Archive | जुलाई 2013

पत्रकारिता के नाम पर फ्रॉडगिरी

पत्रकारिता के नाम पर फ्रॉडगिरी

पुण्य प्रसून बाजपेयी/ पत्रकार और पत्रकारिता के नाम पर कोई कितनी फ्रॉडगिरी कर सकता है। या फिर मौजूदा दौर में पत्रकारिता एक ऐसे मुकाम पर जा पहुंची है, जहां पत्रकारिता के नाम पर धंधा किया भी जा सकता है और पत्रकारों के लिये ऐसा माहौल बना दिया गया है कि वह धंधे में अपनी उपस्थिति दर्ज कराकर धंधे को ही मुख्यधारा की पत्रकारिता मानने लगे। या फिर धंधे के माहौल से जुड़े बगैर पत्रकार के लिये एक मुश्किल लगातार उसके काम उसके जुनुन के सामानांतर चलती रहती है, जो उसे डराती है या फिर वैकल्पिक सोच के खत्म होने का अंदेशा देकर पत्रकार को धंधे के माहौल में घसीट कर ले जाती है।

दरअसल, यह सारे सवाल मौजूदा दौर में कुकुरमुत्ते की तरह पनपते सोशल मीडिया के विभिन्न आयामों को देखकर लगातार जहन में उतरते रहे हैं लेकिन हाल में ही या कहें 20 जुलाई को देश के 50 हिन्दी के संपादकों/ पत्रकारों को लेकर एक्सचेंज फॉर मीडिया की पहल ने इस तथ्य को पुख्ता कर दिया कि पत्रकार मौजूदा वक्त में बेचने की चीज भी है और पत्रकारिता के नाम का घोल कहीं भी घोलकर धंधेबाजों को मान्यता दिलायी जा सकती है। और समाज के मान्यता प्राप्त या कहें अपने अपने क्षेत्र के पहचान पाये लोगों को ही धंधे का औजार बनाकर धंधे को ही पत्रकारीय मिशन में बदला जा सकता है।

दर्द या पीडा इसलिये क्योंकि राम बहादुर राय (वरिष्ठ पत्रकार), श्री राजेंद्र यादव ( वरिष्ठ साहित्यकार), श्री पुष्पेश पंत (शिक्षाविद्) श्री सुभाष कश्यप (संविधानविद) श्री असगर वजागत (वरिष्ठ रंगकर्मी), श्री वेद प्रताप वैदिक( वरिष्ठ पत्रकार) श्री निदा फाजली (प्रसिद्ध गीतकार व शायर) प्रो. बी. के. कुठियाला ( कुलपति माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय) श्री राजीव मिश्रा ( सीईओ, लोकसभा टीवी) श्री रवि खन्ना ( पूर्व दक्षिण एशिया प्रमुख, वाइस ऑफ अमेरिका), सरीखे व्यक्तित्वों की समझ को मान्यता देकर डेढ़ सौ पत्रकारों में से पचास पत्रकारों का चयन करता है। बकायदा हर संपादक की तस्वीर और नाम देकर प्रचारिक प्रसारित करता है। लेकिन जब चुनिंदा 50 पत्रकारों के नामों के ऐलान का वक्त आता है तो टॉप के दो पत्रकार दो अखबार के मालिक हो जाते हैं। और इन अखबार मालिक का नाम या तस्वीर ना तो उन डेढ सौ की फेरहिस्त में कहीं दिखायी देता है। और तो और जिन सम्मानीय लोगों को ज्यूरी का सदस्य बनाकर पत्रकारों को छांटा भी जाता है, उन्हें भी यह नहीं बताया जाता कि अखबार के मालिक पत्रकार हो चुके हैं या फिर दो अखबार के मालिक श्रेष्ठ पत्रकारों की सूची में जगह पा चुके हैं। असल में उन अखबार के मालिकों को नहीं बताया जाता है कि आप पत्रकारो की लिस्ट में सबसे उम्दा पत्रकार, सबसे साख वाले पत्रकार, हिन्दी की सेवा करने वाले सबसे श्रेष्ठ संपादक बनाये जा रहे हैं। जाहिर है यह महज चापलूसी तो हो नहीं सकती। क्योंकि धंधा चापलूसी से नहीं चलता। उसके लिये एक खास तरह के फरेब की जरुरत होती है जो फरेब बड़े कैनवास में मौजूदा पत्रकारिता के बाजारु स्तर को बढता हुआ दिखा दें। फिर पत्रकारिता की साख बनाये रखने के लिये पत्रकारों के बीच मौजूदा वक्त के सबसे साख वाले समाजसेवी अन्ना हजारे को बुला कर विकल्प की सोच और अलग लकीर खिंचने का जायका भी पैदा करने की कोशिश की जाती है।

लेकिन दिमाग में धंधा बस चुका है तो परिणाम क्या निकलेगा। यकीनन कॉकटेल ही समायेगा। तो जो अन्ना हजारे अपने गांव रालेगण सिद्दी से लेकर मुंबई की सड़कों पर दारु बंदी को लेकर ना सिर्फ संघर्ष करते रहे और उम्र गुजार दी बल्कि जिनके समाज सेवा की पहली लकीर ही दारुबंदी से शुरु होती है, उनसे ईमानदार पत्रकारिता का तमगा लेकर उसी माहौल में दारु भी जमकर उढेली जाती है। और तो और महारथी पत्रकारों को कॉकटेल में नहलाने की इतनी जल्दबाजी कि अन्ना के माहौल से निकलने से पहले ही जाम खनकने लगते हैं। हवा में नशे की खुमारी दौड़ने लगती है। अब यहां अन्ना सरीखे व्यक्ति खामोशी ही बरत सकते हैं क्योकि चंद मिनट पहले ही पत्रकारों से देश के लिये संघर्ष की मुनादी कर पत्रकारो को समाज का सबसे जिम्मेदार जो ठहराया। जाहिर है महारथी पत्रकारों की आंखों में उस वक्त शर्म भी रही लेकिन मेजबान की नीयत अगर डगमगाने लगी तो कोई क्या करे। और मेजबान को अगर समूचा कार्यक्रम ही धंधा लगने लगा है तो फिर वहा कैसे कोई पत्रकारिता, नीयत, ईमानदार समझ,मिशन,पत्रकारीय संघर्ष का सवाल उठा सकता है। यह सब तो बाजार तय करते हैं और बाजार से डरे सहमे पत्रकार ही नहीं ज्यूरी सदस्य भी इस कार्यक्रम पर अंगुली नहीं उठा पाते हैं कि उनके साथ धोखा हुआ है। हर कोई खामोश। और पत्रकारिता के नाम पर एक सफल कार्यक्रम का तमगा एक्सचेंज फार मीडिया के कर्ताधर्ता अपने नाम कर लेते हैं। फिर त्रासदी यह कि जिन पचास महारथी पत्रकारों के नाम चुने भी गये उसे दिल्ली के पांच सितारा होटल के समारोह के बाहर अभी तक रखने की हिम्मत एक्सचेंज फार मीडिया भी दिखा नहीं पाया है। समझना है तो एक्सचेंज4मीडिया के साइट पर जाइये और त्रासदी देख लीजिये। लेकिन हमारी आपकी मुश्किल यह है कि इस साइट पर जितने ज्यादा हिट या क्लिक होंगे, उसे भी वह अपनी लोकप्रियता से जोड़ लेंगे।

(यह लेख पुण्य प्रसून बाजपेयी जी के ब्लॉग http://prasunbajpai.itzmyblog.com/से साभार)

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यूनिवर्सिटी की क़िताबों में ‘अल-क़ायदा’ की कविता पर विवाद

यूनिवर्सिटी की क़िताबों में ‘अल-क़ायदा’ की कविता पर विवाद
क्या भारत के किसी विश्वविद्यालय के पाठ्यक्रम में अल-क़ायदा के संदिग्ध चरमपंथी की कविता पढ़ाई जा सकती है
केरल की कालीकट यूनिवर्सिटी के पाठ्यक्रम में अल-क़ायदा के संदिग्ध चरमपंथी इब्राहिम अल-रुबैश की कविता ‘ओड टू द सी’ यानी ‘समंदर के लिए गीत’ शामिल की गई है.यह कविता यूनिवर्सिटी के बीए और बीएससी के छात्रों को पढ़ाई जा रही है.यूनिवर्सिटी ने इब्राहिम अल-रुबैश के बारे में लिखा है कि अल-रुबैश को अमरीका ने 2001 में पाकिस्तान-अफगानिस्तान की सीमा के नजदीक पकड़ा था जहां वो पढ़ाया करते थे.अल-रुबैश को जब पकड़ा गया तब वो एक तीन महीने की बच्ची के पिता थे.अल-रुबैश ने ग्वांतानामो बे की जेल में पांच साल बिताए. दिसंबर 2006 में अमरीका ने उन्हें रिहा करके सऊदी अरब भेज दिया था.सऊदी अरब ने 3 फरवरी, 2009 को संदिग्ध सऊदी चरमपंथियों की जो सूची जारी की उसमें अल-रुबैश का भी नाम था.अल-रुबैश की कविता ‘ओड टू द सी’ को ‘पोयम्स फ्रॉम ग्वांतानामो : द डिटेनीज़ स्पीक’ कविता संग्रह में शामिल किया गया था.ये कविता संग्रह 2007 में बेस्टसेलर रहा.ग्वांतानामो बे मानवाधिकार हनन के लिए बदनाम है .ये कविता 2011 में यूनिवर्सिटी के पाठ्यक्रम में शामिल की गई थी. बीबीसी ने जब कालीकट यूनिवर्सिटी के बोर्ड ऑफ स्टडीज़ के पूर्व चेयरमैन और अभी वायनाड के पझस्सी राजा कॉलेज में प्रोफेसर के राजगोपालन से बात की तो उनका कहना था, “जब कविता को पाठ्यक्रम में शामिल किया गया तब अल-रुबैश के अल-क़ायदा से रिश्तों के बारे में नहीं पता था, नहीं तो कविता को नहीं शामिल किया जाता.”वहीं यूनिवर्सिटी के बोर्ड ऑफ स्टडीज़ के मौजूदा चेयरमैन पी महमूद का कहना है कि कविता को पाठ्यक्रम में जारी रखने पर अगले महीने होने वाली बोर्ड की मीटिंग में फैसला किया जाएगा.हालांकि यूनिवर्सिटी में कुछ लोगों ने इस कविता का विरोध किया है लेकिन कोई भी खुलकर सामने नहीं आ रहा. ट्विटर पर ज़रूर कुछ लोगों ने कविता के विरोध में ट्वीट किए हैं.
बीबीसी ने इब्राहिम अल-रुबैश की कविता ‘ओड टू द सी’ का अंग्रेज़ी से हिंदी में अनुवाद किया है. पढ़ें पूरी कविता. समंदर के लिए गीत/ओ समंदर, मुझे अपनों की ख़बर दे/इन अविश्वासी लोगों की ज़ंजीरें न होतीं तो, कूद पड़ता मैं तुझ में,/ग्वांतानामो बे में क़ैदियों की स्थिति को लेकर काफ़ी चिंताएँ व्यक्त की जा चुकी हैं/
पहुंच जाता अपनों तक, या ख़त्म हो जाता तेरी बांहों में

तुम्हारे किनारे ग़म हैं, बंधन हैं, दर्द हैं और नाइंसाफी हैं.

तुम्हारा कड़वापन मेरे सब्र का इम्तिहान लेता है.

तुम्हारी ख़ामोशी मौत जैसी है, तुम्हारी लहरें अजीब हैं

तुम्हारी लहरों से उठती ख़ामोशी में छिपा है धोखा

तुम्हारी ख़ामोशी कोशिश करने वाले कप्तान को ख़त्म कर देगी

और डूब जाएगा मांझी भी

शरीफ़, चुप, अनसुना करने वाले और गुस्से से दहाड़ते

तुम अपने साथ मौत लाते हो

हवा परेशान करे तो, तुम्हारी नाइंसाफी जायज़ है

हवा ख़ामोश करे तो सिर्फ बहते जाते हो

ओ समंदर, क्या हमारी बेड़ियों से तुम नाराज़ होते हो?

ये मजबूरी है हमारी कि हम रोज़ आते और जाते हैं

तुम्हें पता है कि हमारा गुनाह क्या है?

तुम्हें पता है कि हम अंधेरे में धकेले गए हैं?

ओ समंदर, इस कैद में तुम हमें चिढ़ाते हो

हमारे दुश्मनों से मिलकर बेरहमी से हमारा पहरा देते हो

ये चट्टानें नहीं बतातीं कि क्या गुनाह किए गए?

क्या वो क्यूबा, हारा हुआ, नहीं बताता तुम्हें कहानियां?

क्या मिला तुम्हें हमारे तीन साल के साथ से?

समंदर पर कविता की कश्तियां; सुलगते सीने में एक दबी हुई आग

शायर के शब्द हमारी ताकत के अक्षर हैं

उसकी शायरी हमारे दर्द भरे दिलों के लिए दवा है

 

साभार : उपेन्द्र कश्यप

इनकाउटंर का दर्द

इनकाउटंर का दर्द
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थोड़ी देर पहले हमारे एक आईपीएस अधिकारी मित्र फोन आया था इशरत जहां फर्जी मुठभेड़ के सिलसिले में। उन्होने बातचीत के दौरान मुझसे कई सवाल किये जिसका में जबाव नही दे सका, उम्मीद है आप मुझे उनके सवाल के जबाव में मदद करेगे।
इन अधिकारी से मेरा कोई 10 वर्ष पूराना रिश्ता है। संयोग ऐसा रहा कि इनके साथ कई जिलो में साथ काम करने का मौंका मिला ये एसपी थे तो मैं पत्रकार लेकिन कभी भी मानवाधिकारी या फिर फर्जी मुकदमें को लेकर हमलोगो के बीच टकराव नही हुआ। जब भी मेरी जानकारी में ऐसा कुछ पता चला या फिर मैंने खबर चलाया तो 24 घंटे के अंदर कारवाई हो जाती थी।
लेकिन आज उनके कई सवालो का जबाव मेरे पास नही था सबसे बड़ी बात यह है कि यह सवाल वैसे पुलिस अधिकारी का है जो खुद मानवाधिकार और कानून को लेकर काफी गम्भीर है।इनका पहला सवाल था इशरत जहां इनकाउन्टर में जेल में बंद आईपीएस अधिकारी और इस इंनकाउटर में मारे गये चारो व्यक्ति के बीच पहले से कोई रंजिश थी क्या। दूसरी बात आईपीएस अधिकारी सौ आतंकी को मार गिराये वो सीधे डीजीपी नही बन सकता है ।ठिक है मैंने माना कि पकड़ कर चारो को मारा गया किसके लिए ।
गुजरात देश का एक मात्र राज्य है जहां आतंकी जाने से पहले हजार बार सोचता है पूरे देश में आये दिन आंतकी घटनाये हो रही हैं।आप लोग इनते डिवेट करा रहे है अब लोग इशरत को बिहार से जोड़ रहे हैं अगर पुलिस और सेना इस नजरिया से काम करने लगे तो कितने घंटे चैन से सो सकते हैं हमारे देश की जनता। सीमा पर सेना पड़ोसी मुल्क से फिस्किंग कर ले अंदर पुलिस अपराधियों से मिल जाये कितने देर अराम से रह लेगे।पुलिस पर तो आरोप क्या हर कोई कहता है चोर और अपराधी से मिला है। कहने वाले तो यहां तक कह रहे है कि पुलिस ही अपराध करा रहा है। तीन दिन थाना बंद करके देख लिजिए। समाज में इतना ही दम है तो चला कर देख लिजिए ।चोर को या अपराधी को पुलिस किसके लिए पिटता है पिटना गलत है मैं भी मानता हूं लेकिन हमारे पास पिटाई के अलावा कोई और व्यवस्था है जिससे किसी अपराधिक घटनाओ को सुलझाया जा सके ।
इतने जो लोग चीख चीख कर भाषण दे रहे हैं कभी वो पुलिस के थाने में जहां वो रात गुजारता है चले जाये एक दिन वो रह जाये तो मान जायेगे।फिर समाज के प्रबुद्ध लोगो से आग्रह है 5 घंटे थाना के कार्यकलाप में शामिल होकर देखे, टीवी में या फिर कारगिल चौक से भाषण देना आसान है।
पुलिस क्यों फर्जी इनकाउटंर करती है इस पर कभी सोचे हैं पुलिस के पास जब कोई विकल्प नही बचता है तब उसको मारता है किसके लिए अमन चैन देश में और समाज में कायम रहे। आप छोटा कोई क्रायम करिए जमानत लेने में हालत खराब हो जायेगा लेकिन वैसे अपराधी को जेल भेजिए आज गया और कल बाहर ।और बाहर निकलते ही क्रायम शुरु आप गवाही नही दिजिएगा कोर्ट तारीख पर तारीख देगा कैसे चलेगा व्यवस्था। पुलिस को गाली देने से समस्या का समाधान हो जायेगा। पंजाब के आंतकियों को क्या बातचीत से पटरी पर लाया गया।
केपीएस गिल के दहशत से पंजाब नियंत्रण में आया और बाद में क्या हुआ गिल के साथ काम करने वाले कई आईपीएस अधिकारियो को जेल जानी पड़ी कई ने तो आत्महत्या कर लिया। किसके लिए ठिक है उस दौर में कई निर्दोश लोग भी मारे गये लेकिन पुलिस के पास दशहत फैलाने के अलावे और कोई ट्रेनिंग नही दी जाती है जब स्थिति नियत्रंण से बाहर होने लगती है तभी पुलिस इस तरह के एक्सन में आती है। और इस दौरान कई निर्दोश लोग भी मारे जाते हैं।लेकिन शांति के लिए समाज और देश को इस तरह कि किमत तो चुकाना ही पड़ेगा।नही तो तैयार रहिए आ रहा है नक्सली अब हमारी बारी तो खत्म होने पर है।संतोष जी कभी नक्सलियों के खिलाफ चलाये जा रहे अप्रेशन के दौरान साथ चलिए फोर्स कितना टूट चुका है इसका एहसास हो जायेगा।फोर्स का मनोबल इतना गिर गया है कि कोई हमला होता है तो पुलिस लड़ने के लिए नही जान बचाने के लिए गोली चलाता है और तब तक गोली चलाता रहता है जब तक कि बच कर निकल नही जाता है। क्यों नही समस्या का समाधान हो रहा है। नक्सल इलाके में विकास नही हुआ इसके लिए पुलिस जिम्मेवार है क्या, जगंल का दोहन हो रहा है इसके लिए पुलिस जिम्मेवार है ,विकास गांवो तक नही पहुंचा इसके लिए पुलिस जिम्मेवार है ,जमीन के विवाद का हल नही हो रहा है, इसके लिए पुलिस जिम्मेवार है, देश में फैल रहे आंतकवाद के लिए पुलिस जिम्मेवार है क्या।जब हम जिम्मेवार नही है तो फिर मुझे इन समस्याओ के कारण उपजे आक्रोश को शांत करने की जिम्मेवारी क्यो दी जा रही है जब कि सबको पता है कि पुलिस का क्या काम है। हम ज्यादा परेशान हुए दिन का चैन और रात की नींद लूटी तो फिर हम वही करेगे जो इशरत के साथ किया गया । इसको कोई रोक नही सकता सारे सिस्टम को साथ मिलकर काम करने की जरुरत है और रही बात पुलिस को संतोष जी आप याद रखिएगा किसी भी राज सत्ता का प्रतीक पुलिस होता है और पुलिस को जिस तरीके से साधन विहिन रखा जा रहा है नुकसान उठाने के लिए तैयार रहिए। नये लड़के जो आ रहे हैं ना उन्हे कोई कमीटमेंन्ट नही है समाज ,व्यवस्था और देश के प्रति नौकरी छोड़ने में इन नये लड़के को वक्त नही लगता है। टाईलेन्टेंड लड़के आ रहे हैं उनसे आप ज्यादा कुछ करा भी नही सकते हैं कप्तान और खेलाड़ी दोनो का वही हाल है एमएम पास पुलिस बन रहा है ।उसको अपना डियूटी पता हो या न हो राईट जरुर पता है।पुलिस को आधुनिक तकनीक से लैंस करिए सुविधा दिजिए काम का बोझ कम किजिए मानवीय व्यवहार मिलेगा नही तो चलिए इसी तरह आरोप प्रत्यारोप चलता रहेगा। और एक समय बाद पुलिस वेतन लेगी और घर जायेगी लोग भुगतते रहेगे।
उस आईपीएस अधिकारी के परिवार के बारे में कभी सोचा है किसके लिए फर्जी इनकाउंटर किया ।पंजाब में एक दर्जन से अधिक आईपीएस अधिकारी या तो जेल में है या फिर सोसोईड कर लिया है किसके लिए पुलिस वालो की जमीन जोत लिया या फिर बहु बेटी का इज्जत ले लिया। सोचिए संतोष जी आने वाला वक्त बेहद मुश्किल होने वाला है। आपसे अपना दर्द इसलिए शेयर कर रहा हूं कि मुझे लगता है आप इस सच से समाज को अवगत करायेगे और लोगो में पुलिस के प्रति नजरिया बदलेगा। बाय चलिए आज मुलाकात होनी चाहिए साथ व़ृदावन का डोसा खाते हैं।

 

साभार : रंजू संतोष