पुरालेख

इनकाउटंर का दर्द

इनकाउटंर का दर्द
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थोड़ी देर पहले हमारे एक आईपीएस अधिकारी मित्र फोन आया था इशरत जहां फर्जी मुठभेड़ के सिलसिले में। उन्होने बातचीत के दौरान मुझसे कई सवाल किये जिसका में जबाव नही दे सका, उम्मीद है आप मुझे उनके सवाल के जबाव में मदद करेगे।
इन अधिकारी से मेरा कोई 10 वर्ष पूराना रिश्ता है। संयोग ऐसा रहा कि इनके साथ कई जिलो में साथ काम करने का मौंका मिला ये एसपी थे तो मैं पत्रकार लेकिन कभी भी मानवाधिकारी या फिर फर्जी मुकदमें को लेकर हमलोगो के बीच टकराव नही हुआ। जब भी मेरी जानकारी में ऐसा कुछ पता चला या फिर मैंने खबर चलाया तो 24 घंटे के अंदर कारवाई हो जाती थी।
लेकिन आज उनके कई सवालो का जबाव मेरे पास नही था सबसे बड़ी बात यह है कि यह सवाल वैसे पुलिस अधिकारी का है जो खुद मानवाधिकार और कानून को लेकर काफी गम्भीर है।इनका पहला सवाल था इशरत जहां इनकाउन्टर में जेल में बंद आईपीएस अधिकारी और इस इंनकाउटर में मारे गये चारो व्यक्ति के बीच पहले से कोई रंजिश थी क्या। दूसरी बात आईपीएस अधिकारी सौ आतंकी को मार गिराये वो सीधे डीजीपी नही बन सकता है ।ठिक है मैंने माना कि पकड़ कर चारो को मारा गया किसके लिए ।
गुजरात देश का एक मात्र राज्य है जहां आतंकी जाने से पहले हजार बार सोचता है पूरे देश में आये दिन आंतकी घटनाये हो रही हैं।आप लोग इनते डिवेट करा रहे है अब लोग इशरत को बिहार से जोड़ रहे हैं अगर पुलिस और सेना इस नजरिया से काम करने लगे तो कितने घंटे चैन से सो सकते हैं हमारे देश की जनता। सीमा पर सेना पड़ोसी मुल्क से फिस्किंग कर ले अंदर पुलिस अपराधियों से मिल जाये कितने देर अराम से रह लेगे।पुलिस पर तो आरोप क्या हर कोई कहता है चोर और अपराधी से मिला है। कहने वाले तो यहां तक कह रहे है कि पुलिस ही अपराध करा रहा है। तीन दिन थाना बंद करके देख लिजिए। समाज में इतना ही दम है तो चला कर देख लिजिए ।चोर को या अपराधी को पुलिस किसके लिए पिटता है पिटना गलत है मैं भी मानता हूं लेकिन हमारे पास पिटाई के अलावा कोई और व्यवस्था है जिससे किसी अपराधिक घटनाओ को सुलझाया जा सके ।
इतने जो लोग चीख चीख कर भाषण दे रहे हैं कभी वो पुलिस के थाने में जहां वो रात गुजारता है चले जाये एक दिन वो रह जाये तो मान जायेगे।फिर समाज के प्रबुद्ध लोगो से आग्रह है 5 घंटे थाना के कार्यकलाप में शामिल होकर देखे, टीवी में या फिर कारगिल चौक से भाषण देना आसान है।
पुलिस क्यों फर्जी इनकाउटंर करती है इस पर कभी सोचे हैं पुलिस के पास जब कोई विकल्प नही बचता है तब उसको मारता है किसके लिए अमन चैन देश में और समाज में कायम रहे। आप छोटा कोई क्रायम करिए जमानत लेने में हालत खराब हो जायेगा लेकिन वैसे अपराधी को जेल भेजिए आज गया और कल बाहर ।और बाहर निकलते ही क्रायम शुरु आप गवाही नही दिजिएगा कोर्ट तारीख पर तारीख देगा कैसे चलेगा व्यवस्था। पुलिस को गाली देने से समस्या का समाधान हो जायेगा। पंजाब के आंतकियों को क्या बातचीत से पटरी पर लाया गया।
केपीएस गिल के दहशत से पंजाब नियंत्रण में आया और बाद में क्या हुआ गिल के साथ काम करने वाले कई आईपीएस अधिकारियो को जेल जानी पड़ी कई ने तो आत्महत्या कर लिया। किसके लिए ठिक है उस दौर में कई निर्दोश लोग भी मारे गये लेकिन पुलिस के पास दशहत फैलाने के अलावे और कोई ट्रेनिंग नही दी जाती है जब स्थिति नियत्रंण से बाहर होने लगती है तभी पुलिस इस तरह के एक्सन में आती है। और इस दौरान कई निर्दोश लोग भी मारे जाते हैं।लेकिन शांति के लिए समाज और देश को इस तरह कि किमत तो चुकाना ही पड़ेगा।नही तो तैयार रहिए आ रहा है नक्सली अब हमारी बारी तो खत्म होने पर है।संतोष जी कभी नक्सलियों के खिलाफ चलाये जा रहे अप्रेशन के दौरान साथ चलिए फोर्स कितना टूट चुका है इसका एहसास हो जायेगा।फोर्स का मनोबल इतना गिर गया है कि कोई हमला होता है तो पुलिस लड़ने के लिए नही जान बचाने के लिए गोली चलाता है और तब तक गोली चलाता रहता है जब तक कि बच कर निकल नही जाता है। क्यों नही समस्या का समाधान हो रहा है। नक्सल इलाके में विकास नही हुआ इसके लिए पुलिस जिम्मेवार है क्या, जगंल का दोहन हो रहा है इसके लिए पुलिस जिम्मेवार है ,विकास गांवो तक नही पहुंचा इसके लिए पुलिस जिम्मेवार है ,जमीन के विवाद का हल नही हो रहा है, इसके लिए पुलिस जिम्मेवार है, देश में फैल रहे आंतकवाद के लिए पुलिस जिम्मेवार है क्या।जब हम जिम्मेवार नही है तो फिर मुझे इन समस्याओ के कारण उपजे आक्रोश को शांत करने की जिम्मेवारी क्यो दी जा रही है जब कि सबको पता है कि पुलिस का क्या काम है। हम ज्यादा परेशान हुए दिन का चैन और रात की नींद लूटी तो फिर हम वही करेगे जो इशरत के साथ किया गया । इसको कोई रोक नही सकता सारे सिस्टम को साथ मिलकर काम करने की जरुरत है और रही बात पुलिस को संतोष जी आप याद रखिएगा किसी भी राज सत्ता का प्रतीक पुलिस होता है और पुलिस को जिस तरीके से साधन विहिन रखा जा रहा है नुकसान उठाने के लिए तैयार रहिए। नये लड़के जो आ रहे हैं ना उन्हे कोई कमीटमेंन्ट नही है समाज ,व्यवस्था और देश के प्रति नौकरी छोड़ने में इन नये लड़के को वक्त नही लगता है। टाईलेन्टेंड लड़के आ रहे हैं उनसे आप ज्यादा कुछ करा भी नही सकते हैं कप्तान और खेलाड़ी दोनो का वही हाल है एमएम पास पुलिस बन रहा है ।उसको अपना डियूटी पता हो या न हो राईट जरुर पता है।पुलिस को आधुनिक तकनीक से लैंस करिए सुविधा दिजिए काम का बोझ कम किजिए मानवीय व्यवहार मिलेगा नही तो चलिए इसी तरह आरोप प्रत्यारोप चलता रहेगा। और एक समय बाद पुलिस वेतन लेगी और घर जायेगी लोग भुगतते रहेगे।
उस आईपीएस अधिकारी के परिवार के बारे में कभी सोचा है किसके लिए फर्जी इनकाउंटर किया ।पंजाब में एक दर्जन से अधिक आईपीएस अधिकारी या तो जेल में है या फिर सोसोईड कर लिया है किसके लिए पुलिस वालो की जमीन जोत लिया या फिर बहु बेटी का इज्जत ले लिया। सोचिए संतोष जी आने वाला वक्त बेहद मुश्किल होने वाला है। आपसे अपना दर्द इसलिए शेयर कर रहा हूं कि मुझे लगता है आप इस सच से समाज को अवगत करायेगे और लोगो में पुलिस के प्रति नजरिया बदलेगा। बाय चलिए आज मुलाकात होनी चाहिए साथ व़ृदावन का डोसा खाते हैं।

 

साभार : रंजू संतोष

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जेडीयू को छोड़कर फ़ायदे में रहेगी, सुकून से जिएगी बीजेपी

सुशील मोदी बिहार में नीतीश कुमार के सबसे सुशील और वफादार भाई माने जाते रहे हैं, लेकिन जिस तरह से आगे आकर उन्होंने जेडीयू पर हमला बोला है, उससे साफ़ है कि दोनों दलों के बीच हालात कितने बिगड़ चुके हैं। अब दोनों दलों के बीच दो खेल एक साथ चल रहे हैं। एक तरफ़ दोनों एक-दूसरे को मक्खन लगाने की भी कोशिशें कर रहे हैं, दूसरी तरफ़ बात इतनी बिगड़ गई है कि संभालते-संभालते भी कुछ-न-कुछ उल्टा हो ही जाता है।

मक्खन लगाने की कोशिशों के तहत ख़ुद मुख्यमंत्री नीतीश कुमार का ही बयान लें। जो नीतीश कुमार नरेंद्र मोदी की आलोचना करके नहीं अघा रहे, उन्हीं नीतीश कुमार को अब गिरिराज सिंह तक की तारीफ़ सूझ रही है। मंगलवार 16 अप्रैल को एक कार्यक्रम में उन्होंने अपने ऊपर आम तौर पर हमलावर रहने वाले अपने पशुपालन मंत्री की तारीफ़ में कसीदे पढ़े। कहा कि वे अपने घर पर बकरी पालते हैं और मेहमानों को बकरी के दूध की चाय पिलाते हैं। महात्मा गांधी भी बकरी का दूध पिया करते थे। यानी नरेंद्र मोदी में नाथूराम गोडसे (सांप्रदायिकता) ढूंढ़ते-ढूंढ़ते नीतीश जी को गिरिराज सिंह में महात्मा गांधी नज़र आने लगे हैं। हा हा हा…

लेकिन अब गांधी ढूंढ़ने से बात कितनी बनेगी, कहना मुश्किल है, क्योंकि दोनों पार्टियों में बहुत सारे नेता भगत सिंह बनकर एक-दूसरे की असेंबली के बाहर बम पर बम फोड़े जा रहे हैं। इधर से सुशील मोदी ने बम फोड़ा- ‘‘बिना नाम लिये नरेंद्र मोदी के ऊपर संकेतों में जदयू ने जो हमला किया है, वह दुर्भाग्यपूर्ण है, और यह नहीं होना चाहिए था। भाजपा के देश भर के कार्यकर्ता और समर्थक इस प्रकरण से दुखी और मर्माहत हैं।’’ सुशील मोदी ने यह भी बता दिया कि “18 अप्रैल को राजनाथ सिंह ने दिल्ली में बिहार भाजपा की कोर कमेटी की बैठक बुलाई है। उसमें राज्य की वर्तमान राजनीतिक स्थिति पर चर्चा होगी। गठबंधन जारी रखने या न रखने के बारे में पार्लियामेंट्री बोर्ड उचित समय पर उचित निर्णय लेगा।”

जेडीयू की तरफ से बम फोड़ा बड़बोले बाबा माने जाने वाले शिवानंद तिवारी जी ने। गुस्से में बोले- “जिसे जाना है जाए, हम कोई पकड़कर रखे हैं। हम कोई उनका पैर पकड़ रहे हैं क्या? नरेंद्र मोदी सेक्युलर हैं तो (पीएम कैंडिडेट का) नाम घोषित करें न। हम कोई उनको रोके हुए हैं।”

इतना ही नहीं, बीजेपी प्रवक्ता मीनाक्षी लेखी के गोधरा कांड से जुड़े बयान पर तो नीतीश जी चुप्पी साध गए थे, लेकिन लालू जी के उकसावे पर बोल ही गए। लालू ने कहा था कि गोधरा कांड के समय नीतीश रेल मंत्री थे। उनको गोधरा कांड की ज़िम्मेदारी लेनी चाहिए। नीतीश जी ने कहा कि कोई डीरेलमेंट हुआ था जो हमारी ज़िम्मेदारी थी। कानून व्यवस्था का मामला राज्य सरकार का होता है, इसलिए राज्य सरकार की ज़िम्मेदारी थी। यानी फिर नरेंद्र मोदी पर निशाना।

“तीर” कमान से और बात ज़ुबान से निकल जाए, तो वापस नहीं आते। और यहां तो तीर पर तीर, एक से एक वीर। ऐसे में सबसे बड़ा सवाल यही है कि गठबंधन चलेगा कि नहीं? अविश्वसनीय, मौकापरस्त और पल-पल बदलती राजनीति के इस दौर में इसका पक्का जवाब देना तो अभी मुश्किल है, लेकिन मुझे लगता है कि पैंतरे दिखाने की शुरुआत तो नीतीश जी ने की, लेकिन एक सुनहरा मौका दे दिया है उन्होंने बीजेपी को, इस गठबंधन से निकल आने का। अगर बीजेपी यह साहस दिखाए तो निश्चित रूप से वह फायदे में रहेगी और नीतीश जी को इसके भयंकर राजनीतिक नुकसान उठाने होंगे।

पहले यह समझ लेते हैं कि जेडीयू से तलाक लेकर बीजेपी को क्या-क्या फायदे होंगे।

1. फायदा नंबर वन- अगर बीजेपी स्वाभिमान और आत्मनिर्भरता वाली पॉलिटिक्स करना चाहती है, तो उसे रोज़-रोज़ की बेइज़्ज़ती से मुक्ति मिल जाएगी। गिरिराज सिंह, अश्विनी चौबे सरीखे नेताओं से बात करिए तो इस बेइज़्ज़ती की टीस आपको महसूस होगी और पता चलेगा कि नीतीश कुमार ने समय-समय पर बीजेपी को किस तरह ज़लील किया है।

2. फायदा नंबर दो- जेडीयू के साथ रहकर बीजेपी लोकसभा की सिर्फ़ 15 सीटें लड़ पाएगी, लेकिन जेडीयू को छोड़कर 40 सीटों पर लड़ेगी। एक राष्ट्रीय पार्टी के लिए यह कोई अच्छी स्थिति नहीं होती कि वह किसी राज्य में, जहां उसकी ठीक-ठाक स्थिति और संभावना हो, वहां गठबंधन के नाम पर वह 40 में सिर्फ़ 15 सीटों पर लड़े, 25 पर न लड़े। अभी बीजेपी सारी सीटें भी जीत ले, तो 15 सीटें जीतेगी, लेकिन 40 सीटों पर लड़ने की सूरत में उसके पास अपनी सीटें और बढ़ाने का मौका रहेगा।

3. फायदा नंबर तीन- जिन सीटों पर आप नहीं लड़ते, वहां आपके कार्यकर्ताओं का उत्साह और मनोबल समाप्त हो जाता है। इस लिहाज से बिहार की 25 सीटों पर बीजेपी के कार्यकर्ता डेड पड़े हैं। जेडीयू से अलग होने की सूरत में उनमें जोश आएगा और कुछ कर दिखाने का मौका मिलेगा। बड़ी पार्टियों को हर चुनाव सिर्फ़ सीटें जीतने के ख्याल से नहीं, बल्कि अपने कार्यकर्ताओं का मनोबल बनाए रखने के ख्याल से भी लड़ना चाहिए। कार्यकर्ता सक्रिय होंगे, तो उन सीटों पर जनाधार भी तैयार होगा।

4. फायदा नंबर चार- पार्टी में चुनाव के समय टिकट को लेकर असंतोष और सिर-फुटौव्वल कम होगा। अभी आप सिर्फ़ 15 लोगों को टिकट दे सकते हैं, जेडीयू से अलग होने पर आप 40 नेताओं को टिकट देंगे। ज्यादा टिकट बंटेंगे, तो सिर-फुटौव्वल कम होगा। पार्टी कार्यालय में कुर्सियां कम टूटेंगी और मारपीट भी कम होगी। (कृपया पिछले विधानसभा चुनाव को याद करें।)

5. फायदा नंबर पांच- नीतीश जी का अहंकार टूटेगा। उन्हें अहसास होगा कि उनके सर्वशक्तिमान बनने में आधी शक्ति और सीटें बीजेपी की भी थीं। चूंकि सारी चीज़ों का क्रेडिट उन्होंने लूटा है, अपनी आदमकद फोटो के साथ हाथ हिलाते हुए “मैं बिहार हूं” का पोस्टर उन्होंने छपवाया है, तो सारा एंटी-इनकम्बेन्सी भी वही झेलेंगे। राज्य में बड़ी संख्या में लोग उनके दूसरे कार्यकाल में व्याप्त भ्रष्टाचार, नाइंसाफ़ी और उनके तानाशाही तेवर से नाराज़ हैं। ढाई लाख नियोजित शिक्षकों के परिवारों के 10 लाख वोटर तो सीधे-सीधे चुनाव में उन्हें धूल चटाने का इरादा करके बैठे हैं। दूसरे बहुत सारे नाराज़ लोग भी हैं। खासकर रेप-गैंगरेप-छेड़खानी की बढ़ती घटनाओं और शराब को बढ़ावा दिए जाने से नाराज़ महिलाएं।

6. फायदा नंबर छह- चुनाव में मुख्य मुकाबला बीजेपी और आरजेडी के बीच होगा और जेडीयू तीसरे नंबर की पार्टी बन जाएगी। सवर्णों के वोट बीजेपी को मिलेंगे और अल्पसंख्यकों के वोट आरजेडी को मिलेंगे। नीतीश कुमार के दलित-महादलित जनाधार में भी सेंध लगेगी। सुशील मोदी ने रविवार 14 अप्रैल को कहा भी है कि जो लोग दावा करते हैं कि दलित-महादलित पर हमारा प्रभाव ज्यादा है, उन्हें पता होना चाहिए कि दोनों वर्गों के बिहार के शीर्ष नेता भाजपा के पास हैं। उन्होंने कटिहार और आसपास के ज़िलों में अच्छा असर रखने वाले महादलित नेता रामजी ऋषिदेव, राजगीर से लगातार आठ बार के विधायक रविदास समाज के नेता और नीतीश कैबिनेट में मंत्री सत्यदेव नारायण आर्या, मेहतर समाज से विधायक भागीरथी देवी, रजवार समाज से विधायक कन्हैया रजवार और पूर्व केंद्रीय मंत्री और भाजपा अनुसूचित जाति मोर्चा के राष्ट्रीय अध्यक्ष संजय पासवान का जिक्र कर बताया कि बीजेपी में अनुसूचित जाति के 18 विधायक और एक सांसद हैं। सुशील मोदी का यह आत्मविश्वास सिर्फ़ बयान तक न रह जाए, उसे चुनाव में परखने का मौका भी मिलना चाहिए।

7. फायदा नंबर सात- नीतीश कुमार एक्सपोज़ हो जाएंगे। न इधर के रहेंगे, न उधर के। 17 साल बीजेपी के साथ रहकर जब उसे गरियाते हुए निकलेंगे तो हर कोई उनपर हंसेगा। इसी तरह जीवन भर जिस कांग्रेस को गरियाया, जब उसके साथ जाएंगे, तो उनकी स्थिति और हल्की और हास्यास्पद हो जाएगी। ऊपर से कांग्रेस कहीं उनका भी वही हाल न करे, जैसा हाल झारखंड में जेएमएम के पिता-पुत्र शिबू सोरेन और हेमंत सोरेन का किया। पहले बीजेपी के ख़िलाफ़ चढ़ाया, सरकार गिरवाई और बाद में औकात बता दी। वैसे ही बिहार में कांग्रेस पहले जेडीयू को चढ़ाकर बीजेपी से अलग करवाएगी, फिर हो सकता है कि न तो विशेष राज्य का दर्जा दे, न गठबंधन करे। बहुत मुमकिन है कि आखिरी लम्हों में कांग्रेस लालू और रामविलास से गठबंधन कर ले। याद रखें कि पार्टी ने लालू के खासमखास और उनकी सरकार में मंत्री रहे अशोक चौधरी को अपना प्रदेश अध्यक्ष बनाया है।

मालूम नहीं, बीजेपी के रणनीतिकार क्या सोचते हैं, लेकिन अगर बीजेपी को केंद्र में सरकार बनानी है, तो उसे ज़्यादा से ज़्यादा सीटें लड़ने और जीतने की सोच रखनी चाहिए। अगर 1999 से अब तक लगातार उसकी सीटें गिर रही हैं, तो मेरे विचार से इसकी एक बड़ी वजह गठबंधन की पार्टियों पर उसकी बढ़ती निर्भरता भी है। 1999 में उसने 183, 2004 में 138 और 2009 में मात्र 115 सीटें जीतीं। उत्तर प्रदेश जैसे राज्य में सत्तालोलुपता के चक्कर में पड़कर उसने मायावती जैसी मायावी नेत्री से गठबंधन किया और अपना जनाधार खो दिया। गठबंधन अपना जनाधार और सीटें बढ़ाने के लिए होना चाहिए, न कि जनाधार खिसकता रहे और गठबंधन में मस्त रहें।

अगर बीजेपी को इस बार कांग्रेस को पछाड़ना है और केंद्र में सरकार बनानी है, तो उसे अपना आंकड़ा करीब 200 सीटों तक पहुंचाना ही पड़ेगा, जो कि उसकी मौजूदा रणनीति में संभव नहीं दिखाई दे रहा। बीजेपी को समझना चाहिए कि वो जितनी अधिक सीटें जीतेगी, एनडीए में उसे कम से कम पार्टियों की ज़रूरत पड़ेगी, यानी सरकार ज़्यादा मज़बूती और स्थिरता से चलेगी, टांग-खिंचाई कम होगी, बड़े फ़ैसले लेने में आसानी होगी।

व्यक्तिगत मैं राष्ट्रीय पार्टियों के घटते दबदबे को कोई शुभ लक्षण नहीं मानता हूं, क्योंकि इस बात के बावजूद कि दोनों प्रमुख राष्ट्रीय पार्टियां निम्न कोटि की राजनीतिक नैतिकता और तमाम तरह के भ्रष्टाचार की प्रैक्टिस में संलग्न हैं, अधिकांश क्षेत्रीय दलों की तुलना में वे अब भी बेहतर हैं। क्षेत्रीय दल ज़रूरत से अधिक क्षेत्रवाद तो करते ही हैं, लेकिन भ्रष्टाचार, राजनीति के अपराधीकरण, वंशवाद, जातिवाद, सांप्रदायकिता और कई अन्य तरह की संकीर्ण राजनीति करने में भी राष्ट्रीय दलों के कान काटते हैं। इसका विस्तृत विश्लेषण कभी और किया जा सकता है, लेकिन मैं बहुत सोच-समझकर इस नतीजे पर पहुंचा हूं। इसलिए राष्ट्रीय दलों की अलग-अलग प्रदेशों में क्षेत्रीय दलों पर बढ़ती निर्भरता से मुझे कोई ख़ुशी नहीं होती है। मैं चाहता हूं कि देश में उदार और समग्र राष्ट्रीय सोच रखने वाली चार-पांच बड़ी पार्टियां हों। बस। इस लिहाज से कांग्रेस और बीजेपी के अलावा कुछ लेफ्ट पार्टियों को मैं और मज़बूत देखना चाहूंगा। साथ ही इन तीनों के अलावा एक चौथा मज़बूत और साफ-सुथरा राष्ट्रीय राजनीतिक विकल्प भी तैयार हो सके, तो और अच्छा।

बहरहाल, बीजेपी में अगर तनिक भी राजनीतिक विवेक, स्वाभिमान और जुझारूपन बचा है, तो यही उसके लिए सही समय है जेडीयू से अलग होकर बिहार में अपनी नई ज़मीन तैयार का और सांप्रदायिक राजनीति छोड़कर अपने चाल, चेहरा और चरित्र में महज नारों वाली नहीं, असली शुचिता लाने का।

………………………………साभार ………………………………………………अभिरंजन कुमार

नीतीश जी, हवा बांधने से देश नहीं चलता!

नीतीश कुमार बिना नाम लिए जो सवाल नरेंद्र मोदी से पूछ रहे हैं, वही सवाल मैं नाम लेकर नीतीश जी से पूछना चाहता हूं- 
1. कैसा विकास होना चाहिए? 
2. हम विकास भी कर जाएं और भुखमरी के शिकार भी लोग रहें तो कैसा विकास? 
3. हम विकास भी कर जाएं और कुपोषण के शिकार भी लोग रहें तो कैसा विकास? 
4. हम विकास भी कर जाएं और पीने का पानी न मिले, तो कैसा विकास?”

नीतीश जी कहते हैं कि “विकास का मतलब बुनियादी ढांचे का विकास और मानव विकास दोनों है। जितना जोर बुनियादी ढांचे पर होगा, कल-कारखाने पर होगा, उससे कम जोर मनुष्य के विकास पर नहीं होना चाहिए।” उनका कहना है कि “ऐसा न विकास का मॉडल लोग चला दें कि और गैरबराबरी बढ़ जाए। विकसित लोग और विकसित हो जाएं और पिछड़े लोग और पिछड़ जाएं।”

नीतीश जी ये भी कहते हैं कि “ढाई हज़ार साल का इतिहास है। हम कभी तिजारत के लिए नहीं जाने जाते थे। हम या तो सुशासन के लिए जाने जाते रहे या ज्ञान के लिए जाने जाते थे। पाटलिपुत्र सत्ता का केंद्र था और नालंदा ज्ञान का केंद्र था।”

बातें बड़ी-बड़ी हैं। इनसे कोई असहमत नहीं हो सकता। लेकिन उनकी हर बात से सहमत होते हुए ही मैं वे सवाल उछाल रहा हूं, जो उन्होंने परोक्ष रूप से नरेंद्र मोदी के लिए उछाले हैं। जानता हूं कि जवाब नहीं मिलेगा, क्योंकि नीतीश जी उन सवालों के जवाब नहीं दिया करते, जो उन्हें असहज करते हैं। वो कहते ज़रूर हैं कि “हवा बांधने से देश नहीं चलता”, लेकिन सच्चाई यह है कि हवा बांधकर ही वे सब कुछ चलाना चाहते हैं। 

हो सके तो नीतीश जी यह बताएं कि बिहार में कुपोषण कितना कम हो गया है। उनके सत्ता संभालने के बाद से बिहार के मुज़फ्फरपुर और गया समेत करीब दस ज़िलों में इनसेफलाइटिस या एक्यूट इनसेफलोपैथी सिंड्रोम- जो भी कहें, उनसे होने वाली मौतों में बेइंतहां वृद्धि क्यों हुई है? पिछले साल ऐसे करीब तीन सौ बच्चे मारे गए, जिन्हें कायदे से समूची इक्कीसवीं सदी जीनी थी। हम सब ज़िंदा रहे और हमारी आंखों के सामने हमारे छह-छह महीने साल-साल दो-दो साल के वे बच्चे छटपटाते हुए बिलखते हुए दम तोड़ते रहे। राज्य के स्वास्थ्य मंत्री और सचिव ने ख़ुद कहा था कि ये बीमारी गंदगी, गरीबी और कुपोषण की वजह से फैलती है। अब अगर ये बीमारी पहले से ज़्यादा विकट रूप में सामने आ रही है, तो क्या इसका सीधा-सीधा मतलब ये नहीं है कि उन इलाकों में गंदगी, गरीबी और कुपोषण का असर बढ़ा है?

यह क्या माजरा है कि बिहार में ऐसी-ऐसी बीमारियों ने दोबारा सिर उठा लिया है, जिनके बारे में माना जाता था कि उनका उन्मूलन हो चुका है। अभी मुज़फ्फरपुर और कटिहार में चेचक के सैकड़ों केस सामने आए हैं। डायरिया से तो हर साल हमारे सैकड़ों बच्चे मरते ही हैं। अगर नीतीश जी ने लोगों को पीने का साफ़ पानी मुहैया करा दिया है तो फिर क्यों साफ़ पानी न मिलने की वजह से बड़ी संख्या में लोगों की अकाल-मृत्यु हो रही है? हो सके तो नीतीश जी बिहार के सिर्फ़ एक गांव का नाम बता दें, जहां पिछले साढ़े सात साल में सरकारी प्रयासों से लोगों को पीने का साफ़ पानी मिल गया हो। 

अगर बिहार में भुखमरी नहीं है तो क्यों जहानाबाद में महादलितों, जो उनके एजेंडे पर कथित रूप से सबसे ऊपर हैं, के बच्चे आज भी चूहे मारकर खा रहे हैं और क्यों पटना सिटी में गरीबों के बच्चे नालियों से मछलियां पकड़-पकड़कर खा रहे हैं? अगर बिहार में भुखमरी नहीं है, तो क्यों नीतीश जी के स्कूलों में कई बार ऐसा हुआ कि बच्चे छिपकली वाली खिचड़ी खा-खाकर बीमार पड़े और कइयों की तो मौत भी हुई? किसी मां-बाप की वो कौन-सी मजबूरी होती है कि वह अपने बच्चों को छिपकिली वाली खिचड़ी खाने के लिए घटिया स्कूलों में भेज देता है? बिहार में इस वक्त सरकारी स्कूलों की जितनी ख़राब दशा है, उसे देखते हुए यह कहना ग़लत नहीं होगा कि उन घटिया स्कूलों में अब सिर्फ़ उन्हीं परिवारों के बच्चे पढ़ रहे हैं, जिन परिवारों में भुखमरी की स्थिति है। बिहार में भुखमरी में जी रहे परिवारों का पता करना हो, तो सबसे पहले यह पता कर लीजिए कि यहां के घटिया सरकारी स्कूलों में कितने परिवारों के बच्चे पढ़ रहे हैं। 

अगर बिहार में ग़ैरबराबरी पर चोट करने वाली नीतियां अपनाई जा रही हैं, तो क्यों 38 में से 37 ज़िलों में प्रति व्यक्ति आय राज्य की प्रति व्यक्ति आय से काफी नीचे है? बिहार की प्रति व्यक्ति प्रति दिन की आय 70 रुपये 28 पैसे है, लेकिन सिर्फ़ राजधानी पटना के लोगों की आय इस औसत से ज़्यादा है- 146 रुपये 68 पैसे। बाकी 37 जिलों में से 36 ज़िलों के लोगों की आय 40 रुपये से नीचे है और 37वें ज़िले मुंगेर के लोगों की आय 51 रुपये 14 पैसे है। अगर बिहार में ग़ैरबराबरी नहीं बढ़ रही है, तो इस बात का क्या जवाब है कि आख़िर क्यों 7 ज़िलों में लोगों की आमदनी घट गई? क्यों शिवहर में आज भी एक व्यक्ति 15 रुपये 12 पैसे प्रतिदिन पर जी रहा है?

क्या नीतीश जी इस सवाल का जवाब दे सकेंगे कि बिहार में किसका विकास हो रहा है? बेईमान नेताओं, शराब-माफिया, ठेकेदारों, ज़मीन कब्ज़ाने वालों, बिल्डरों, घूसखोर अफसरों, भ्रष्ट मुखिया-सरपंचों के अलावा और किस-किसका विकास हो रहा है बिहार में? 

अगर बिहार में सचमुच का विकास हो रहा है तो पलायन दिन-ब-दिन क्यों बढ़ता जा रहा है? असम में, महाराष्ट्र में, दूसरे राज्यों में बिहारी मारे जा रहे हैं, दुरदुराए जा रहे हैं, इसके बावजूद वे बिहार में क्यों नहीं टिकते? आज बिहार के ज़्यादातर ग़रीब परिवारों के किशोर और नौजवान दूसरे राज्यों में मज़दूरी करने चले गए हैं। मनरेगा जैसी योजनाएं चलाए जाने के बावजूद ऐसे हालात क्यों बन गए हैं- क्या नीतीश कुमार जी इसका जवाब दे सकेंगे? अकेले मनरेगा में 80 प्रतिशत भ्रष्टाचार से किसका विकास हो रहा है? 20 लाख फ़र्ज़ी जॉब कार्ड का फ़ायदा किन ग़रीबों को मिल रहा है?

बिहार की पहचान अगर ज्ञान के केंद्र के रूप में रही, तो फिर छात्र अपने ही राज्य में रुककर पढ़ाई क्यों नहीं कर रहे? सच्चाई तो यह है कि प्राइमरी स्कूलों से लेकर विश्वविद्यालयों तक की जितनी बुरी स्थिति नीतीश जी के कार्यकाल में हो गई है, उतनी बुरी स्थिति बिहार के ढाई हज़ार साल के उस इतिहास में, जिसका नीतीश जी ज़िक्र कर रहे हैं, कभी नहीं थी। ख़ुद हम बिहार के सरकारी स्कूलों और कॉलेजों से पढ़कर निकले, लेकिन अब की तुलना में हालात तब काफी बेहतर थे। आज तो नीतीश जी के स्कूलों में सिर्फ़ मज़दूरों और ग़रीब किसानों के बच्चे पढ़ रहे हैं और अगर यही हाल रहा तो इन स्कूलों से अपवादों को छोड़कर सिर्फ़ मनरेगा के मज़दूर, नक्सली और बाहुबली नेताओं की बंदूकें ढोने वाले ही निकलेंगे- यह तय मानिए। 

किसी साथी ने इसी फेसबुक पर कहा था कि लालू के राज में जितनी ख़राब स्थिति सड़कों और कानून-व्यवस्था की हो गई थी, नीतीश के राज में उससे ज़्यादा ख़राब स्थिति शिक्षा की हो गई है। इसके बावजूद अगर नीतीश कुमार बिहार के ज्ञान का ढिंढोरा पीट रहे हैं तो इसे क्या कहा जाए? 

पिछले साढ़े सात साल में बिहार में कुछ सड़कें ज़रूर बनी हैं, लेकिन हिन्दुस्तान के किस पिछड़े से पिछड़े राज्य में इन बर्षो में सड़कें नहीं बनी हैं, कोई मुझे यह भी बता दे। और साथ ही यह भी बता दे कि बिहार में जो सड़कें बनी हैं, उनका स्तर क्या है, उनकी क्वालिटी कैसी है और इन सड़कों में नीतीश जी की सरकार का कितना योगदान है और केंद्र की सरकार का कितना योगदान है? साथ ही कितने पैसे इन सड़कों में खाए गए हैं? अगर खाने का स्कोप नहीं होता, तो क्या ये सड़कें बनाई जातीं?

सड़कों का ढिंढोरा एक तरफ- दूसरी तरफ इस राज्य में पिछले साढ़े सात साल में एक फैक्टरी नहीं लगी, एक यूनिट बिजली का उत्पादन नहीं हुआ, विकास के नाम पर घूसखोरी, कमीशनखोरी और दलाली का बोलवाला हो गया, चप्पे-चप्पे पर शराब बिकने लगी, ज़हरीली शराब से मौत की घटनाओं में बेतहाशा वृद्धि हो गई, लड़कियों को साइकिलें तो बांटी, लेकिन रेप और छेड़खानी की घटनाओं में इज़ाफ़ा हो गया, घटनाएं घटने तक भी बात रहती, तो अलग बात थी, लेकिन सरकार और पुलिस ने कई मौकों पर खुलेआम रेपिस्टों और छेड़खानी करने वाले मनचलों का साथ दिया, बात-बात पर आम लोगों पर पुलिस ने लाठी-गोलियां चलाईं- क्या यही विकास है और क्या यही सुशासन है?

अखबारों को विज्ञापनों की घूस खिलाकर, पत्रकारों की अंतरात्मा को कुचलकर, प्रचारात्मक ख़बरों को प्रचारित करके, नकारात्मक ख़बरों को सेंसर करके, सेवा-यात्राओं, अधिकार-यात्राओं, अधिकार-रैलियों, ग्लोबल समिटों, बिहार दिवस के चीप कार्यक्रमों, जिनमें पुलिस को लाठियां चलानी पड़ती हैं, इन सबके ज़रिए बिहार में हवाबाज़ी नहीं की जा रही है, तो क्या की जा रही है? 

बड़ा सवाल यह भी है कि नीतीश जी जो कसौटी देते हैं, उसपर क्या अपनी सरकार को भी कसकर देखते हैं या फिर उन्हें लगता है कि नरेंद्र मोदी का हौवा खड़ा कर वे भी फ़र्ज़ी धर्मनिरपेक्ष नेताओं की तरह अपनी दुकानदारी चलाते रह जाएंगे? मुसलमानों की बात करते हैं तो यह सवाल तो उठेगा कि बीजेपी, आडवाणी, जोशी, राजनाथ धर्मनिरपेक्ष और नरेंद्र मोदी सांप्रदायिक- कैसे? मोदी राज में दंगे हुए, तो आडवाणी की रथयात्रा से देश में कौन-सी सांप्रदायिक सद्भाव की बयार बह चली थी? गुड़ भी खाइएगा और गुलगुले से परहेज भी कीजिएगा- तो क्या भारत का मुसलमान इतना बेवकूफ़ है? …और आप अपने राज की भी तो बात करें। फारबिसगंज में सरकारी संरक्षण-प्राप्त माफिया के लिए गोली चलवाई गई और चार मुसलमानों की हत्या हुई। उन मुसलमानों का इंसाफ़ कहां है सरकार? 

मेरी व्यक्तिगत मान्यता है कि विशेष दर्जे के मुद्दे पर भी सिर्फ़ हवाबाज़ी हो रही है। एक तरफ केंद्र से तीन-चार हज़ार करोड़ रुपये का फ़ायदा पाने के लिए इतना शोरगुल, दूसरी तरफ चुपके से अंतिम समय में राज्य का योजना आकार 28 हज़ार करोड़ से घटाकर 25 हज़ार करोड़ कर देना, यानी उतने की सीधी कटौती, जितने के फायदे के लिए मुख्यमंत्री जी दिल्ली तक हाथ पसार रहे हैं- क्या दर्शाता है? 

बिहार को जितना दीन-हीन नीतीश जी बताते रहते हैं, कायदे से बिहार को उतना दीन-हीन होना नहीं चाहिए। बिहार के पास समंदर नहीं है तो क्या हुआ? बिहार के पास कई सदानीरा नदियां तो हैं। बिहार के पास उपजाऊ मिट्टी तो है। बिहार के पास क़षि आधारित उद्योगों की अपार संभावनाएं तो हैं। बिहार के पास मेहनतकश नौजवान तो है। बिहार के पास हिन्दुस्तान की बेहतरीन प्रतिभाएं तो हैं। क्या इन चीज़ों के सहारे कोई राज्य अपने पैरों पर खरा नहीं हो सकता? और अगर नहीं हो सकता, तो इस राज्य का कभी भला नहीं हो सकता- यह आप मुझसे लिखवा लीजिए। 

बिहार को केंद्र से तीन-चार हज़ार करोड़ की सालाना खैरात नहीं चाहिए, देश के स्तर पर आने के लिए मौजूदा मूल्य पर हर साल 3 लाख 65 हज़ार करोड़ की विशाल रकम चाहिए और इतनी बड़ी रकम अगर यह राज्य अपने पुरुषार्थ से पैदा नहीं कर सकता, तो भिक्षाटन के ज़रिए कभी नहीं जुटा पाएगा। इस 3 लाख 65 हज़ार करोड़ रुपये का अर्थशास्त्र मैं अपने चैनल पर समझा चुका हूं। कभी इसपर विस्तृत आलेख भी लेकर ज़रूर आऊंगा। 

साफ़ है कि बिहार में भी इस वक्त सिर्फ़ और सिर्फ़ हवाबाज़ी चल रही है। मैं नीतीश जी की इस बात से बिल्कुल सहमत हूं कि हवा बांधने से देश नहीं चलता। इसलिए उनसे अपील करूंगा कि किसी रात अंधेरे बंद कमरे में घंटे-दो घंटे बैठकर अपनी ही कही बातों पर ज़रूर ग़ौर करे।

साभार ……………………………….. अभिरंजन कुमार 

बिहार का विकाश

जब बात होती है बिहार में परिवर्तन की तो हम उत्साह के साथ यह कहते हैं कि हाँ बिहार बदल रहा है. सही बात है परिवर्तन कि जो लहर हम अभी देख रहे हैं वह सराहनीय है.. लेकिन यहाँ कुछ बातें विचार योग्य भी है, मसलन कि जिस रफ़्तार से परिवर्तन हो रहा है क्या यही सही है? क्योंकि जब मुख्य मंत्री खुद ही यह स्वीकार करते हैं कि अभी बिहार को औसत राष्ट्रीय स्तर पर पहुँचने के लिए ३५ वर्ष लगेंगे. विचारनीय विषय यह है कि अगर हम निरंतर इसी गति से विकाश करते हैं तो क्या राष्ट्रीय विकाश के स्तर के आस-पास पहुंचेंगे भी? क्योंकि जिस गति से राष्ट्रीय विकाश हो रहा है उस गति से हमारा विकाश तो होता नहीं दिख रहा है . ३५ क्या ३५० वर्षों में भी यह संभव नहीं हो पायेगा.

दूसरी आवश्यक बात जो अत्यंत जीवंत है वो है विकाश और भ्रटाचार के बीच का समानुपाती औसत. हम निरंतर विकाश कर हैं लेकिन भ्रष्टाचार भी उसी तेजी से हमारे बीच अपनी पैठ बना रहा है. सरकारी ऑफिश में काम तो हो रहा है लेकिन बिना पैसे के कुछ भी नहीं. आज ईमानदारी कि परिभाषा यह है कि जो आपके दिए पैसों पर आपका काम बिना हिल-हुज्ज़त के कर दे वो इमानदार और जो अधिक मांगे वो भ्रष्ट. क्या ये सही है? मुद्दा विचारनीय है..

नरेगा, इंदिरा आवास योजना, सरक निर्माण विभाग, स्वास्थ्य योजना, शिक्षा संस्थान या फिर राज्य सरकार द्वारा संचालित किसी भी योजना में भ्रष्ट लोगों ने सेंध लगा रखी है और उसके समुचित दोहन कर रहें हैं. सवाल ये है कि अगर आम आदमी इससे त्रस्त है और इसके बारे में जानता है तो क्या सरकार अनजान है? या फिर ये माना जाये कि सरकार ने इसकी मौन स्वीकृति दे रखी है.. पुलिस महकमे के बारे में कुछ नहीं कहा जाए तो ही अच्छा है…

पंडित नेहरु ने कहा था कि सरकारें लोक-कल्याणकारी होनी चाहिए.. लेकिन अगर लोक कल्याण  कि ये ही परिभाषा है तो ये सरासर गलत है. लेकिन आम आदमी करे क्या.. वो तो दो समय का खाना जुटाने में ही सारी उर्जा खपा देता है तो और बातों के लिए समय कहाँ से निकाले..

हे बिहार के निति-नियंताओं कृपा कर इन विषयों पर भी कभी-कभी सोंचा करिए.. हम आम जनता आपकी ओर आशा कि दृष्टि से देखते हैं..

धन्यवाद्

………………………………………………………………………………………………….प्रभात रंजन झा