पत्रकारों से आम आदमी की अपेक्षा

प्रेस परिषद के रिपोर्ट के बाद बिहार और बिहार के बाहर काटजू सुर्खियों में है– बिहार में मीडिया के स्वतंत्रता को लेकर विरोध मार्च हो रहे हैं। सोशलसाईट से लेकर चौक चौराहे तक मीडिया और मीडियामैंन पर बहस छिड़ी हुई है ।हर कोई अपने अपने तरीके से परिषद के रिपोर्ट का विशलेषण कर रहे हैं। लेकिन इन सब के बीच पत्रकारिता पर कही कोई चर्चा नही हो रही है। फोकस में सिर्फ और सिर्फ नीतीश और नीतीश के इशारे पर नाचते मीडिया की चर्चा हो रही है मैं भी उस विवाद में पड़ गया था लेकिन आज मुझे लगा कि कहां बूरे फस गये थे अपना काम छोड़ कर वहां ऐसा कि आज सुबह मेरे ससुराल से फोन आया फोन उठाये तो मेरे साले जी पत्नी लाईन पर थी सीधा सवाल था उनका 20 और 21 फरवरी को बिहार बंद है उसका प्रभाव इंटर के परीक्षा पर भी पड़ेगा क्या परिक्षाये रद्द तो नही हो गयी मैंने कहा नही अभी तक तो कोई सूचना नही है फिर वो बोली अखबार में भी इसको लेकर कुछ भी नही छपा है मैने कहा आज बात करके शाम में बता देगे।फिर बच्चो को छोड़ने स्कूल चला गया लौटने के दौरान फिर से देखते हैं ससुराल वालो का ही फोन है साली महोदया, लाईन पर थी हलाकि उनके फोन करने का यह वक्त नही था। मुझे लगा क्या हुआ भाई चलते चलते बाईक पर फोन उठा लिया और क्या सब ठिक है अरे उनके बांस आने वाले हैं 20 और 21 को किसी चीज का बंद है क्या मैंने कहा है ट्रेड यूनियन का 20 और 21 फरवरी को भारत बंद है। और इसका प्रभाव भी पड़ेगा खास करके हवाई और रेल मार्ग पर इसका असर पड़ सकता है इसी को लेकर कल रात प्रधानमंत्री ने ट्रेड यूनियन के नेता से हड़ताल वापल लेने का आग्रह किया है चलिए पहले उनको बता देते है फिर बात करते हैं।घर पहुंचने के बाद मैंने कांल किया उन्होने बतायी सामने तीन अखबार है कसी में भी इसको लेकर कोई खबर नही है। खबर है तो आशाराम बापू की आप पत्रकारो को तो देश निकाला दे देना चाहिए क्या तरीका है पाठक को आप समान्य सी जानकारी भी नही दे सकते अभी सोच रहे थे गूंगल सर्च करे लेकिन फिर लगा मुझे आपके पास जानकारी हो सकती है।ये साली जी हमारे टीचर भी है चैनल पर लाईफ चल रहा हो या फिर फोनिंग या फिर मेरी खबरों की सबसे बड़ी भ्यूर हैं।खबर खत्म होते ही इनका फोन या फिर मैंसेज जरुर आता है क्या सुधार करना है या फिर क्या इस खबर में औऱ क्या हो सकता है-वही फेसबूक पर भी हमारे हर पोस्ट पर इनकी पैंनी नजर रहती है और कभी मैं इनका बुद्धू तो कभी छलिया तो कभी दिवाना रहता हूं अरे इनके बारे में बताते बताते मैं मुद्धा से ही भटक गया था।पत्रकार मित्रों ये पाठक है और एक संवेदनशील पाठक हैं एक पाठक की अपेक्षाओ पर हमलोग कहां तक खड़े उतर रहे है जरा सोचिए शायद इस तरह की खबरे लिखने पर नीतीश जी की और से मनाही नही होनी चाहिए इसको हमलोग जगह दे सकते हैं कहने का मतलब यह है कि हमलोग पाठक को आम सूचना भी दे पाने में विफल रह रहे है और लोगो में गुस्सा इसी बात को लेकर है।

____________________________________साभार —-> रंजू संतोष कि कलम से _____

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