यूनिवर्सिटी की क़िताबों में ‘अल-क़ायदा’ की कविता पर विवाद

यूनिवर्सिटी की क़िताबों में ‘अल-क़ायदा’ की कविता पर विवाद
क्या भारत के किसी विश्वविद्यालय के पाठ्यक्रम में अल-क़ायदा के संदिग्ध चरमपंथी की कविता पढ़ाई जा सकती है
केरल की कालीकट यूनिवर्सिटी के पाठ्यक्रम में अल-क़ायदा के संदिग्ध चरमपंथी इब्राहिम अल-रुबैश की कविता ‘ओड टू द सी’ यानी ‘समंदर के लिए गीत’ शामिल की गई है.यह कविता यूनिवर्सिटी के बीए और बीएससी के छात्रों को पढ़ाई जा रही है.यूनिवर्सिटी ने इब्राहिम अल-रुबैश के बारे में लिखा है कि अल-रुबैश को अमरीका ने 2001 में पाकिस्तान-अफगानिस्तान की सीमा के नजदीक पकड़ा था जहां वो पढ़ाया करते थे.अल-रुबैश को जब पकड़ा गया तब वो एक तीन महीने की बच्ची के पिता थे.अल-रुबैश ने ग्वांतानामो बे की जेल में पांच साल बिताए. दिसंबर 2006 में अमरीका ने उन्हें रिहा करके सऊदी अरब भेज दिया था.सऊदी अरब ने 3 फरवरी, 2009 को संदिग्ध सऊदी चरमपंथियों की जो सूची जारी की उसमें अल-रुबैश का भी नाम था.अल-रुबैश की कविता ‘ओड टू द सी’ को ‘पोयम्स फ्रॉम ग्वांतानामो : द डिटेनीज़ स्पीक’ कविता संग्रह में शामिल किया गया था.ये कविता संग्रह 2007 में बेस्टसेलर रहा.ग्वांतानामो बे मानवाधिकार हनन के लिए बदनाम है .ये कविता 2011 में यूनिवर्सिटी के पाठ्यक्रम में शामिल की गई थी. बीबीसी ने जब कालीकट यूनिवर्सिटी के बोर्ड ऑफ स्टडीज़ के पूर्व चेयरमैन और अभी वायनाड के पझस्सी राजा कॉलेज में प्रोफेसर के राजगोपालन से बात की तो उनका कहना था, “जब कविता को पाठ्यक्रम में शामिल किया गया तब अल-रुबैश के अल-क़ायदा से रिश्तों के बारे में नहीं पता था, नहीं तो कविता को नहीं शामिल किया जाता.”वहीं यूनिवर्सिटी के बोर्ड ऑफ स्टडीज़ के मौजूदा चेयरमैन पी महमूद का कहना है कि कविता को पाठ्यक्रम में जारी रखने पर अगले महीने होने वाली बोर्ड की मीटिंग में फैसला किया जाएगा.हालांकि यूनिवर्सिटी में कुछ लोगों ने इस कविता का विरोध किया है लेकिन कोई भी खुलकर सामने नहीं आ रहा. ट्विटर पर ज़रूर कुछ लोगों ने कविता के विरोध में ट्वीट किए हैं.
बीबीसी ने इब्राहिम अल-रुबैश की कविता ‘ओड टू द सी’ का अंग्रेज़ी से हिंदी में अनुवाद किया है. पढ़ें पूरी कविता. समंदर के लिए गीत/ओ समंदर, मुझे अपनों की ख़बर दे/इन अविश्वासी लोगों की ज़ंजीरें न होतीं तो, कूद पड़ता मैं तुझ में,/ग्वांतानामो बे में क़ैदियों की स्थिति को लेकर काफ़ी चिंताएँ व्यक्त की जा चुकी हैं/
पहुंच जाता अपनों तक, या ख़त्म हो जाता तेरी बांहों में

तुम्हारे किनारे ग़म हैं, बंधन हैं, दर्द हैं और नाइंसाफी हैं.

तुम्हारा कड़वापन मेरे सब्र का इम्तिहान लेता है.

तुम्हारी ख़ामोशी मौत जैसी है, तुम्हारी लहरें अजीब हैं

तुम्हारी लहरों से उठती ख़ामोशी में छिपा है धोखा

तुम्हारी ख़ामोशी कोशिश करने वाले कप्तान को ख़त्म कर देगी

और डूब जाएगा मांझी भी

शरीफ़, चुप, अनसुना करने वाले और गुस्से से दहाड़ते

तुम अपने साथ मौत लाते हो

हवा परेशान करे तो, तुम्हारी नाइंसाफी जायज़ है

हवा ख़ामोश करे तो सिर्फ बहते जाते हो

ओ समंदर, क्या हमारी बेड़ियों से तुम नाराज़ होते हो?

ये मजबूरी है हमारी कि हम रोज़ आते और जाते हैं

तुम्हें पता है कि हमारा गुनाह क्या है?

तुम्हें पता है कि हम अंधेरे में धकेले गए हैं?

ओ समंदर, इस कैद में तुम हमें चिढ़ाते हो

हमारे दुश्मनों से मिलकर बेरहमी से हमारा पहरा देते हो

ये चट्टानें नहीं बतातीं कि क्या गुनाह किए गए?

क्या वो क्यूबा, हारा हुआ, नहीं बताता तुम्हें कहानियां?

क्या मिला तुम्हें हमारे तीन साल के साथ से?

समंदर पर कविता की कश्तियां; सुलगते सीने में एक दबी हुई आग

शायर के शब्द हमारी ताकत के अक्षर हैं

उसकी शायरी हमारे दर्द भरे दिलों के लिए दवा है

 

साभार : उपेन्द्र कश्यप

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