पुरालेख

“शहीदो, हम शर्मिंदा हैं, क्योंकि ऐसे नेता ज़िंदा हैं!”

नीतीश बाबू के मंत्री भीम सिंह ने न सिर्फ़ शहीदों का अपमान किया है, बल्कि मीडिया का भी अपमान किया है। भीम सिंह जब भी मुंह खोलते हैं तो समझ में आ जाता है कि कितना पढ़े-लिखे हैं। पहले उन्होंने कहा- “जवान तो शहीद होने के लिए ही होते हैं न! सेना और पुलिस में नौकरी क्यूं होती है?” लब्बोलुआब यह है कि जवान शहीद होने के लिए होते हैं और नेता अपने सुख और सियासत के लिए उन्हें शहीद करवाने के लिए।

पत्रकार ने जब पूछा कि आप गए नहीं वहां? तो उनका जवाब था- “आपके बाबूजी गए थे वहां? आपकी माताजी गई थीं वहां?” मीडिया और पत्रकारों का अपमान करने वाले इस बयान का जवाब यह है कि उस पत्रकार के पिताजी और माताजी वहां गए या नहीं गए, लेकिन इतना तय है कि ऐसे घटिया नेताओं के मां-बाप जो भी जहां कहीं भी होंगे, आज ज़रूर अपने आपको कोसते होंगे कि हमने कैसी नालायक औलादों को जन्म दिया, जो उल्टे हमारी कोख को ही कलंकित करने में जुटे हैं।

जब विवाद बढ़ा तो नीतीश बाबू के निर्देश पर भीम सिंह ने इन शब्दों में खेद प्रकट किया- “तोड़-मरोड़कर परोसे गए बयान से भी जो देशवासियों को दुख पहुंचा है, उसके लिए मैं खेद प्रकट करता हूं।“ साफ़ है कि भीम सिंह अब भी अपने पिछले बयान का बचाव कर रहे हैं और चैनलों पर जो दिखाया जा रहा है और जिसे पूरा देश सुन रहा है, उसे वे तोड़-मरोड़कर पेश किया हुआ बता रहे हैं। यानी भीम सिंह को कोई पश्चाताप नहीं है। दूसरी बात कि वे सिर्फ़ खेद जता रहे हैं। माफ़ी नहीं मांग रहे। …और जब वे माफ़ी मांग ही नहीं रहे तो माफ़ी के काबिल कैसे हो सकते हैं? इसलिए नीतीश कुमार को चाहिए कि वे भीम सिंह को फ़ौरन अपने मंत्रिमंडल से बर्खास्त करें।

भीम सिंह जिस सरकार का हिस्सा हैं, उसी के लिए उन्होंने एक बार कहा था कि उसका कान ख़राब हो गया है। आज पूरी सरकार कह रही है कि उनकी ज़ुबान ख़राब हो गई है। ज़ुबान ख़राब। कान ख़राब। आंखें भी ख़राब, क्योंकि जवान इन्हें मरने के लिए बने हुए दिखाई देते हैं और जनता कीड़े-मकोड़ों की तरह दिखाई देती है। ऐसे नेताओं को वोट देकर संसद और विधानसभाओं में नहीं भेजना चाहिए, बल्कि इनके लिए चंदा इकट्ठा कर इन्हें अस्पताल में भेजना चाहिए।

और आख़िर में एक और सच्चाई पर से पर्दा हटा दूं। देशवासी तो इतने से ही परेशान हुए जा रहे हैं कि शहीदों को रिसीव करने पटना एयरपोर्ट पर कोई मंत्री क्यों नहीं पहुंचा या एक बेलगाम मंत्री ने उल्टा क्यों बोल दिया, जब आप यह सुनेंगे कि आरा में शहीद शंभू शरण की चिता को गोइठा (गोबर से बने उपलों) और किरासन तेल से जलाया गया, तो आपको कैसा लगेगा? क्या इसे ही राजकीय सम्मान कहते हैं? न चंदन की लकड़ी, न घी। बिहार की सरकार ने न तो कहीं कोई इंतज़ाम किया, न एक भी मर्यादा निभाई।

इसीलिए आइए, हम अपने मृतक जवानों को तो श्रद्धांजलि दें, लेकिन अपने ज़िंदा नेताओं के लिए भी शोक ज़रूर रखें, क्योंकि उनकी आत्मा-मृत्यु कब की हो चुकी है और इस लोकतंत्र में वे अपने शरीर को एक लाश की तरह ढोए चले जा रहे हैं। साल के तीन सौ पैंसठ दिन ऐसे नेताओं की तेरहवीं मनाई जानी चाहिए। शहीदो, हम शर्मिंदा हैं, क्योंकि ऐसे नेता ज़िंदा हैं!

साभार -अभिरंजन कुमार

यूनिवर्सिटी की क़िताबों में ‘अल-क़ायदा’ की कविता पर विवाद

यूनिवर्सिटी की क़िताबों में ‘अल-क़ायदा’ की कविता पर विवाद
क्या भारत के किसी विश्वविद्यालय के पाठ्यक्रम में अल-क़ायदा के संदिग्ध चरमपंथी की कविता पढ़ाई जा सकती है
केरल की कालीकट यूनिवर्सिटी के पाठ्यक्रम में अल-क़ायदा के संदिग्ध चरमपंथी इब्राहिम अल-रुबैश की कविता ‘ओड टू द सी’ यानी ‘समंदर के लिए गीत’ शामिल की गई है.यह कविता यूनिवर्सिटी के बीए और बीएससी के छात्रों को पढ़ाई जा रही है.यूनिवर्सिटी ने इब्राहिम अल-रुबैश के बारे में लिखा है कि अल-रुबैश को अमरीका ने 2001 में पाकिस्तान-अफगानिस्तान की सीमा के नजदीक पकड़ा था जहां वो पढ़ाया करते थे.अल-रुबैश को जब पकड़ा गया तब वो एक तीन महीने की बच्ची के पिता थे.अल-रुबैश ने ग्वांतानामो बे की जेल में पांच साल बिताए. दिसंबर 2006 में अमरीका ने उन्हें रिहा करके सऊदी अरब भेज दिया था.सऊदी अरब ने 3 फरवरी, 2009 को संदिग्ध सऊदी चरमपंथियों की जो सूची जारी की उसमें अल-रुबैश का भी नाम था.अल-रुबैश की कविता ‘ओड टू द सी’ को ‘पोयम्स फ्रॉम ग्वांतानामो : द डिटेनीज़ स्पीक’ कविता संग्रह में शामिल किया गया था.ये कविता संग्रह 2007 में बेस्टसेलर रहा.ग्वांतानामो बे मानवाधिकार हनन के लिए बदनाम है .ये कविता 2011 में यूनिवर्सिटी के पाठ्यक्रम में शामिल की गई थी. बीबीसी ने जब कालीकट यूनिवर्सिटी के बोर्ड ऑफ स्टडीज़ के पूर्व चेयरमैन और अभी वायनाड के पझस्सी राजा कॉलेज में प्रोफेसर के राजगोपालन से बात की तो उनका कहना था, “जब कविता को पाठ्यक्रम में शामिल किया गया तब अल-रुबैश के अल-क़ायदा से रिश्तों के बारे में नहीं पता था, नहीं तो कविता को नहीं शामिल किया जाता.”वहीं यूनिवर्सिटी के बोर्ड ऑफ स्टडीज़ के मौजूदा चेयरमैन पी महमूद का कहना है कि कविता को पाठ्यक्रम में जारी रखने पर अगले महीने होने वाली बोर्ड की मीटिंग में फैसला किया जाएगा.हालांकि यूनिवर्सिटी में कुछ लोगों ने इस कविता का विरोध किया है लेकिन कोई भी खुलकर सामने नहीं आ रहा. ट्विटर पर ज़रूर कुछ लोगों ने कविता के विरोध में ट्वीट किए हैं.
बीबीसी ने इब्राहिम अल-रुबैश की कविता ‘ओड टू द सी’ का अंग्रेज़ी से हिंदी में अनुवाद किया है. पढ़ें पूरी कविता. समंदर के लिए गीत/ओ समंदर, मुझे अपनों की ख़बर दे/इन अविश्वासी लोगों की ज़ंजीरें न होतीं तो, कूद पड़ता मैं तुझ में,/ग्वांतानामो बे में क़ैदियों की स्थिति को लेकर काफ़ी चिंताएँ व्यक्त की जा चुकी हैं/
पहुंच जाता अपनों तक, या ख़त्म हो जाता तेरी बांहों में

तुम्हारे किनारे ग़म हैं, बंधन हैं, दर्द हैं और नाइंसाफी हैं.

तुम्हारा कड़वापन मेरे सब्र का इम्तिहान लेता है.

तुम्हारी ख़ामोशी मौत जैसी है, तुम्हारी लहरें अजीब हैं

तुम्हारी लहरों से उठती ख़ामोशी में छिपा है धोखा

तुम्हारी ख़ामोशी कोशिश करने वाले कप्तान को ख़त्म कर देगी

और डूब जाएगा मांझी भी

शरीफ़, चुप, अनसुना करने वाले और गुस्से से दहाड़ते

तुम अपने साथ मौत लाते हो

हवा परेशान करे तो, तुम्हारी नाइंसाफी जायज़ है

हवा ख़ामोश करे तो सिर्फ बहते जाते हो

ओ समंदर, क्या हमारी बेड़ियों से तुम नाराज़ होते हो?

ये मजबूरी है हमारी कि हम रोज़ आते और जाते हैं

तुम्हें पता है कि हमारा गुनाह क्या है?

तुम्हें पता है कि हम अंधेरे में धकेले गए हैं?

ओ समंदर, इस कैद में तुम हमें चिढ़ाते हो

हमारे दुश्मनों से मिलकर बेरहमी से हमारा पहरा देते हो

ये चट्टानें नहीं बतातीं कि क्या गुनाह किए गए?

क्या वो क्यूबा, हारा हुआ, नहीं बताता तुम्हें कहानियां?

क्या मिला तुम्हें हमारे तीन साल के साथ से?

समंदर पर कविता की कश्तियां; सुलगते सीने में एक दबी हुई आग

शायर के शब्द हमारी ताकत के अक्षर हैं

उसकी शायरी हमारे दर्द भरे दिलों के लिए दवा है

 

साभार : उपेन्द्र कश्यप

पत्रकारों से आम आदमी की अपेक्षा

प्रेस परिषद के रिपोर्ट के बाद बिहार और बिहार के बाहर काटजू सुर्खियों में है– बिहार में मीडिया के स्वतंत्रता को लेकर विरोध मार्च हो रहे हैं। सोशलसाईट से लेकर चौक चौराहे तक मीडिया और मीडियामैंन पर बहस छिड़ी हुई है ।हर कोई अपने अपने तरीके से परिषद के रिपोर्ट का विशलेषण कर रहे हैं। लेकिन इन सब के बीच पत्रकारिता पर कही कोई चर्चा नही हो रही है। फोकस में सिर्फ और सिर्फ नीतीश और नीतीश के इशारे पर नाचते मीडिया की चर्चा हो रही है मैं भी उस विवाद में पड़ गया था लेकिन आज मुझे लगा कि कहां बूरे फस गये थे अपना काम छोड़ कर वहां ऐसा कि आज सुबह मेरे ससुराल से फोन आया फोन उठाये तो मेरे साले जी पत्नी लाईन पर थी सीधा सवाल था उनका 20 और 21 फरवरी को बिहार बंद है उसका प्रभाव इंटर के परीक्षा पर भी पड़ेगा क्या परिक्षाये रद्द तो नही हो गयी मैंने कहा नही अभी तक तो कोई सूचना नही है फिर वो बोली अखबार में भी इसको लेकर कुछ भी नही छपा है मैने कहा आज बात करके शाम में बता देगे।फिर बच्चो को छोड़ने स्कूल चला गया लौटने के दौरान फिर से देखते हैं ससुराल वालो का ही फोन है साली महोदया, लाईन पर थी हलाकि उनके फोन करने का यह वक्त नही था। मुझे लगा क्या हुआ भाई चलते चलते बाईक पर फोन उठा लिया और क्या सब ठिक है अरे उनके बांस आने वाले हैं 20 और 21 को किसी चीज का बंद है क्या मैंने कहा है ट्रेड यूनियन का 20 और 21 फरवरी को भारत बंद है। और इसका प्रभाव भी पड़ेगा खास करके हवाई और रेल मार्ग पर इसका असर पड़ सकता है इसी को लेकर कल रात प्रधानमंत्री ने ट्रेड यूनियन के नेता से हड़ताल वापल लेने का आग्रह किया है चलिए पहले उनको बता देते है फिर बात करते हैं।घर पहुंचने के बाद मैंने कांल किया उन्होने बतायी सामने तीन अखबार है कसी में भी इसको लेकर कोई खबर नही है। खबर है तो आशाराम बापू की आप पत्रकारो को तो देश निकाला दे देना चाहिए क्या तरीका है पाठक को आप समान्य सी जानकारी भी नही दे सकते अभी सोच रहे थे गूंगल सर्च करे लेकिन फिर लगा मुझे आपके पास जानकारी हो सकती है।ये साली जी हमारे टीचर भी है चैनल पर लाईफ चल रहा हो या फिर फोनिंग या फिर मेरी खबरों की सबसे बड़ी भ्यूर हैं।खबर खत्म होते ही इनका फोन या फिर मैंसेज जरुर आता है क्या सुधार करना है या फिर क्या इस खबर में औऱ क्या हो सकता है-वही फेसबूक पर भी हमारे हर पोस्ट पर इनकी पैंनी नजर रहती है और कभी मैं इनका बुद्धू तो कभी छलिया तो कभी दिवाना रहता हूं अरे इनके बारे में बताते बताते मैं मुद्धा से ही भटक गया था।पत्रकार मित्रों ये पाठक है और एक संवेदनशील पाठक हैं एक पाठक की अपेक्षाओ पर हमलोग कहां तक खड़े उतर रहे है जरा सोचिए शायद इस तरह की खबरे लिखने पर नीतीश जी की और से मनाही नही होनी चाहिए इसको हमलोग जगह दे सकते हैं कहने का मतलब यह है कि हमलोग पाठक को आम सूचना भी दे पाने में विफल रह रहे है और लोगो में गुस्सा इसी बात को लेकर है।

____________________________________साभार —-> रंजू संतोष कि कलम से _____

मीडिया और अभिव्यक्ति

मित्रों ये मोबाईल भी गजब की चीज है जहां तक आप सोच नही सकते मोबाईल वहां भी दस्तक देने से बाज नही आता है। आज सुबह मुख्यमंत्री के कार्यक्रम में जाने की जल्दी में बिस्तर से उठने के साथ ही भाग दौर शुरु हो गया इसी दौरान हमारे एक खास मित्र का फोन आया हाई हेलो हुआ और फिर मैं रात में बात करने की बात कर फोन रखने लगे। लेकिन मित्र इतने से शांत होने वाले नही थे। बात शुरु हुई प्रेस परिषद के रिपोर्ट और उसके बाद पटना की सड़कों पर निकले जुलुस को लेकर मैंने सीधा पल्ला झाड़ लिया भाई उस जुलुस में मुझे भी जाना था लेकिन निकलते वक्त एक फेसबूक फ्रेंड दिल्ली से आये इसी से नही जा सका ।उन्होने कहा बढिया है आपके मित्र ने गलत काम करने से रोक दिया मैंने कहा ऐसा क्या है। जिस समय जुलुस डाकबंगला से गुजर रहा था उस वक्त मैं भी डाकबंगला पर ही था। अरे यार तुम पटना में हो नही दिल्ली पहुंच गया सौभाग्यशाली था जो मैं उस मार्च को देख सका खोज रहा था तुम्हे उस जुलुस में लेकिन मुझे पूरा विश्वास था की तुम नही होगे ।क्या मजाक है सबसे आगे नवल किशोर चौधरी बैनर लिए बढ रहे थे मुझे बड़ी हस्सी आयी नवल किशोर चौधरी तो मीडिया के आईकोन बने हुए है जब भी नीतीश के सरकार पर प्रहार करना हो सारे चैनल पर चौधरी जी लगभग रोजाना मौजूद रहते हैं। फिर दिखे बीबीसी वाले मणीकांत ठाकुर जी क्या बात है पिछले सात वर्षो को उनकी स्टोरी निकला लो उनकी हर स्टोरी में नीतीश की ऐसी की तैसी किये रहते हैं हाल में भी शिक्षा से जुड़ी योजनाओ के खोटाले पर खबरे लिखे हैं। एक था जो कोई आईएस आईपीएस का पोटल चलाता है नौकशाही की बात कर रहे हो क्या—हा हा देखते है तुम बड़े प्रभावित रहते हो ।उनका सारा पोस्ट पढते है वो क्या लिखते है इसकी समझ मुझे भी है अधिकारियो के चूचलेबाजी के अलावा रहता क्या है और चले है मीडिया के फ्रिंडम की बात करने क्यो नही लिखते हैं यहां के भ्रष्ट अधिकारियो के बारे में कैसे थाने की बोली लगायी जाती है क्यो नही लिखते हैं कौन उनको रोक रखा है।और मीडिया का मतलब सिर्फ अखबार ही नही होता है क्या जरा पुछिए बंदर के हाथ में बिहार लिखने वाले पत्रकार का क्या हुआ जरा पुंछिए ना खबर के काऱण टाईम्स आंफ इंडिया के सम्पादक पर कार्यलय से निकलते वक्त गोली मारी गयी थी। पुछुए मीडिया के इन रहनुमाओ से क्या हाल था लालू राबड़ी के 15 वर्षो के कार्यकाल में कितने पत्रकार पीटे गये इन रहनुमाओ को आज याद नही होगा ।उस वक्त भी यहां के बड़े अखबार लालू के खिलाफ खबर लिखने से बचते थे।रही बात प्रेस परिषद के रिपोर्ट का तो मीडिया का मतलब बिहार में सिर्फ अखबार ही है क्या — भिजुउल मीडिया तो हर वक्त नीतीश की बैंड बजाता रहता है क्या वह मीडिया नही है।जरा इन रहनुमाओ से पुछिए ब्रमेश्वर मुखिया से शव यात्रा के दौरान एक अखबार ने लिखा था (गो बेंक अभ्यानंद गो बेंक) ये खबर किसी लंदन के अखबार ने नही छापी थी।इस मसले पर खुली बहस होनी चाहिए नेता का बयान कहा छपता है यह प्रबंधन तय करता है इसमें किसी पत्रकार की कोई भूमिका नही होती है और जिसे बिहार की जनता ने ही नकार दिया है उसे मीडिया कितने दिनों तक छापते चलेगा। और फिर अपने राज में मीडिया को कभी ब्रह्ममणवादी तो कभी सर्वणवादी कह कर गाली देने वाले महाश्य किसी मीडिया वाले से सम्बन्ध भी बना कर नही रखे कौन उनकी वकालत करेगा। और सुनो संतोष उस प्रतिरोध मार्च में भी वही अधिकांश लोग थे जो कभी मीडिया को पानी पी पीकर गाली दे रहे थे। सूनते सूनते मेरा कान पक गया था मैंने कहा बस कर यार अब रात में बात करते हैं। लेकिन हल्के अंदाज में ही इसने जो कह दिया वह साचने वाली बात तो जरुर है और आप भी गौर करिए और अगर आपके पास वर्तमान सरकार के खिलाफ कोई वैसी खबर है तो भेजिए छापने और दिखाने वाले वीर पुरुष बिहार में अभी भी मौंजूद है लेकिन सीधे सीधे मीडिया पर सवाल खड़े करने से बाज आये।

साभार ————–रंजू संतोष कि कलम से ———-

बिहार में प्रिंट मीडिया….

“बिके हुए अखबारों को खरीदना बंद करो”

क्या दुर्भाग्य है कि आज मां सरस्वती की पूजा का दिन है, लेकिन हमें चर्चा यह करनी पड़ रही है कि बिहार में मां सरस्वती के अखबारों में काम करने वाले बेटे-बेटियों के लिखने की आज़ादी जेपी के उन चेलों ने ही अखबार-मालिको को विज्ञापन की घूस खिलाकर खरीद ली है, जो इमरजेंसी का विरोध करके सियासत में पैदा हुए थे।

अगर सचमुच आत्मा जैसी किसी चीज़ का अस्तित्व होता होगा, तो आज निश्चित रूप से लोकनायक की आत्मा कलप रही होगी कि किस तरह के फ़र्ज़ी लोगों को उन्होंने सियासत की ज़मीन मुहैया कराई। अभिव्यक्ति की आज़ादी के लिए लड़ने का ढोंग करने वालों ने पहला मौका मिलते ही अभिव्यक्ति की आज़ादी का गला घोंटा।

तानाशाही का विरोध करने वाले ज़्यादा बड़े तानाशाह निकले। इमरजेंसी का विरोध करने वालों ने अपनी सरहद में अघोषित इमरजेंसी लगा दी। सादगी की सियासत करने वालों में आत्म-प्रचार की इतनी भूख होगी कि उसे हर रोज़ अपने राज्य में छपने वाले सभी अखबारों के पहले पन्ने पर अपनी बड़ी-सी फोटो और गुणगान चाहिए- यह कल्पना से भी परे था।

इस दुनिया में बहुत सारे लोग लंबे समय तक यह समझने की कोशिश करते रहे कि आइंस्टीन के दिमाग में क्या था, लेकिन हम उस नेता का दिमाग समझना चाहते हैं, जिसने अपनी ही सत्ता रहते हुए राजधानी की सड़कों पर होर्डिंग्स लगवाकर एलान कर दिया कि मैं बिहार हूं। उसे यह भी याद नहीं रहा कि बिहार में साढ़े दस करोड़ लोग और भी हैं। कोई एक व्यक्ति राष्ट्र या राज्य नहीं हुआ करता।

हमें अफसोस है कि जब नेताजी ने राज्य के प्रिंट मीडिया को पूरी तरह ग्रिप में ले लिया, तब उन्हें इलेक्ट्रॉनिक मीडिया की ग्रोथ भी खटकने लगी। जिस भाषण में उन्होंने राष्ट्रपिता महात्मा गांधी की खिल्ली उड़ाने वाले शराब-कारोबारी का जमकर प्रशस्ति-गान किया, उसी भाषण में उन्होंने इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के तथाकथित ग्रोथ का मखौल उड़ाया।

हद तो तब हो गई, जब वो चाहते थे कि उनकी और डीजीपी की मौजूदगी में आपराधिक इतिहास वाले एक विधायक-पति द्वारा कार्बाइन लहराने और आम लोगों पर लाठियां बरसाने की तस्वीरें राज्य का इलेक्ट्रॉनिक मीडिया नहीं दिखाए। इसके लिए उनके प्रवक्ता ने इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के ख़िलाफ़ जमकर अपनी भड़ास निकाली।

दुर्भाग्यपूर्ण है, शर्मनाक है, पर सच है कि राज्य में प्रिंट मीडिया पूरी तरह सत्ता की दलाली करने में जुटा हुआ है। हम तो अब तक यही समझते थे कि चाहे नेता हो या पत्रकार, चाहे सरकार हो या अखबार- किसी लोकतंत्र में उसकी प्रथम और अंतिम जवाबदेही जनता के ही प्रति होती है। लेकिन यह क्या? यहां तो अखबार सरकार के प्रति जवाबदेह हैं।

मीडिया घरानों और सरकार के नेक्सस में जनता की आवाज़ कहीं गुम-सी हो गई है। जनता के ही पैसे ख़र्च करके जनता को ज़रूरी सूचनाओं, जानकारियों और ख़बरों से वंचित रखा जा रहा है। जन-आंदोलनों की आवाज़ दबाई जा रही है। राज्य में पुलिसिया बर्बरता बेइंतहां बढ़ गई है। मौत बांटने वाली शराब का धंधा बड़े-बड़े लोगों के संरक्षण में फल-फूल रहा है।

अब अपराधी ही नहीं, पुलिस वाले भी रंगदारी मांगते हैं। राज्य में शिक्षा और स्वास्थ्य व्यवस्था ध्वस्त हो चुकी है। हाथों में पत्थर लेकर बच्चे भी सड़कों पर हैं, हाथों में चप्पलें लेकर शिक्षक भी सड़कों पर हैं। इन सबके बीच भग्नावशेषों से बदतरहाल उनके स्कूल अपनी किस्मत को कोस रहे हैं। राज्य के सरकारी अस्पतालों में प्राइवेट नर्सिंग होम्स ने दलाल फिट कर रखे हैं। प्रतिरोध हो, तो पीएमसीएच जैसे अस्पताल में गोलियां चल जाती हैं। मरीज़ की जान की परवाह किसी को नहीं, लेकिन उसकी जेब पर सबकी निगाहें हैं।

सात साल में एक यूनिट बिजली नहीं बनी। एक गांव में पीने का साफ़ पानी नहीं पहुंचाया जा सका। भ्रष्टाचार का देश का सबसे ऊंचा पहाड़ पटना में खड़ा हो गया है। ग़रीब जनता कराहती हुई पूछ रही है कि इंसाफ़ किस चिड़िया का नाम है, कम से कम उसकी फोटो ही दिखा दो। मां-बहनों के साथ बलात्कार हो जाए, तो यह राज्य उसे इंसाफ़ दिलाने के लिए नहीं, मामला दबाने के लिए काम करता है।

फिर भी कहिए कि बिहार में सब चकाचक है। अखबारों के पन्नों पर संपूर्ण सुशासन है और सत्तासीनों के कंठ में लच्छेदार भाषण है। पिछले टर्म में केंद्र के पैसे से कुछ सड़कें बन गईं और कुछ लड़कियों को साइकिलें बांट दी गईं। अब बिहार को कुछ और नहीं चाहिए। क्रेडिट भी मिल गया। दोबारा सत्ता भी मिल गई। अब मीडिया से अपेक्षा यह है कि हमारी लूट-खसोट पर अपना मुंह बंद रखो।

अंग्रेज़ों की फूट डालो और राज करो वाली नीति यहां भी एप्लाई की गई। बिहार में बेहद चालाकी से प्रिंट मीडिया और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया की एकता तोड़ दी गई। आज दोनों दो ध्रुव की तरह दिखाई देते हैं। किसी इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के पत्रकार के साथ कुछ हो जाए, तो बिहार का प्रिंट मीडिया नहीं बोलेगा। उस वक्त न वो पत्रकार का, न बिहार का, बल्कि सरकार का हित देखेगा।

इसके बावजूद हम यही कहेंगे कि कसूर प्रिंट के पत्रकारों का नहीं, सरकार का है और मीडिया घरानों का है। दोनों के नेक्सस में बेचारा पत्रकार पिस रहा है, डरा हुआ है, लाचार है। उसका भी परिवार है। उसके भी बीवी-बच्चे हैं। क्या करेगा वह? अपनी नौकरी बचाए या क्रांति करे? उसकी इसी मजबूरी और डर का फ़ायदा यह नापाक गठजोड़ उठा रहा है।

और ये बेचारे काटजू साहब बिहार के अखबारों को सेंसरशिप से क्या मुक्त कराएंगे, ख़ुद उन्हीं की ख़बर को यहां के अखबारों ने सेंसर कर दिया। हालत यह हो गई कि काटजू की जांच टीम की रिपोर्ट से जुड़ी ख़बर तक सरकारी विज्ञापन की घूस खाने वाले बिहार के बड़े अखबारों ने नहीं छापी। जहां इतनी गुलामी हो, वहां आज़ादी की लड़ाई लड़ने के लिए कौन आगे आएगा?

ऐसे में अगर प्रिंट मीडिया के हमारे भाई-बहन अपनी ही लड़ाई के लिए आगे नहीं आ रहे, तो हम उनका डर भी समझते हैं और मजबूरी भी। किडनैप हुए किसी व्यक्ति से यह उम्मीद नहीं की जा सकती कि वह किडनैपर से लड़े, इसलिए अभी उनकी यह लड़ाई हमें ही शुरू करनी होगी, पर एक दिन जब किडनैपर के किले में छेद हो जाएगा, तब हमें यकीन है कि उनका भी हौसला बढ़ेगा। वो भी दहाड़ेंगे और किडनैपर की सारी हेकड़ी भुला देंगे।

फिलहाल इस लड़ाई में बिहार की क्रांतिधर्मी जनता का समर्थन सबसे ज़्यादा ज़रूरी है। उनके भीतर से आवाज़ें उठनी चाहिए। अपनी सरकार से उन्हें सवाल पूछने चाहिए। अपने जनप्रतिनिधियों का घेराव करना चाहिए। अगर वह मानते हैं कि वे बिके हुए अखबारों को खरीद रहे हैं, तो उन्हें खरीदना तत्काल बंद कर देना चाहिए।

सड़कों पर उतरकर उन अखबारों को जला देना चाहिए, जिन अखबारों का एक-एक शब्द बिका हुआ है। जिन अखबारों में पत्रकारों की सच्चाई की स्याही नहीं, मजबूरी का ख़ून छपा हुआ है, उन अखबारों को ख़रीदकर उनका धंधा चमकाना बंद करना चाहिए। बिहार में स्वतंत्र पत्रकारिता का परचम बुलंद हो और पत्रकारों को आज़ादी मिले- इसके लिए यह बेहद ज़रूरी है।

यह होगा- तभी मीडिया घरानों को यह संदेश जाएगा कि सरकार के साथ मिलकर जो नापाक गठजोड़ उन्होंने बनाया है, उसकी वजह से पाठक उनके अखबार से नफरत करने लगे हैं। और सरकार को भी इतनी अकल आ जाएगी कि जैसे चुनाव-पूर्व मनपसंद सर्वेक्षण कराकर चुनाव नहीं जीते जाते, वैसे ही अखबारों में फ़र्ज़ी रिपोर्ट छपवाकर न सुशासन लाया जाता है, न जनता का दिल जीता जाता है।

इसलिए हमारी आज की आखिरी पंक्ति यही होगी कि बिहार और देश के कलम के सिपाहियो एक हो। ये लोग ज़मी बेच देंगे, गगन बेच देंगे। कली बेच देंगे, चमन बेच देंगे। कलम के सिपाही अगर सो गए तो, वतन के ये मसीहा वतन बेच देंगे। जय कलम। जय हिन्द।

…………………………………………………………………………अभिरंजन कुमार कि कलम से..