बिहार में प्रिंट मीडिया….

“बिके हुए अखबारों को खरीदना बंद करो”

क्या दुर्भाग्य है कि आज मां सरस्वती की पूजा का दिन है, लेकिन हमें चर्चा यह करनी पड़ रही है कि बिहार में मां सरस्वती के अखबारों में काम करने वाले बेटे-बेटियों के लिखने की आज़ादी जेपी के उन चेलों ने ही अखबार-मालिको को विज्ञापन की घूस खिलाकर खरीद ली है, जो इमरजेंसी का विरोध करके सियासत में पैदा हुए थे।

अगर सचमुच आत्मा जैसी किसी चीज़ का अस्तित्व होता होगा, तो आज निश्चित रूप से लोकनायक की आत्मा कलप रही होगी कि किस तरह के फ़र्ज़ी लोगों को उन्होंने सियासत की ज़मीन मुहैया कराई। अभिव्यक्ति की आज़ादी के लिए लड़ने का ढोंग करने वालों ने पहला मौका मिलते ही अभिव्यक्ति की आज़ादी का गला घोंटा।

तानाशाही का विरोध करने वाले ज़्यादा बड़े तानाशाह निकले। इमरजेंसी का विरोध करने वालों ने अपनी सरहद में अघोषित इमरजेंसी लगा दी। सादगी की सियासत करने वालों में आत्म-प्रचार की इतनी भूख होगी कि उसे हर रोज़ अपने राज्य में छपने वाले सभी अखबारों के पहले पन्ने पर अपनी बड़ी-सी फोटो और गुणगान चाहिए- यह कल्पना से भी परे था।

इस दुनिया में बहुत सारे लोग लंबे समय तक यह समझने की कोशिश करते रहे कि आइंस्टीन के दिमाग में क्या था, लेकिन हम उस नेता का दिमाग समझना चाहते हैं, जिसने अपनी ही सत्ता रहते हुए राजधानी की सड़कों पर होर्डिंग्स लगवाकर एलान कर दिया कि मैं बिहार हूं। उसे यह भी याद नहीं रहा कि बिहार में साढ़े दस करोड़ लोग और भी हैं। कोई एक व्यक्ति राष्ट्र या राज्य नहीं हुआ करता।

हमें अफसोस है कि जब नेताजी ने राज्य के प्रिंट मीडिया को पूरी तरह ग्रिप में ले लिया, तब उन्हें इलेक्ट्रॉनिक मीडिया की ग्रोथ भी खटकने लगी। जिस भाषण में उन्होंने राष्ट्रपिता महात्मा गांधी की खिल्ली उड़ाने वाले शराब-कारोबारी का जमकर प्रशस्ति-गान किया, उसी भाषण में उन्होंने इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के तथाकथित ग्रोथ का मखौल उड़ाया।

हद तो तब हो गई, जब वो चाहते थे कि उनकी और डीजीपी की मौजूदगी में आपराधिक इतिहास वाले एक विधायक-पति द्वारा कार्बाइन लहराने और आम लोगों पर लाठियां बरसाने की तस्वीरें राज्य का इलेक्ट्रॉनिक मीडिया नहीं दिखाए। इसके लिए उनके प्रवक्ता ने इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के ख़िलाफ़ जमकर अपनी भड़ास निकाली।

दुर्भाग्यपूर्ण है, शर्मनाक है, पर सच है कि राज्य में प्रिंट मीडिया पूरी तरह सत्ता की दलाली करने में जुटा हुआ है। हम तो अब तक यही समझते थे कि चाहे नेता हो या पत्रकार, चाहे सरकार हो या अखबार- किसी लोकतंत्र में उसकी प्रथम और अंतिम जवाबदेही जनता के ही प्रति होती है। लेकिन यह क्या? यहां तो अखबार सरकार के प्रति जवाबदेह हैं।

मीडिया घरानों और सरकार के नेक्सस में जनता की आवाज़ कहीं गुम-सी हो गई है। जनता के ही पैसे ख़र्च करके जनता को ज़रूरी सूचनाओं, जानकारियों और ख़बरों से वंचित रखा जा रहा है। जन-आंदोलनों की आवाज़ दबाई जा रही है। राज्य में पुलिसिया बर्बरता बेइंतहां बढ़ गई है। मौत बांटने वाली शराब का धंधा बड़े-बड़े लोगों के संरक्षण में फल-फूल रहा है।

अब अपराधी ही नहीं, पुलिस वाले भी रंगदारी मांगते हैं। राज्य में शिक्षा और स्वास्थ्य व्यवस्था ध्वस्त हो चुकी है। हाथों में पत्थर लेकर बच्चे भी सड़कों पर हैं, हाथों में चप्पलें लेकर शिक्षक भी सड़कों पर हैं। इन सबके बीच भग्नावशेषों से बदतरहाल उनके स्कूल अपनी किस्मत को कोस रहे हैं। राज्य के सरकारी अस्पतालों में प्राइवेट नर्सिंग होम्स ने दलाल फिट कर रखे हैं। प्रतिरोध हो, तो पीएमसीएच जैसे अस्पताल में गोलियां चल जाती हैं। मरीज़ की जान की परवाह किसी को नहीं, लेकिन उसकी जेब पर सबकी निगाहें हैं।

सात साल में एक यूनिट बिजली नहीं बनी। एक गांव में पीने का साफ़ पानी नहीं पहुंचाया जा सका। भ्रष्टाचार का देश का सबसे ऊंचा पहाड़ पटना में खड़ा हो गया है। ग़रीब जनता कराहती हुई पूछ रही है कि इंसाफ़ किस चिड़िया का नाम है, कम से कम उसकी फोटो ही दिखा दो। मां-बहनों के साथ बलात्कार हो जाए, तो यह राज्य उसे इंसाफ़ दिलाने के लिए नहीं, मामला दबाने के लिए काम करता है।

फिर भी कहिए कि बिहार में सब चकाचक है। अखबारों के पन्नों पर संपूर्ण सुशासन है और सत्तासीनों के कंठ में लच्छेदार भाषण है। पिछले टर्म में केंद्र के पैसे से कुछ सड़कें बन गईं और कुछ लड़कियों को साइकिलें बांट दी गईं। अब बिहार को कुछ और नहीं चाहिए। क्रेडिट भी मिल गया। दोबारा सत्ता भी मिल गई। अब मीडिया से अपेक्षा यह है कि हमारी लूट-खसोट पर अपना मुंह बंद रखो।

अंग्रेज़ों की फूट डालो और राज करो वाली नीति यहां भी एप्लाई की गई। बिहार में बेहद चालाकी से प्रिंट मीडिया और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया की एकता तोड़ दी गई। आज दोनों दो ध्रुव की तरह दिखाई देते हैं। किसी इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के पत्रकार के साथ कुछ हो जाए, तो बिहार का प्रिंट मीडिया नहीं बोलेगा। उस वक्त न वो पत्रकार का, न बिहार का, बल्कि सरकार का हित देखेगा।

इसके बावजूद हम यही कहेंगे कि कसूर प्रिंट के पत्रकारों का नहीं, सरकार का है और मीडिया घरानों का है। दोनों के नेक्सस में बेचारा पत्रकार पिस रहा है, डरा हुआ है, लाचार है। उसका भी परिवार है। उसके भी बीवी-बच्चे हैं। क्या करेगा वह? अपनी नौकरी बचाए या क्रांति करे? उसकी इसी मजबूरी और डर का फ़ायदा यह नापाक गठजोड़ उठा रहा है।

और ये बेचारे काटजू साहब बिहार के अखबारों को सेंसरशिप से क्या मुक्त कराएंगे, ख़ुद उन्हीं की ख़बर को यहां के अखबारों ने सेंसर कर दिया। हालत यह हो गई कि काटजू की जांच टीम की रिपोर्ट से जुड़ी ख़बर तक सरकारी विज्ञापन की घूस खाने वाले बिहार के बड़े अखबारों ने नहीं छापी। जहां इतनी गुलामी हो, वहां आज़ादी की लड़ाई लड़ने के लिए कौन आगे आएगा?

ऐसे में अगर प्रिंट मीडिया के हमारे भाई-बहन अपनी ही लड़ाई के लिए आगे नहीं आ रहे, तो हम उनका डर भी समझते हैं और मजबूरी भी। किडनैप हुए किसी व्यक्ति से यह उम्मीद नहीं की जा सकती कि वह किडनैपर से लड़े, इसलिए अभी उनकी यह लड़ाई हमें ही शुरू करनी होगी, पर एक दिन जब किडनैपर के किले में छेद हो जाएगा, तब हमें यकीन है कि उनका भी हौसला बढ़ेगा। वो भी दहाड़ेंगे और किडनैपर की सारी हेकड़ी भुला देंगे।

फिलहाल इस लड़ाई में बिहार की क्रांतिधर्मी जनता का समर्थन सबसे ज़्यादा ज़रूरी है। उनके भीतर से आवाज़ें उठनी चाहिए। अपनी सरकार से उन्हें सवाल पूछने चाहिए। अपने जनप्रतिनिधियों का घेराव करना चाहिए। अगर वह मानते हैं कि वे बिके हुए अखबारों को खरीद रहे हैं, तो उन्हें खरीदना तत्काल बंद कर देना चाहिए।

सड़कों पर उतरकर उन अखबारों को जला देना चाहिए, जिन अखबारों का एक-एक शब्द बिका हुआ है। जिन अखबारों में पत्रकारों की सच्चाई की स्याही नहीं, मजबूरी का ख़ून छपा हुआ है, उन अखबारों को ख़रीदकर उनका धंधा चमकाना बंद करना चाहिए। बिहार में स्वतंत्र पत्रकारिता का परचम बुलंद हो और पत्रकारों को आज़ादी मिले- इसके लिए यह बेहद ज़रूरी है।

यह होगा- तभी मीडिया घरानों को यह संदेश जाएगा कि सरकार के साथ मिलकर जो नापाक गठजोड़ उन्होंने बनाया है, उसकी वजह से पाठक उनके अखबार से नफरत करने लगे हैं। और सरकार को भी इतनी अकल आ जाएगी कि जैसे चुनाव-पूर्व मनपसंद सर्वेक्षण कराकर चुनाव नहीं जीते जाते, वैसे ही अखबारों में फ़र्ज़ी रिपोर्ट छपवाकर न सुशासन लाया जाता है, न जनता का दिल जीता जाता है।

इसलिए हमारी आज की आखिरी पंक्ति यही होगी कि बिहार और देश के कलम के सिपाहियो एक हो। ये लोग ज़मी बेच देंगे, गगन बेच देंगे। कली बेच देंगे, चमन बेच देंगे। कलम के सिपाही अगर सो गए तो, वतन के ये मसीहा वतन बेच देंगे। जय कलम। जय हिन्द।

…………………………………………………………………………अभिरंजन कुमार कि कलम से..
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