Archive | अगस्त 2013

राज्यरानी एक्सप्रेस से कटकर 35 लोगों की मौत

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राज्यरानी एक्सप्रेस से कटकर मरने वालो कि संख्या हुई 35 लोगों की मौत, भीड़ ने लगाई आग , बिहार सरकार हादसे मे मरने वालो को दो – दो लाख रुपया देगी , जनता दरबार मे मुख्यमंत्री ने की घोषणा ।

समस्तीपुर रेलवे डिविजन में खगड़िया−सहरसा रूट पर धमाराघाट स्टेशन है, जिसके पास ट्रेन से कटकर 35 लोगों के मरने की पुष्टि हो चुकी है। सहरसा और खगड़िया के बीच धमाराघाट स्टेशन के पास यह हादसा हुआ, और सभी श्रद्धालु कात्यायनी स्थान मंदिर जा रहे थे। मरने वालों में 27 महिलाएं, चार बच्चे और छह पुरुष शामिल हैं।

जानकारी के अनुसार, राज्यरानी एक्सप्रेस (गाड़ी संख्या 12567) सोमवार की सुबह सहरसा से पटना जा रही थी। मानसी रेलखंड पर धमारा रेलवे स्टेशन के पास मां कात्यायिनी का एक मंदिर है, जहां पूजा के लिए लोग जमा थे। श्रावण माह के आखिरी सोमवार होने की वजह से बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं की भीड़ थी। वे मंदिर में जल चढ़ाने आए थे। यहां प्रसिद्ध सोमवारी मेला भी लगता है। लोग ट्रैक पार कर दूसरी तरफ मंदिर की ओर जा रहे थे। लोगों को किसी भी ट्रेन के आने की सूचना नहीं दी गई थी, इसी बीच अचानक राज्यरानी एक्सप्रेस आने से पटरी पर खड़े लोग इसकी चपेट में आ गए।

बिहार के अतिरिक्त पुलिस महानिदेशक (कानून व्यवस्था) ए. के. भारद्वाज ने इस हादसे में 35 लोगों के मरने की पुष्टि की है। स्थानीय सांसद दिनेश चंद्र यादव ने भी 35 लोगों की मौत की पुष्टि की है। मृतकों की संख्या बढ़ भी सकती है।

अपुष्ट सूचना के अनुसार, गुस्साए लोगों ने ट्रेन के एक ड्राइवर को पीट-पीट कर मार डाला है। इससे पहले लोगों ने दोनों ड्राइवरों को बंधक बना लिया था। बताया जा रहा है कि बदलाघाट और आस-पास के दोनों स्टेशनों के कर्मचारी डरकर भाग गए हैं।

घटनास्थल पर मौजूद अन्य लोगों ने ट्रेन में मौजूद ड्राइवर समेत बाकी स्टाफ की पिटाई की और ट्रेन की एक एयरकंडीशन बोगी को आग के हवाले कर दिया. ड्राइवर ने बाद में दम तोड़ दिया.इस हादसे के बाद लोगों में भारी आक्रोश है। गुस्साए लोगों ने ट्रेन के दोनों ड्राइवरों को उतार लिया और उनकी जमकर पिटाई की है। इसके अलावा भीड़ ने राज्यरानी एक्सप्रेस और यहां खड़ी एक और ट्रेन में आगजनी की। बताया जा रहा है कि राज्यरानी एक्सप्रेस के 4 डिब्बे जलकर खाक हो गए हैं।

कैसे हुआ हादसा:

हादसा बदला घाट और धमारा घाट के बीच हुआ है. इन दोनों घाट के बीच कात्यायनी मंदिर है, जहां आज सावन का आखिरी सोमवार होने की वजह से बड़ी संख्या में श्रद्धालु मौजूद थे.

घटना वाली जगह 3 ट्रैक हैं और हादसा बीच वाले ट्रैक पर हुआ. दरअसल अगल-बगल के ट्रैक पर खड़ी पैसेंजर ट्रेन से यात्री उतरकर ट्रैक पार कर रहे थे कि तभी अचानक राज्यरानी एक्सप्रेस आ गई.

रेल राज्यमंत्री अधीर रंजन चौधरी ने बताया है कि राज्यरानी की स्पीड 80 किलोमीटर प्रति घंटे थी. ब्रेक लगाने के बावजूद ट्रेन नहीं रुक सकी और हादसा हो गया.

अधीर रंजन के मुताबिक स्थानीय प्रसाशन से चूक की वजह से हुआ हादसा.

समस्तीपुर के डीआरएम अरूण मलिक ने बताया कि आक्रोशित लोगों ने पूरे स्टेशन को बंधक बना लिया है। उन्होंने 15 लोगों के मरने की पुष्टि करते हुए कहा कि मृतकों की संख्या ज्यादा भी हो सकती है। रेलवे ने मेडिकल रिलीफ वैन रवाना कर दिया है। उन्होंने कहा धमारा रेलवे स्टेशन पर सड़क मार्ग से पहुंचना मुश्किल है, सिर्फ रेल मार्ग से पहुंचा जा सकता है।

प्रभात रंजन झा

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“शहीदो, हम शर्मिंदा हैं, क्योंकि ऐसे नेता ज़िंदा हैं!”

नीतीश बाबू के मंत्री भीम सिंह ने न सिर्फ़ शहीदों का अपमान किया है, बल्कि मीडिया का भी अपमान किया है। भीम सिंह जब भी मुंह खोलते हैं तो समझ में आ जाता है कि कितना पढ़े-लिखे हैं। पहले उन्होंने कहा- “जवान तो शहीद होने के लिए ही होते हैं न! सेना और पुलिस में नौकरी क्यूं होती है?” लब्बोलुआब यह है कि जवान शहीद होने के लिए होते हैं और नेता अपने सुख और सियासत के लिए उन्हें शहीद करवाने के लिए।

पत्रकार ने जब पूछा कि आप गए नहीं वहां? तो उनका जवाब था- “आपके बाबूजी गए थे वहां? आपकी माताजी गई थीं वहां?” मीडिया और पत्रकारों का अपमान करने वाले इस बयान का जवाब यह है कि उस पत्रकार के पिताजी और माताजी वहां गए या नहीं गए, लेकिन इतना तय है कि ऐसे घटिया नेताओं के मां-बाप जो भी जहां कहीं भी होंगे, आज ज़रूर अपने आपको कोसते होंगे कि हमने कैसी नालायक औलादों को जन्म दिया, जो उल्टे हमारी कोख को ही कलंकित करने में जुटे हैं।

जब विवाद बढ़ा तो नीतीश बाबू के निर्देश पर भीम सिंह ने इन शब्दों में खेद प्रकट किया- “तोड़-मरोड़कर परोसे गए बयान से भी जो देशवासियों को दुख पहुंचा है, उसके लिए मैं खेद प्रकट करता हूं।“ साफ़ है कि भीम सिंह अब भी अपने पिछले बयान का बचाव कर रहे हैं और चैनलों पर जो दिखाया जा रहा है और जिसे पूरा देश सुन रहा है, उसे वे तोड़-मरोड़कर पेश किया हुआ बता रहे हैं। यानी भीम सिंह को कोई पश्चाताप नहीं है। दूसरी बात कि वे सिर्फ़ खेद जता रहे हैं। माफ़ी नहीं मांग रहे। …और जब वे माफ़ी मांग ही नहीं रहे तो माफ़ी के काबिल कैसे हो सकते हैं? इसलिए नीतीश कुमार को चाहिए कि वे भीम सिंह को फ़ौरन अपने मंत्रिमंडल से बर्खास्त करें।

भीम सिंह जिस सरकार का हिस्सा हैं, उसी के लिए उन्होंने एक बार कहा था कि उसका कान ख़राब हो गया है। आज पूरी सरकार कह रही है कि उनकी ज़ुबान ख़राब हो गई है। ज़ुबान ख़राब। कान ख़राब। आंखें भी ख़राब, क्योंकि जवान इन्हें मरने के लिए बने हुए दिखाई देते हैं और जनता कीड़े-मकोड़ों की तरह दिखाई देती है। ऐसे नेताओं को वोट देकर संसद और विधानसभाओं में नहीं भेजना चाहिए, बल्कि इनके लिए चंदा इकट्ठा कर इन्हें अस्पताल में भेजना चाहिए।

और आख़िर में एक और सच्चाई पर से पर्दा हटा दूं। देशवासी तो इतने से ही परेशान हुए जा रहे हैं कि शहीदों को रिसीव करने पटना एयरपोर्ट पर कोई मंत्री क्यों नहीं पहुंचा या एक बेलगाम मंत्री ने उल्टा क्यों बोल दिया, जब आप यह सुनेंगे कि आरा में शहीद शंभू शरण की चिता को गोइठा (गोबर से बने उपलों) और किरासन तेल से जलाया गया, तो आपको कैसा लगेगा? क्या इसे ही राजकीय सम्मान कहते हैं? न चंदन की लकड़ी, न घी। बिहार की सरकार ने न तो कहीं कोई इंतज़ाम किया, न एक भी मर्यादा निभाई।

इसीलिए आइए, हम अपने मृतक जवानों को तो श्रद्धांजलि दें, लेकिन अपने ज़िंदा नेताओं के लिए भी शोक ज़रूर रखें, क्योंकि उनकी आत्मा-मृत्यु कब की हो चुकी है और इस लोकतंत्र में वे अपने शरीर को एक लाश की तरह ढोए चले जा रहे हैं। साल के तीन सौ पैंसठ दिन ऐसे नेताओं की तेरहवीं मनाई जानी चाहिए। शहीदो, हम शर्मिंदा हैं, क्योंकि ऐसे नेता ज़िंदा हैं!

साभार -अभिरंजन कुमार

मैं शोक में डूबा हुआ हूं

मैं शोक में डूबा हुआ हूं
मुझे इतना ज़्यादा शोक हो गया है कि
नींद नहीं आ रही
खाना नहीं पच रहा
मन बेचैन है
दिमाग ख़राब है।
शोक भुलाने के लिए
प्लेट में भुना हुआ काजू है
मुर्गे की टांगें हैं
और बोतल में शराब है।

शोक मुझे इसलिए नहीं है कि
छपरा में 23 संभावित लाल बहादुर शास्त्रियों को
खाने में ज़हर देकर मार दिया गया।
शोक मुझे इसलिए भी नहीं है कि
बगहा में एक छोटा जलियांवाला बाग बना दिया गया
और पुलिस ने छह लोगों को भून डाला।
इस बात का भी शोक नहीं है मुझे
कि उत्तराखंड की बाढ़ में
बहुत सारे जीते-जागते हंसते-खेलते इंसान
बिल्कुल लाचार मवेशियों की तरह
या यूं कहें कि पत्तों की तरह बह गए
और बहुतों का तो पता भी नहीं चला।

आख़िर इन मौतों का शोक मुझे क्यों होगा?
इन मौतों के लिए तो मेरे राज्य की विधानसभा भी शोकाकुल नहीं है
इन मौतों के लिए तो मेरे राज्य की सरकार भी शोकाकुल नहीं है
इन मौतों के लिए शोक प्रकट करके मैं अपनी गरिमा क्यों गिराऊं?
अपने को छोटा क्यों बनाऊं?
बड़े-बड़े लोग इन छोटे-मोटे लोगों को इंसान की श्रेणी में गिन लेते हैं
यही क्या कम अहसान है उनका?
वरना ये तो कीड़े-मकोड़े हैं
और कीड़े-मकोड़ों की मौत के लिए मैं क्यों शोक-संतप्त होने लगा?

मैं शोकाकुल हूं इसलिए
क्योंकि मेरे मुख्यमंत्री के पैर के अंगूठे में चोट लग गई है।
फ्रैक्चर हो गया है।
चोट भी ऐसी-वैसी नहीं
सीधे बोलती बंद हो गई आठ दिनों के लिए।
सोचिए अंगूठे की वह चोट कितनी भयानक होगी
कि आठ दिनों तक ज़ुबान न खुले।
आगे पीछे गाड़ियों के काफिले
सिक्योरिटी गार्ड्स के तामझाम
और डॉक्टरों की टीम की देख-रेख में
बुलेटप्रूफ कार में बैठकर भी
दो किलोमीटर तय करना मुश्किल हो।
मैं अपने मुख्यमंत्री को ऐसी भयानक चोट लगने के लिए शोकाकुल हूं।
आख़िर मेरा मुख्यमंत्री सही-सलामत रहेगा
तभी तो राज्य में “सुशासन” रहेगा।
विशेष राज्य के दर्जे पर भाषण रहेगा।
ग़रीबों के लिए सड़ा हुआ राशन रहेगा।

बच्चों का मर जाना कौन-सी बड़ी बात है
कि मैं उस पर शोक में डूब जाऊं।
यह भारत देश है
यहां एक बच्चे मरेगा, चार पैदा हो जाएंगे।
और ग़रीब तो ऐसे भी बच्चे पैदा करने में माहिर हैं।
इसलिए अगर मेरे राज्य की विधानसभा
छपरा में 23 बच्चों की मौत पर शोकाकुल नहीं है
अगर मेरे राज्य की सरकार
को बगहा में गोली से छह लोगों की मौत का अफ़सोस नहीं है
तो मुझे क्या पड़ी है ?

अभी मुझे अपने मुख्यमंत्री के पैर के अंगूठे की चोट पर शोक-संतप्त रहने दीजिए
और मारे गए बच्चों का ज़िक्र कर मूड मत ख़राब कीजिए।

साभार – अभिरंजन कुमार

मुझे कुछ कहना है

मुझे कुछ कहना है
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मैँ सरकारी विद्यालय
सरकार द्वारा संचालित और पोषित…
प्रतिष्ठा और गौरव मेरा अतीत
मैँने ही जन्माया है उन तमाम
बुद्धिजीवियोँ को…
जो देखने लगे हैँ मुझे आजकल
नीची नजरोँ से…
मेरे द्वारा ही पुष्पित और
पल्वित हुए हैँ वे लोग
जिनसे हो रहा हूँ आज
उपहासित और अपमानित
उन्हे नहीँ पता कि कब का
कर दिया गया है मुझे बहिष्कृत
तथाकथित सभ्य समाजोँ से
और छोड़ दिया गया है मेरे हिस्से मेँ शोषितोँ,दलितोँ, वंचितोँ और गरीबोँ के बच्चोँ को…
भूखे शिक्षकोँ और चावल की पोटलियोँ को
बना दिया गया है मेरा एक अध्यक्ष जो
अनपढ, जाहिल और गंवार से ही चुना जाता है..
विकसित कर दिया गया है मुझे अनुदान वितरण केन्द्र के रुप मेँ
कुलमिला कर कहुँ तो
लूटा है सरकार और समाज ने
मेरी अस्मिता को
चारोँ ओर लगा दिये गये हैँ
मेरे दुश्मनोँ को
मेरा पुर्ननिर्माण कमीशन के विकेन्द्रीकरण के साथ जारी है
जाहिर है
थाली मेँ जहर तो मिलेगी ही
बंधु…
मैँ लाचार हूँ चुपचाप
अपनी दुर्दशा और दीनहीनता झेलते रहने के लिये
उफ..बहुत सफाई दे दी मैँनेँ
अनुरोध है हमारे अपने बुद्धिमान विद्यार्थियोँ से
कृपया मेरे बच्चोँ को खाना देने की जिम्मेदारी आप ही उठाएँ
शेष आपको बुद्धिमान बनाया है
तो इन्हेँ भी बना देगेँ
और हाँ…
मुझे गाली देना बंद कर देँ
वर्ना वर्ग संधर्ष झेलने को तैयार रहेँ…….. ये मेरी चेतावनी आपके नाम…

साभार : धनञ्जय  कुमार