नीतीश जी, हवा बांधने से देश नहीं चलता!

नीतीश कुमार बिना नाम लिए जो सवाल नरेंद्र मोदी से पूछ रहे हैं, वही सवाल मैं नाम लेकर नीतीश जी से पूछना चाहता हूं- 
1. कैसा विकास होना चाहिए? 
2. हम विकास भी कर जाएं और भुखमरी के शिकार भी लोग रहें तो कैसा विकास? 
3. हम विकास भी कर जाएं और कुपोषण के शिकार भी लोग रहें तो कैसा विकास? 
4. हम विकास भी कर जाएं और पीने का पानी न मिले, तो कैसा विकास?”

नीतीश जी कहते हैं कि “विकास का मतलब बुनियादी ढांचे का विकास और मानव विकास दोनों है। जितना जोर बुनियादी ढांचे पर होगा, कल-कारखाने पर होगा, उससे कम जोर मनुष्य के विकास पर नहीं होना चाहिए।” उनका कहना है कि “ऐसा न विकास का मॉडल लोग चला दें कि और गैरबराबरी बढ़ जाए। विकसित लोग और विकसित हो जाएं और पिछड़े लोग और पिछड़ जाएं।”

नीतीश जी ये भी कहते हैं कि “ढाई हज़ार साल का इतिहास है। हम कभी तिजारत के लिए नहीं जाने जाते थे। हम या तो सुशासन के लिए जाने जाते रहे या ज्ञान के लिए जाने जाते थे। पाटलिपुत्र सत्ता का केंद्र था और नालंदा ज्ञान का केंद्र था।”

बातें बड़ी-बड़ी हैं। इनसे कोई असहमत नहीं हो सकता। लेकिन उनकी हर बात से सहमत होते हुए ही मैं वे सवाल उछाल रहा हूं, जो उन्होंने परोक्ष रूप से नरेंद्र मोदी के लिए उछाले हैं। जानता हूं कि जवाब नहीं मिलेगा, क्योंकि नीतीश जी उन सवालों के जवाब नहीं दिया करते, जो उन्हें असहज करते हैं। वो कहते ज़रूर हैं कि “हवा बांधने से देश नहीं चलता”, लेकिन सच्चाई यह है कि हवा बांधकर ही वे सब कुछ चलाना चाहते हैं। 

हो सके तो नीतीश जी यह बताएं कि बिहार में कुपोषण कितना कम हो गया है। उनके सत्ता संभालने के बाद से बिहार के मुज़फ्फरपुर और गया समेत करीब दस ज़िलों में इनसेफलाइटिस या एक्यूट इनसेफलोपैथी सिंड्रोम- जो भी कहें, उनसे होने वाली मौतों में बेइंतहां वृद्धि क्यों हुई है? पिछले साल ऐसे करीब तीन सौ बच्चे मारे गए, जिन्हें कायदे से समूची इक्कीसवीं सदी जीनी थी। हम सब ज़िंदा रहे और हमारी आंखों के सामने हमारे छह-छह महीने साल-साल दो-दो साल के वे बच्चे छटपटाते हुए बिलखते हुए दम तोड़ते रहे। राज्य के स्वास्थ्य मंत्री और सचिव ने ख़ुद कहा था कि ये बीमारी गंदगी, गरीबी और कुपोषण की वजह से फैलती है। अब अगर ये बीमारी पहले से ज़्यादा विकट रूप में सामने आ रही है, तो क्या इसका सीधा-सीधा मतलब ये नहीं है कि उन इलाकों में गंदगी, गरीबी और कुपोषण का असर बढ़ा है?

यह क्या माजरा है कि बिहार में ऐसी-ऐसी बीमारियों ने दोबारा सिर उठा लिया है, जिनके बारे में माना जाता था कि उनका उन्मूलन हो चुका है। अभी मुज़फ्फरपुर और कटिहार में चेचक के सैकड़ों केस सामने आए हैं। डायरिया से तो हर साल हमारे सैकड़ों बच्चे मरते ही हैं। अगर नीतीश जी ने लोगों को पीने का साफ़ पानी मुहैया करा दिया है तो फिर क्यों साफ़ पानी न मिलने की वजह से बड़ी संख्या में लोगों की अकाल-मृत्यु हो रही है? हो सके तो नीतीश जी बिहार के सिर्फ़ एक गांव का नाम बता दें, जहां पिछले साढ़े सात साल में सरकारी प्रयासों से लोगों को पीने का साफ़ पानी मिल गया हो। 

अगर बिहार में भुखमरी नहीं है तो क्यों जहानाबाद में महादलितों, जो उनके एजेंडे पर कथित रूप से सबसे ऊपर हैं, के बच्चे आज भी चूहे मारकर खा रहे हैं और क्यों पटना सिटी में गरीबों के बच्चे नालियों से मछलियां पकड़-पकड़कर खा रहे हैं? अगर बिहार में भुखमरी नहीं है, तो क्यों नीतीश जी के स्कूलों में कई बार ऐसा हुआ कि बच्चे छिपकली वाली खिचड़ी खा-खाकर बीमार पड़े और कइयों की तो मौत भी हुई? किसी मां-बाप की वो कौन-सी मजबूरी होती है कि वह अपने बच्चों को छिपकिली वाली खिचड़ी खाने के लिए घटिया स्कूलों में भेज देता है? बिहार में इस वक्त सरकारी स्कूलों की जितनी ख़राब दशा है, उसे देखते हुए यह कहना ग़लत नहीं होगा कि उन घटिया स्कूलों में अब सिर्फ़ उन्हीं परिवारों के बच्चे पढ़ रहे हैं, जिन परिवारों में भुखमरी की स्थिति है। बिहार में भुखमरी में जी रहे परिवारों का पता करना हो, तो सबसे पहले यह पता कर लीजिए कि यहां के घटिया सरकारी स्कूलों में कितने परिवारों के बच्चे पढ़ रहे हैं। 

अगर बिहार में ग़ैरबराबरी पर चोट करने वाली नीतियां अपनाई जा रही हैं, तो क्यों 38 में से 37 ज़िलों में प्रति व्यक्ति आय राज्य की प्रति व्यक्ति आय से काफी नीचे है? बिहार की प्रति व्यक्ति प्रति दिन की आय 70 रुपये 28 पैसे है, लेकिन सिर्फ़ राजधानी पटना के लोगों की आय इस औसत से ज़्यादा है- 146 रुपये 68 पैसे। बाकी 37 जिलों में से 36 ज़िलों के लोगों की आय 40 रुपये से नीचे है और 37वें ज़िले मुंगेर के लोगों की आय 51 रुपये 14 पैसे है। अगर बिहार में ग़ैरबराबरी नहीं बढ़ रही है, तो इस बात का क्या जवाब है कि आख़िर क्यों 7 ज़िलों में लोगों की आमदनी घट गई? क्यों शिवहर में आज भी एक व्यक्ति 15 रुपये 12 पैसे प्रतिदिन पर जी रहा है?

क्या नीतीश जी इस सवाल का जवाब दे सकेंगे कि बिहार में किसका विकास हो रहा है? बेईमान नेताओं, शराब-माफिया, ठेकेदारों, ज़मीन कब्ज़ाने वालों, बिल्डरों, घूसखोर अफसरों, भ्रष्ट मुखिया-सरपंचों के अलावा और किस-किसका विकास हो रहा है बिहार में? 

अगर बिहार में सचमुच का विकास हो रहा है तो पलायन दिन-ब-दिन क्यों बढ़ता जा रहा है? असम में, महाराष्ट्र में, दूसरे राज्यों में बिहारी मारे जा रहे हैं, दुरदुराए जा रहे हैं, इसके बावजूद वे बिहार में क्यों नहीं टिकते? आज बिहार के ज़्यादातर ग़रीब परिवारों के किशोर और नौजवान दूसरे राज्यों में मज़दूरी करने चले गए हैं। मनरेगा जैसी योजनाएं चलाए जाने के बावजूद ऐसे हालात क्यों बन गए हैं- क्या नीतीश कुमार जी इसका जवाब दे सकेंगे? अकेले मनरेगा में 80 प्रतिशत भ्रष्टाचार से किसका विकास हो रहा है? 20 लाख फ़र्ज़ी जॉब कार्ड का फ़ायदा किन ग़रीबों को मिल रहा है?

बिहार की पहचान अगर ज्ञान के केंद्र के रूप में रही, तो फिर छात्र अपने ही राज्य में रुककर पढ़ाई क्यों नहीं कर रहे? सच्चाई तो यह है कि प्राइमरी स्कूलों से लेकर विश्वविद्यालयों तक की जितनी बुरी स्थिति नीतीश जी के कार्यकाल में हो गई है, उतनी बुरी स्थिति बिहार के ढाई हज़ार साल के उस इतिहास में, जिसका नीतीश जी ज़िक्र कर रहे हैं, कभी नहीं थी। ख़ुद हम बिहार के सरकारी स्कूलों और कॉलेजों से पढ़कर निकले, लेकिन अब की तुलना में हालात तब काफी बेहतर थे। आज तो नीतीश जी के स्कूलों में सिर्फ़ मज़दूरों और ग़रीब किसानों के बच्चे पढ़ रहे हैं और अगर यही हाल रहा तो इन स्कूलों से अपवादों को छोड़कर सिर्फ़ मनरेगा के मज़दूर, नक्सली और बाहुबली नेताओं की बंदूकें ढोने वाले ही निकलेंगे- यह तय मानिए। 

किसी साथी ने इसी फेसबुक पर कहा था कि लालू के राज में जितनी ख़राब स्थिति सड़कों और कानून-व्यवस्था की हो गई थी, नीतीश के राज में उससे ज़्यादा ख़राब स्थिति शिक्षा की हो गई है। इसके बावजूद अगर नीतीश कुमार बिहार के ज्ञान का ढिंढोरा पीट रहे हैं तो इसे क्या कहा जाए? 

पिछले साढ़े सात साल में बिहार में कुछ सड़कें ज़रूर बनी हैं, लेकिन हिन्दुस्तान के किस पिछड़े से पिछड़े राज्य में इन बर्षो में सड़कें नहीं बनी हैं, कोई मुझे यह भी बता दे। और साथ ही यह भी बता दे कि बिहार में जो सड़कें बनी हैं, उनका स्तर क्या है, उनकी क्वालिटी कैसी है और इन सड़कों में नीतीश जी की सरकार का कितना योगदान है और केंद्र की सरकार का कितना योगदान है? साथ ही कितने पैसे इन सड़कों में खाए गए हैं? अगर खाने का स्कोप नहीं होता, तो क्या ये सड़कें बनाई जातीं?

सड़कों का ढिंढोरा एक तरफ- दूसरी तरफ इस राज्य में पिछले साढ़े सात साल में एक फैक्टरी नहीं लगी, एक यूनिट बिजली का उत्पादन नहीं हुआ, विकास के नाम पर घूसखोरी, कमीशनखोरी और दलाली का बोलवाला हो गया, चप्पे-चप्पे पर शराब बिकने लगी, ज़हरीली शराब से मौत की घटनाओं में बेतहाशा वृद्धि हो गई, लड़कियों को साइकिलें तो बांटी, लेकिन रेप और छेड़खानी की घटनाओं में इज़ाफ़ा हो गया, घटनाएं घटने तक भी बात रहती, तो अलग बात थी, लेकिन सरकार और पुलिस ने कई मौकों पर खुलेआम रेपिस्टों और छेड़खानी करने वाले मनचलों का साथ दिया, बात-बात पर आम लोगों पर पुलिस ने लाठी-गोलियां चलाईं- क्या यही विकास है और क्या यही सुशासन है?

अखबारों को विज्ञापनों की घूस खिलाकर, पत्रकारों की अंतरात्मा को कुचलकर, प्रचारात्मक ख़बरों को प्रचारित करके, नकारात्मक ख़बरों को सेंसर करके, सेवा-यात्राओं, अधिकार-यात्राओं, अधिकार-रैलियों, ग्लोबल समिटों, बिहार दिवस के चीप कार्यक्रमों, जिनमें पुलिस को लाठियां चलानी पड़ती हैं, इन सबके ज़रिए बिहार में हवाबाज़ी नहीं की जा रही है, तो क्या की जा रही है? 

बड़ा सवाल यह भी है कि नीतीश जी जो कसौटी देते हैं, उसपर क्या अपनी सरकार को भी कसकर देखते हैं या फिर उन्हें लगता है कि नरेंद्र मोदी का हौवा खड़ा कर वे भी फ़र्ज़ी धर्मनिरपेक्ष नेताओं की तरह अपनी दुकानदारी चलाते रह जाएंगे? मुसलमानों की बात करते हैं तो यह सवाल तो उठेगा कि बीजेपी, आडवाणी, जोशी, राजनाथ धर्मनिरपेक्ष और नरेंद्र मोदी सांप्रदायिक- कैसे? मोदी राज में दंगे हुए, तो आडवाणी की रथयात्रा से देश में कौन-सी सांप्रदायिक सद्भाव की बयार बह चली थी? गुड़ भी खाइएगा और गुलगुले से परहेज भी कीजिएगा- तो क्या भारत का मुसलमान इतना बेवकूफ़ है? …और आप अपने राज की भी तो बात करें। फारबिसगंज में सरकारी संरक्षण-प्राप्त माफिया के लिए गोली चलवाई गई और चार मुसलमानों की हत्या हुई। उन मुसलमानों का इंसाफ़ कहां है सरकार? 

मेरी व्यक्तिगत मान्यता है कि विशेष दर्जे के मुद्दे पर भी सिर्फ़ हवाबाज़ी हो रही है। एक तरफ केंद्र से तीन-चार हज़ार करोड़ रुपये का फ़ायदा पाने के लिए इतना शोरगुल, दूसरी तरफ चुपके से अंतिम समय में राज्य का योजना आकार 28 हज़ार करोड़ से घटाकर 25 हज़ार करोड़ कर देना, यानी उतने की सीधी कटौती, जितने के फायदे के लिए मुख्यमंत्री जी दिल्ली तक हाथ पसार रहे हैं- क्या दर्शाता है? 

बिहार को जितना दीन-हीन नीतीश जी बताते रहते हैं, कायदे से बिहार को उतना दीन-हीन होना नहीं चाहिए। बिहार के पास समंदर नहीं है तो क्या हुआ? बिहार के पास कई सदानीरा नदियां तो हैं। बिहार के पास उपजाऊ मिट्टी तो है। बिहार के पास क़षि आधारित उद्योगों की अपार संभावनाएं तो हैं। बिहार के पास मेहनतकश नौजवान तो है। बिहार के पास हिन्दुस्तान की बेहतरीन प्रतिभाएं तो हैं। क्या इन चीज़ों के सहारे कोई राज्य अपने पैरों पर खरा नहीं हो सकता? और अगर नहीं हो सकता, तो इस राज्य का कभी भला नहीं हो सकता- यह आप मुझसे लिखवा लीजिए। 

बिहार को केंद्र से तीन-चार हज़ार करोड़ की सालाना खैरात नहीं चाहिए, देश के स्तर पर आने के लिए मौजूदा मूल्य पर हर साल 3 लाख 65 हज़ार करोड़ की विशाल रकम चाहिए और इतनी बड़ी रकम अगर यह राज्य अपने पुरुषार्थ से पैदा नहीं कर सकता, तो भिक्षाटन के ज़रिए कभी नहीं जुटा पाएगा। इस 3 लाख 65 हज़ार करोड़ रुपये का अर्थशास्त्र मैं अपने चैनल पर समझा चुका हूं। कभी इसपर विस्तृत आलेख भी लेकर ज़रूर आऊंगा। 

साफ़ है कि बिहार में भी इस वक्त सिर्फ़ और सिर्फ़ हवाबाज़ी चल रही है। मैं नीतीश जी की इस बात से बिल्कुल सहमत हूं कि हवा बांधने से देश नहीं चलता। इसलिए उनसे अपील करूंगा कि किसी रात अंधेरे बंद कमरे में घंटे-दो घंटे बैठकर अपनी ही कही बातों पर ज़रूर ग़ौर करे।

साभार ……………………………….. अभिरंजन कुमार 

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