्टाचार भी उसी तेजी से हमारे बीच अपनी पैठ बना रहा है. सरकारी ऑफिश में काम तो हो रहा है लेकिन बिना पैसे के कुछ भी नहीं. आज ईमानदारी कि परिभाषा यह है कि जो आपके दिए पैसों पर आपका काम बिना हिल-हुज्ज़त के कर दे वो इमानदार और जो अधिक मांगे वो भ्रष्ट. क्या ये सही है? मुद्दा विचारनीय है..

नरेगा, इंदिरा आवास योजना, सरक निर्माण विभाग, स्वास्थ्य योजना, शिक्षा संस्थान या फिर राज्य सरकार द्वारा संचालित किसी भी योजना में भ्रष्ट लोगों ने सेंध लगा रखी है और उसके समुचित दोहन कर रहें हैं. सवाल ये है कि अगर आम आदमी इससे त्रस्त है और इसके बारे में जानता है तो क्या सरकार अनजान है? या फिर ये माना जाये कि सरकार ने इसकी मौन स्वीकृति दे रखी है.. पुलिस महकमे के बारे में कुछ नहीं कहा जाए तो ही अच्छा है…

पंडित नेहरु ने कहा था कि सरकारें लोक-कल्याणकारी होनी चाहिए.. लेकिन अगर लोक कल्याण  कि ये ही परिभाषा है तो ये सरासर गलत है. लेकिन आम आदमी करे क्या.. वो तो दो समय का खाना जुटाने में ही सारी उर्जा खपा देता है तो और बातों के लिए समय कहाँ से निकाले..

हे बिहार के निति-नियंताओं कृपा कर इन विषयों पर भी कभी-कभी सोंचा करिए.. हम आम जनता आपकी ओर आशा कि दृष्टि से देखते हैं..

धन्यवाद्

………………………………………………………………………………………………….प्रभात रंजन झा

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