जेडीयू को छोड़कर फ़ायदे में रहेगी, सुकून से जिएगी बीजेपी

सुशील मोदी बिहार में नीतीश कुमार के सबसे सुशील और वफादार भाई माने जाते रहे हैं, लेकिन जिस तरह से आगे आकर उन्होंने जेडीयू पर हमला बोला है, उससे साफ़ है कि दोनों दलों के बीच हालात कितने बिगड़ चुके हैं। अब दोनों दलों के बीच दो खेल एक साथ चल रहे हैं। एक तरफ़ दोनों एक-दूसरे को मक्खन लगाने की भी कोशिशें कर रहे हैं, दूसरी तरफ़ बात इतनी बिगड़ गई है कि संभालते-संभालते भी कुछ-न-कुछ उल्टा हो ही जाता है।

मक्खन लगाने की कोशिशों के तहत ख़ुद मुख्यमंत्री नीतीश कुमार का ही बयान लें। जो नीतीश कुमार नरेंद्र मोदी की आलोचना करके नहीं अघा रहे, उन्हीं नीतीश कुमार को अब गिरिराज सिंह तक की तारीफ़ सूझ रही है। मंगलवार 16 अप्रैल को एक कार्यक्रम में उन्होंने अपने ऊपर आम तौर पर हमलावर रहने वाले अपने पशुपालन मंत्री की तारीफ़ में कसीदे पढ़े। कहा कि वे अपने घर पर बकरी पालते हैं और मेहमानों को बकरी के दूध की चाय पिलाते हैं। महात्मा गांधी भी बकरी का दूध पिया करते थे। यानी नरेंद्र मोदी में नाथूराम गोडसे (सांप्रदायिकता) ढूंढ़ते-ढूंढ़ते नीतीश जी को गिरिराज सिंह में महात्मा गांधी नज़र आने लगे हैं। हा हा हा…

लेकिन अब गांधी ढूंढ़ने से बात कितनी बनेगी, कहना मुश्किल है, क्योंकि दोनों पार्टियों में बहुत सारे नेता भगत सिंह बनकर एक-दूसरे की असेंबली के बाहर बम पर बम फोड़े जा रहे हैं। इधर से सुशील मोदी ने बम फोड़ा- ‘‘बिना नाम लिये नरेंद्र मोदी के ऊपर संकेतों में जदयू ने जो हमला किया है, वह दुर्भाग्यपूर्ण है, और यह नहीं होना चाहिए था। भाजपा के देश भर के कार्यकर्ता और समर्थक इस प्रकरण से दुखी और मर्माहत हैं।’’ सुशील मोदी ने यह भी बता दिया कि “18 अप्रैल को राजनाथ सिंह ने दिल्ली में बिहार भाजपा की कोर कमेटी की बैठक बुलाई है। उसमें राज्य की वर्तमान राजनीतिक स्थिति पर चर्चा होगी। गठबंधन जारी रखने या न रखने के बारे में पार्लियामेंट्री बोर्ड उचित समय पर उचित निर्णय लेगा।”

जेडीयू की तरफ से बम फोड़ा बड़बोले बाबा माने जाने वाले शिवानंद तिवारी जी ने। गुस्से में बोले- “जिसे जाना है जाए, हम कोई पकड़कर रखे हैं। हम कोई उनका पैर पकड़ रहे हैं क्या? नरेंद्र मोदी सेक्युलर हैं तो (पीएम कैंडिडेट का) नाम घोषित करें न। हम कोई उनको रोके हुए हैं।”

इतना ही नहीं, बीजेपी प्रवक्ता मीनाक्षी लेखी के गोधरा कांड से जुड़े बयान पर तो नीतीश जी चुप्पी साध गए थे, लेकिन लालू जी के उकसावे पर बोल ही गए। लालू ने कहा था कि गोधरा कांड के समय नीतीश रेल मंत्री थे। उनको गोधरा कांड की ज़िम्मेदारी लेनी चाहिए। नीतीश जी ने कहा कि कोई डीरेलमेंट हुआ था जो हमारी ज़िम्मेदारी थी। कानून व्यवस्था का मामला राज्य सरकार का होता है, इसलिए राज्य सरकार की ज़िम्मेदारी थी। यानी फिर नरेंद्र मोदी पर निशाना।

“तीर” कमान से और बात ज़ुबान से निकल जाए, तो वापस नहीं आते। और यहां तो तीर पर तीर, एक से एक वीर। ऐसे में सबसे बड़ा सवाल यही है कि गठबंधन चलेगा कि नहीं? अविश्वसनीय, मौकापरस्त और पल-पल बदलती राजनीति के इस दौर में इसका पक्का जवाब देना तो अभी मुश्किल है, लेकिन मुझे लगता है कि पैंतरे दिखाने की शुरुआत तो नीतीश जी ने की, लेकिन एक सुनहरा मौका दे दिया है उन्होंने बीजेपी को, इस गठबंधन से निकल आने का। अगर बीजेपी यह साहस दिखाए तो निश्चित रूप से वह फायदे में रहेगी और नीतीश जी को इसके भयंकर राजनीतिक नुकसान उठाने होंगे।

पहले यह समझ लेते हैं कि जेडीयू से तलाक लेकर बीजेपी को क्या-क्या फायदे होंगे।

1. फायदा नंबर वन- अगर बीजेपी स्वाभिमान और आत्मनिर्भरता वाली पॉलिटिक्स करना चाहती है, तो उसे रोज़-रोज़ की बेइज़्ज़ती से मुक्ति मिल जाएगी। गिरिराज सिंह, अश्विनी चौबे सरीखे नेताओं से बात करिए तो इस बेइज़्ज़ती की टीस आपको महसूस होगी और पता चलेगा कि नीतीश कुमार ने समय-समय पर बीजेपी को किस तरह ज़लील किया है।

2. फायदा नंबर दो- जेडीयू के साथ रहकर बीजेपी लोकसभा की सिर्फ़ 15 सीटें लड़ पाएगी, लेकिन जेडीयू को छोड़कर 40 सीटों पर लड़ेगी। एक राष्ट्रीय पार्टी के लिए यह कोई अच्छी स्थिति नहीं होती कि वह किसी राज्य में, जहां उसकी ठीक-ठाक स्थिति और संभावना हो, वहां गठबंधन के नाम पर वह 40 में सिर्फ़ 15 सीटों पर लड़े, 25 पर न लड़े। अभी बीजेपी सारी सीटें भी जीत ले, तो 15 सीटें जीतेगी, लेकिन 40 सीटों पर लड़ने की सूरत में उसके पास अपनी सीटें और बढ़ाने का मौका रहेगा।

3. फायदा नंबर तीन- जिन सीटों पर आप नहीं लड़ते, वहां आपके कार्यकर्ताओं का उत्साह और मनोबल समाप्त हो जाता है। इस लिहाज से बिहार की 25 सीटों पर बीजेपी के कार्यकर्ता डेड पड़े हैं। जेडीयू से अलग होने की सूरत में उनमें जोश आएगा और कुछ कर दिखाने का मौका मिलेगा। बड़ी पार्टियों को हर चुनाव सिर्फ़ सीटें जीतने के ख्याल से नहीं, बल्कि अपने कार्यकर्ताओं का मनोबल बनाए रखने के ख्याल से भी लड़ना चाहिए। कार्यकर्ता सक्रिय होंगे, तो उन सीटों पर जनाधार भी तैयार होगा।

4. फायदा नंबर चार- पार्टी में चुनाव के समय टिकट को लेकर असंतोष और सिर-फुटौव्वल कम होगा। अभी आप सिर्फ़ 15 लोगों को टिकट दे सकते हैं, जेडीयू से अलग होने पर आप 40 नेताओं को टिकट देंगे। ज्यादा टिकट बंटेंगे, तो सिर-फुटौव्वल कम होगा। पार्टी कार्यालय में कुर्सियां कम टूटेंगी और मारपीट भी कम होगी। (कृपया पिछले विधानसभा चुनाव को याद करें।)

5. फायदा नंबर पांच- नीतीश जी का अहंकार टूटेगा। उन्हें अहसास होगा कि उनके सर्वशक्तिमान बनने में आधी शक्ति और सीटें बीजेपी की भी थीं। चूंकि सारी चीज़ों का क्रेडिट उन्होंने लूटा है, अपनी आदमकद फोटो के साथ हाथ हिलाते हुए “मैं बिहार हूं” का पोस्टर उन्होंने छपवाया है, तो सारा एंटी-इनकम्बेन्सी भी वही झेलेंगे। राज्य में बड़ी संख्या में लोग उनके दूसरे कार्यकाल में व्याप्त भ्रष्टाचार, नाइंसाफ़ी और उनके तानाशाही तेवर से नाराज़ हैं। ढाई लाख नियोजित शिक्षकों के परिवारों के 10 लाख वोटर तो सीधे-सीधे चुनाव में उन्हें धूल चटाने का इरादा करके बैठे हैं। दूसरे बहुत सारे नाराज़ लोग भी हैं। खासकर रेप-गैंगरेप-छेड़खानी की बढ़ती घटनाओं और शराब को बढ़ावा दिए जाने से नाराज़ महिलाएं।

6. फायदा नंबर छह- चुनाव में मुख्य मुकाबला बीजेपी और आरजेडी के बीच होगा और जेडीयू तीसरे नंबर की पार्टी बन जाएगी। सवर्णों के वोट बीजेपी को मिलेंगे और अल्पसंख्यकों के वोट आरजेडी को मिलेंगे। नीतीश कुमार के दलित-महादलित जनाधार में भी सेंध लगेगी। सुशील मोदी ने रविवार 14 अप्रैल को कहा भी है कि जो लोग दावा करते हैं कि दलित-महादलित पर हमारा प्रभाव ज्यादा है, उन्हें पता होना चाहिए कि दोनों वर्गों के बिहार के शीर्ष नेता भाजपा के पास हैं। उन्होंने कटिहार और आसपास के ज़िलों में अच्छा असर रखने वाले महादलित नेता रामजी ऋषिदेव, राजगीर से लगातार आठ बार के विधायक रविदास समाज के नेता और नीतीश कैबिनेट में मंत्री सत्यदेव नारायण आर्या, मेहतर समाज से विधायक भागीरथी देवी, रजवार समाज से विधायक कन्हैया रजवार और पूर्व केंद्रीय मंत्री और भाजपा अनुसूचित जाति मोर्चा के राष्ट्रीय अध्यक्ष संजय पासवान का जिक्र कर बताया कि बीजेपी में अनुसूचित जाति के 18 विधायक और एक सांसद हैं। सुशील मोदी का यह आत्मविश्वास सिर्फ़ बयान तक न रह जाए, उसे चुनाव में परखने का मौका भी मिलना चाहिए।

7. फायदा नंबर सात- नीतीश कुमार एक्सपोज़ हो जाएंगे। न इधर के रहेंगे, न उधर के। 17 साल बीजेपी के साथ रहकर जब उसे गरियाते हुए निकलेंगे तो हर कोई उनपर हंसेगा। इसी तरह जीवन भर जिस कांग्रेस को गरियाया, जब उसके साथ जाएंगे, तो उनकी स्थिति और हल्की और हास्यास्पद हो जाएगी। ऊपर से कांग्रेस कहीं उनका भी वही हाल न करे, जैसा हाल झारखंड में जेएमएम के पिता-पुत्र शिबू सोरेन और हेमंत सोरेन का किया। पहले बीजेपी के ख़िलाफ़ चढ़ाया, सरकार गिरवाई और बाद में औकात बता दी। वैसे ही बिहार में कांग्रेस पहले जेडीयू को चढ़ाकर बीजेपी से अलग करवाएगी, फिर हो सकता है कि न तो विशेष राज्य का दर्जा दे, न गठबंधन करे। बहुत मुमकिन है कि आखिरी लम्हों में कांग्रेस लालू और रामविलास से गठबंधन कर ले। याद रखें कि पार्टी ने लालू के खासमखास और उनकी सरकार में मंत्री रहे अशोक चौधरी को अपना प्रदेश अध्यक्ष बनाया है।

मालूम नहीं, बीजेपी के रणनीतिकार क्या सोचते हैं, लेकिन अगर बीजेपी को केंद्र में सरकार बनानी है, तो उसे ज़्यादा से ज़्यादा सीटें लड़ने और जीतने की सोच रखनी चाहिए। अगर 1999 से अब तक लगातार उसकी सीटें गिर रही हैं, तो मेरे विचार से इसकी एक बड़ी वजह गठबंधन की पार्टियों पर उसकी बढ़ती निर्भरता भी है। 1999 में उसने 183, 2004 में 138 और 2009 में मात्र 115 सीटें जीतीं। उत्तर प्रदेश जैसे राज्य में सत्तालोलुपता के चक्कर में पड़कर उसने मायावती जैसी मायावी नेत्री से गठबंधन किया और अपना जनाधार खो दिया। गठबंधन अपना जनाधार और सीटें बढ़ाने के लिए होना चाहिए, न कि जनाधार खिसकता रहे और गठबंधन में मस्त रहें।

अगर बीजेपी को इस बार कांग्रेस को पछाड़ना है और केंद्र में सरकार बनानी है, तो उसे अपना आंकड़ा करीब 200 सीटों तक पहुंचाना ही पड़ेगा, जो कि उसकी मौजूदा रणनीति में संभव नहीं दिखाई दे रहा। बीजेपी को समझना चाहिए कि वो जितनी अधिक सीटें जीतेगी, एनडीए में उसे कम से कम पार्टियों की ज़रूरत पड़ेगी, यानी सरकार ज़्यादा मज़बूती और स्थिरता से चलेगी, टांग-खिंचाई कम होगी, बड़े फ़ैसले लेने में आसानी होगी।

व्यक्तिगत मैं राष्ट्रीय पार्टियों के घटते दबदबे को कोई शुभ लक्षण नहीं मानता हूं, क्योंकि इस बात के बावजूद कि दोनों प्रमुख राष्ट्रीय पार्टियां निम्न कोटि की राजनीतिक नैतिकता और तमाम तरह के भ्रष्टाचार की प्रैक्टिस में संलग्न हैं, अधिकांश क्षेत्रीय दलों की तुलना में वे अब भी बेहतर हैं। क्षेत्रीय दल ज़रूरत से अधिक क्षेत्रवाद तो करते ही हैं, लेकिन भ्रष्टाचार, राजनीति के अपराधीकरण, वंशवाद, जातिवाद, सांप्रदायकिता और कई अन्य तरह की संकीर्ण राजनीति करने में भी राष्ट्रीय दलों के कान काटते हैं। इसका विस्तृत विश्लेषण कभी और किया जा सकता है, लेकिन मैं बहुत सोच-समझकर इस नतीजे पर पहुंचा हूं। इसलिए राष्ट्रीय दलों की अलग-अलग प्रदेशों में क्षेत्रीय दलों पर बढ़ती निर्भरता से मुझे कोई ख़ुशी नहीं होती है। मैं चाहता हूं कि देश में उदार और समग्र राष्ट्रीय सोच रखने वाली चार-पांच बड़ी पार्टियां हों। बस। इस लिहाज से कांग्रेस और बीजेपी के अलावा कुछ लेफ्ट पार्टियों को मैं और मज़बूत देखना चाहूंगा। साथ ही इन तीनों के अलावा एक चौथा मज़बूत और साफ-सुथरा राष्ट्रीय राजनीतिक विकल्प भी तैयार हो सके, तो और अच्छा।

बहरहाल, बीजेपी में अगर तनिक भी राजनीतिक विवेक, स्वाभिमान और जुझारूपन बचा है, तो यही उसके लिए सही समय है जेडीयू से अलग होकर बिहार में अपनी नई ज़मीन तैयार का और सांप्रदायिक राजनीति छोड़कर अपने चाल, चेहरा और चरित्र में महज नारों वाली नहीं, असली शुचिता लाने का।

………………………………साभार ………………………………………………अभिरंजन कुमार

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