मीडिया और अभिव्यक्ति

मित्रों ये मोबाईल भी गजब की चीज है जहां तक आप सोच नही सकते मोबाईल वहां भी दस्तक देने से बाज नही आता है। आज सुबह मुख्यमंत्री के कार्यक्रम में जाने की जल्दी में बिस्तर से उठने के साथ ही भाग दौर शुरु हो गया इसी दौरान हमारे एक खास मित्र का फोन आया हाई हेलो हुआ और फिर मैं रात में बात करने की बात कर फोन रखने लगे। लेकिन मित्र इतने से शांत होने वाले नही थे। बात शुरु हुई प्रेस परिषद के रिपोर्ट और उसके बाद पटना की सड़कों पर निकले जुलुस को लेकर मैंने सीधा पल्ला झाड़ लिया भाई उस जुलुस में मुझे भी जाना था लेकिन निकलते वक्त एक फेसबूक फ्रेंड दिल्ली से आये इसी से नही जा सका ।उन्होने कहा बढिया है आपके मित्र ने गलत काम करने से रोक दिया मैंने कहा ऐसा क्या है। जिस समय जुलुस डाकबंगला से गुजर रहा था उस वक्त मैं भी डाकबंगला पर ही था। अरे यार तुम पटना में हो नही दिल्ली पहुंच गया सौभाग्यशाली था जो मैं उस मार्च को देख सका खोज रहा था तुम्हे उस जुलुस में लेकिन मुझे पूरा विश्वास था की तुम नही होगे ।क्या मजाक है सबसे आगे नवल किशोर चौधरी बैनर लिए बढ रहे थे मुझे बड़ी हस्सी आयी नवल किशोर चौधरी तो मीडिया के आईकोन बने हुए है जब भी नीतीश के सरकार पर प्रहार करना हो सारे चैनल पर चौधरी जी लगभग रोजाना मौजूद रहते हैं। फिर दिखे बीबीसी वाले मणीकांत ठाकुर जी क्या बात है पिछले सात वर्षो को उनकी स्टोरी निकला लो उनकी हर स्टोरी में नीतीश की ऐसी की तैसी किये रहते हैं हाल में भी शिक्षा से जुड़ी योजनाओ के खोटाले पर खबरे लिखे हैं। एक था जो कोई आईएस आईपीएस का पोटल चलाता है नौकशाही की बात कर रहे हो क्या—हा हा देखते है तुम बड़े प्रभावित रहते हो ।उनका सारा पोस्ट पढते है वो क्या लिखते है इसकी समझ मुझे भी है अधिकारियो के चूचलेबाजी के अलावा रहता क्या है और चले है मीडिया के फ्रिंडम की बात करने क्यो नही लिखते हैं यहां के भ्रष्ट अधिकारियो के बारे में कैसे थाने की बोली लगायी जाती है क्यो नही लिखते हैं कौन उनको रोक रखा है।और मीडिया का मतलब सिर्फ अखबार ही नही होता है क्या जरा पुछिए बंदर के हाथ में बिहार लिखने वाले पत्रकार का क्या हुआ जरा पुंछिए ना खबर के काऱण टाईम्स आंफ इंडिया के सम्पादक पर कार्यलय से निकलते वक्त गोली मारी गयी थी। पुछुए मीडिया के इन रहनुमाओ से क्या हाल था लालू राबड़ी के 15 वर्षो के कार्यकाल में कितने पत्रकार पीटे गये इन रहनुमाओ को आज याद नही होगा ।उस वक्त भी यहां के बड़े अखबार लालू के खिलाफ खबर लिखने से बचते थे।रही बात प्रेस परिषद के रिपोर्ट का तो मीडिया का मतलब बिहार में सिर्फ अखबार ही है क्या — भिजुउल मीडिया तो हर वक्त नीतीश की बैंड बजाता रहता है क्या वह मीडिया नही है।जरा इन रहनुमाओ से पुछिए ब्रमेश्वर मुखिया से शव यात्रा के दौरान एक अखबार ने लिखा था (गो बेंक अभ्यानंद गो बेंक) ये खबर किसी लंदन के अखबार ने नही छापी थी।इस मसले पर खुली बहस होनी चाहिए नेता का बयान कहा छपता है यह प्रबंधन तय करता है इसमें किसी पत्रकार की कोई भूमिका नही होती है और जिसे बिहार की जनता ने ही नकार दिया है उसे मीडिया कितने दिनों तक छापते चलेगा। और फिर अपने राज में मीडिया को कभी ब्रह्ममणवादी तो कभी सर्वणवादी कह कर गाली देने वाले महाश्य किसी मीडिया वाले से सम्बन्ध भी बना कर नही रखे कौन उनकी वकालत करेगा। और सुनो संतोष उस प्रतिरोध मार्च में भी वही अधिकांश लोग थे जो कभी मीडिया को पानी पी पीकर गाली दे रहे थे। सूनते सूनते मेरा कान पक गया था मैंने कहा बस कर यार अब रात में बात करते हैं। लेकिन हल्के अंदाज में ही इसने जो कह दिया वह साचने वाली बात तो जरुर है और आप भी गौर करिए और अगर आपके पास वर्तमान सरकार के खिलाफ कोई वैसी खबर है तो भेजिए छापने और दिखाने वाले वीर पुरुष बिहार में अभी भी मौंजूद है लेकिन सीधे सीधे मीडिया पर सवाल खड़े करने से बाज आये।

साभार ————–रंजू संतोष कि कलम से ———-

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