पुरालेख

मैं शोक में डूबा हुआ हूं

मैं शोक में डूबा हुआ हूं
मुझे इतना ज़्यादा शोक हो गया है कि
नींद नहीं आ रही
खाना नहीं पच रहा
मन बेचैन है
दिमाग ख़राब है।
शोक भुलाने के लिए
प्लेट में भुना हुआ काजू है
मुर्गे की टांगें हैं
और बोतल में शराब है।

शोक मुझे इसलिए नहीं है कि
छपरा में 23 संभावित लाल बहादुर शास्त्रियों को
खाने में ज़हर देकर मार दिया गया।
शोक मुझे इसलिए भी नहीं है कि
बगहा में एक छोटा जलियांवाला बाग बना दिया गया
और पुलिस ने छह लोगों को भून डाला।
इस बात का भी शोक नहीं है मुझे
कि उत्तराखंड की बाढ़ में
बहुत सारे जीते-जागते हंसते-खेलते इंसान
बिल्कुल लाचार मवेशियों की तरह
या यूं कहें कि पत्तों की तरह बह गए
और बहुतों का तो पता भी नहीं चला।

आख़िर इन मौतों का शोक मुझे क्यों होगा?
इन मौतों के लिए तो मेरे राज्य की विधानसभा भी शोकाकुल नहीं है
इन मौतों के लिए तो मेरे राज्य की सरकार भी शोकाकुल नहीं है
इन मौतों के लिए शोक प्रकट करके मैं अपनी गरिमा क्यों गिराऊं?
अपने को छोटा क्यों बनाऊं?
बड़े-बड़े लोग इन छोटे-मोटे लोगों को इंसान की श्रेणी में गिन लेते हैं
यही क्या कम अहसान है उनका?
वरना ये तो कीड़े-मकोड़े हैं
और कीड़े-मकोड़ों की मौत के लिए मैं क्यों शोक-संतप्त होने लगा?

मैं शोकाकुल हूं इसलिए
क्योंकि मेरे मुख्यमंत्री के पैर के अंगूठे में चोट लग गई है।
फ्रैक्चर हो गया है।
चोट भी ऐसी-वैसी नहीं
सीधे बोलती बंद हो गई आठ दिनों के लिए।
सोचिए अंगूठे की वह चोट कितनी भयानक होगी
कि आठ दिनों तक ज़ुबान न खुले।
आगे पीछे गाड़ियों के काफिले
सिक्योरिटी गार्ड्स के तामझाम
और डॉक्टरों की टीम की देख-रेख में
बुलेटप्रूफ कार में बैठकर भी
दो किलोमीटर तय करना मुश्किल हो।
मैं अपने मुख्यमंत्री को ऐसी भयानक चोट लगने के लिए शोकाकुल हूं।
आख़िर मेरा मुख्यमंत्री सही-सलामत रहेगा
तभी तो राज्य में “सुशासन” रहेगा।
विशेष राज्य के दर्जे पर भाषण रहेगा।
ग़रीबों के लिए सड़ा हुआ राशन रहेगा।

बच्चों का मर जाना कौन-सी बड़ी बात है
कि मैं उस पर शोक में डूब जाऊं।
यह भारत देश है
यहां एक बच्चे मरेगा, चार पैदा हो जाएंगे।
और ग़रीब तो ऐसे भी बच्चे पैदा करने में माहिर हैं।
इसलिए अगर मेरे राज्य की विधानसभा
छपरा में 23 बच्चों की मौत पर शोकाकुल नहीं है
अगर मेरे राज्य की सरकार
को बगहा में गोली से छह लोगों की मौत का अफ़सोस नहीं है
तो मुझे क्या पड़ी है ?

अभी मुझे अपने मुख्यमंत्री के पैर के अंगूठे की चोट पर शोक-संतप्त रहने दीजिए
और मारे गए बच्चों का ज़िक्र कर मूड मत ख़राब कीजिए।

साभार – अभिरंजन कुमार

मुझे कुछ कहना है

मुझे कुछ कहना है
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मैँ सरकारी विद्यालय
सरकार द्वारा संचालित और पोषित…
प्रतिष्ठा और गौरव मेरा अतीत
मैँने ही जन्माया है उन तमाम
बुद्धिजीवियोँ को…
जो देखने लगे हैँ मुझे आजकल
नीची नजरोँ से…
मेरे द्वारा ही पुष्पित और
पल्वित हुए हैँ वे लोग
जिनसे हो रहा हूँ आज
उपहासित और अपमानित
उन्हे नहीँ पता कि कब का
कर दिया गया है मुझे बहिष्कृत
तथाकथित सभ्य समाजोँ से
और छोड़ दिया गया है मेरे हिस्से मेँ शोषितोँ,दलितोँ, वंचितोँ और गरीबोँ के बच्चोँ को…
भूखे शिक्षकोँ और चावल की पोटलियोँ को
बना दिया गया है मेरा एक अध्यक्ष जो
अनपढ, जाहिल और गंवार से ही चुना जाता है..
विकसित कर दिया गया है मुझे अनुदान वितरण केन्द्र के रुप मेँ
कुलमिला कर कहुँ तो
लूटा है सरकार और समाज ने
मेरी अस्मिता को
चारोँ ओर लगा दिये गये हैँ
मेरे दुश्मनोँ को
मेरा पुर्ननिर्माण कमीशन के विकेन्द्रीकरण के साथ जारी है
जाहिर है
थाली मेँ जहर तो मिलेगी ही
बंधु…
मैँ लाचार हूँ चुपचाप
अपनी दुर्दशा और दीनहीनता झेलते रहने के लिये
उफ..बहुत सफाई दे दी मैँनेँ
अनुरोध है हमारे अपने बुद्धिमान विद्यार्थियोँ से
कृपया मेरे बच्चोँ को खाना देने की जिम्मेदारी आप ही उठाएँ
शेष आपको बुद्धिमान बनाया है
तो इन्हेँ भी बना देगेँ
और हाँ…
मुझे गाली देना बंद कर देँ
वर्ना वर्ग संधर्ष झेलने को तैयार रहेँ…….. ये मेरी चेतावनी आपके नाम…

साभार : धनञ्जय  कुमार

श्रद्धांजलि

साथियों,

“गम का खज़ाना तेरा भी है मेरा भी…”
आज मेरे साहेब- जगजीत सिंह साहेब जी कि जयंती है, न मेरी कुवत है न मेरी कलम में इतना जादू कि अपनी भावनाओं को शब्दों में पिरो कर कुछ कह सकूँ… लेकिन कुछ नहीं कहा तो फिर किया क्या. साहेब के नगमों के चंद लाईनों को आपके सामने रख रहा हूँ…

साहेब… चिठ्ठी न कोई सन्देश, जाने वो कौन सा देश जहाँ तुम चले गए…
साहेब.. चाक जिगर के सी लेते हैं.. जैसे भी हो जी लेते हैं…
साहेब.. रंज और गम कि बस्ती का मैं बासिन्दा हूँ.. ये तो बस मैं हूँ कि इस हाल में भी जिंदा हूँ..
साहेब.. शाम से आँख में नमी सी है.. आज फिर आपकी कमी सी है..
साहेब.. किसका चेहरा मैं देखूं.. तेरा चेहरा देख कर..
साहेब.. तुम को देखा तो ये ख्याल आया.. ज़िन्दगी धूप.. तुम घना साया..
साहेब.. अपने होठों पर सजाना चाहता हूँ.. आज फिर तुम्हे गुनगुनाना चाहता हूँ..
साहेब.. हजारों ख्वाशियें ऐसी कि हर ख्वाहिश पर दम निकले, बहुत निकले मेरे अरमान, लेकिन फिर भी कम निकले
साहेब.. होश वालों को खबर क्या बेखुदी क्या चीज़ है..आपको सुनिए फिर समझिये जिंदगी क्या चीज़ है..
साहेब.. मैंनू तेरा शवाब ले बैठा.. मैंनू जद भी तुस्सी हो याद आये.. दिन दिहारे शराब ले बैठा..
साहेब.. झुकी-झुकी सी नज़र बेक़रार आज भी है..
साहेब.. किसी नज़र को तेरा इंतज़ार आज भी है..
साहेब.. होठों से छू लो तुम मेरा गीत अमर कर दो..
साहेब.. दुनिया जिसे कहते हैं.. मिट्टी का खिलौना है..
साहेब.. तेरा चेहरा कितना सुहाना लगता है.. तेरे आगे चाँद पुराना लगता है..
साहेब.. कल चौदवीं कि रात थी.. शब्-भर रहा चर्चा तेरा..
साहेब.. कैसे-कैसे हादसे सहते रहे.. फिर भी हम हसतें रहें.. जीते रहें..
साहेब.. ये दौलत भी ले लो..ये शोहरत भी ले लो.. भले छीन लो मुझ से मेरी जवानी.. मगर फिर कुछ सुनाओ आप अपनी जुबानी..
साहेब.. “क्या भूलूं क्या याद करूं..”

बात निकली है तो दूर तलक जाएगी..

………………………………………………………………………………………….प्रभात रंजन झा