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राज्यरानी एक्सप्रेस से कटकर 35 लोगों की मौत

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राज्यरानी एक्सप्रेस से कटकर मरने वालो कि संख्या हुई 35 लोगों की मौत, भीड़ ने लगाई आग , बिहार सरकार हादसे मे मरने वालो को दो – दो लाख रुपया देगी , जनता दरबार मे मुख्यमंत्री ने की घोषणा ।

समस्तीपुर रेलवे डिविजन में खगड़िया−सहरसा रूट पर धमाराघाट स्टेशन है, जिसके पास ट्रेन से कटकर 35 लोगों के मरने की पुष्टि हो चुकी है। सहरसा और खगड़िया के बीच धमाराघाट स्टेशन के पास यह हादसा हुआ, और सभी श्रद्धालु कात्यायनी स्थान मंदिर जा रहे थे। मरने वालों में 27 महिलाएं, चार बच्चे और छह पुरुष शामिल हैं।

जानकारी के अनुसार, राज्यरानी एक्सप्रेस (गाड़ी संख्या 12567) सोमवार की सुबह सहरसा से पटना जा रही थी। मानसी रेलखंड पर धमारा रेलवे स्टेशन के पास मां कात्यायिनी का एक मंदिर है, जहां पूजा के लिए लोग जमा थे। श्रावण माह के आखिरी सोमवार होने की वजह से बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं की भीड़ थी। वे मंदिर में जल चढ़ाने आए थे। यहां प्रसिद्ध सोमवारी मेला भी लगता है। लोग ट्रैक पार कर दूसरी तरफ मंदिर की ओर जा रहे थे। लोगों को किसी भी ट्रेन के आने की सूचना नहीं दी गई थी, इसी बीच अचानक राज्यरानी एक्सप्रेस आने से पटरी पर खड़े लोग इसकी चपेट में आ गए।

बिहार के अतिरिक्त पुलिस महानिदेशक (कानून व्यवस्था) ए. के. भारद्वाज ने इस हादसे में 35 लोगों के मरने की पुष्टि की है। स्थानीय सांसद दिनेश चंद्र यादव ने भी 35 लोगों की मौत की पुष्टि की है। मृतकों की संख्या बढ़ भी सकती है।

अपुष्ट सूचना के अनुसार, गुस्साए लोगों ने ट्रेन के एक ड्राइवर को पीट-पीट कर मार डाला है। इससे पहले लोगों ने दोनों ड्राइवरों को बंधक बना लिया था। बताया जा रहा है कि बदलाघाट और आस-पास के दोनों स्टेशनों के कर्मचारी डरकर भाग गए हैं।

घटनास्थल पर मौजूद अन्य लोगों ने ट्रेन में मौजूद ड्राइवर समेत बाकी स्टाफ की पिटाई की और ट्रेन की एक एयरकंडीशन बोगी को आग के हवाले कर दिया. ड्राइवर ने बाद में दम तोड़ दिया.इस हादसे के बाद लोगों में भारी आक्रोश है। गुस्साए लोगों ने ट्रेन के दोनों ड्राइवरों को उतार लिया और उनकी जमकर पिटाई की है। इसके अलावा भीड़ ने राज्यरानी एक्सप्रेस और यहां खड़ी एक और ट्रेन में आगजनी की। बताया जा रहा है कि राज्यरानी एक्सप्रेस के 4 डिब्बे जलकर खाक हो गए हैं।

कैसे हुआ हादसा:

हादसा बदला घाट और धमारा घाट के बीच हुआ है. इन दोनों घाट के बीच कात्यायनी मंदिर है, जहां आज सावन का आखिरी सोमवार होने की वजह से बड़ी संख्या में श्रद्धालु मौजूद थे.

घटना वाली जगह 3 ट्रैक हैं और हादसा बीच वाले ट्रैक पर हुआ. दरअसल अगल-बगल के ट्रैक पर खड़ी पैसेंजर ट्रेन से यात्री उतरकर ट्रैक पार कर रहे थे कि तभी अचानक राज्यरानी एक्सप्रेस आ गई.

रेल राज्यमंत्री अधीर रंजन चौधरी ने बताया है कि राज्यरानी की स्पीड 80 किलोमीटर प्रति घंटे थी. ब्रेक लगाने के बावजूद ट्रेन नहीं रुक सकी और हादसा हो गया.

अधीर रंजन के मुताबिक स्थानीय प्रसाशन से चूक की वजह से हुआ हादसा.

समस्तीपुर के डीआरएम अरूण मलिक ने बताया कि आक्रोशित लोगों ने पूरे स्टेशन को बंधक बना लिया है। उन्होंने 15 लोगों के मरने की पुष्टि करते हुए कहा कि मृतकों की संख्या ज्यादा भी हो सकती है। रेलवे ने मेडिकल रिलीफ वैन रवाना कर दिया है। उन्होंने कहा धमारा रेलवे स्टेशन पर सड़क मार्ग से पहुंचना मुश्किल है, सिर्फ रेल मार्ग से पहुंचा जा सकता है।

प्रभात रंजन झा

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पत्रकारिता के नाम पर फ्रॉडगिरी

पत्रकारिता के नाम पर फ्रॉडगिरी

पुण्य प्रसून बाजपेयी/ पत्रकार और पत्रकारिता के नाम पर कोई कितनी फ्रॉडगिरी कर सकता है। या फिर मौजूदा दौर में पत्रकारिता एक ऐसे मुकाम पर जा पहुंची है, जहां पत्रकारिता के नाम पर धंधा किया भी जा सकता है और पत्रकारों के लिये ऐसा माहौल बना दिया गया है कि वह धंधे में अपनी उपस्थिति दर्ज कराकर धंधे को ही मुख्यधारा की पत्रकारिता मानने लगे। या फिर धंधे के माहौल से जुड़े बगैर पत्रकार के लिये एक मुश्किल लगातार उसके काम उसके जुनुन के सामानांतर चलती रहती है, जो उसे डराती है या फिर वैकल्पिक सोच के खत्म होने का अंदेशा देकर पत्रकार को धंधे के माहौल में घसीट कर ले जाती है।

दरअसल, यह सारे सवाल मौजूदा दौर में कुकुरमुत्ते की तरह पनपते सोशल मीडिया के विभिन्न आयामों को देखकर लगातार जहन में उतरते रहे हैं लेकिन हाल में ही या कहें 20 जुलाई को देश के 50 हिन्दी के संपादकों/ पत्रकारों को लेकर एक्सचेंज फॉर मीडिया की पहल ने इस तथ्य को पुख्ता कर दिया कि पत्रकार मौजूदा वक्त में बेचने की चीज भी है और पत्रकारिता के नाम का घोल कहीं भी घोलकर धंधेबाजों को मान्यता दिलायी जा सकती है। और समाज के मान्यता प्राप्त या कहें अपने अपने क्षेत्र के पहचान पाये लोगों को ही धंधे का औजार बनाकर धंधे को ही पत्रकारीय मिशन में बदला जा सकता है।

दर्द या पीडा इसलिये क्योंकि राम बहादुर राय (वरिष्ठ पत्रकार), श्री राजेंद्र यादव ( वरिष्ठ साहित्यकार), श्री पुष्पेश पंत (शिक्षाविद्) श्री सुभाष कश्यप (संविधानविद) श्री असगर वजागत (वरिष्ठ रंगकर्मी), श्री वेद प्रताप वैदिक( वरिष्ठ पत्रकार) श्री निदा फाजली (प्रसिद्ध गीतकार व शायर) प्रो. बी. के. कुठियाला ( कुलपति माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय) श्री राजीव मिश्रा ( सीईओ, लोकसभा टीवी) श्री रवि खन्ना ( पूर्व दक्षिण एशिया प्रमुख, वाइस ऑफ अमेरिका), सरीखे व्यक्तित्वों की समझ को मान्यता देकर डेढ़ सौ पत्रकारों में से पचास पत्रकारों का चयन करता है। बकायदा हर संपादक की तस्वीर और नाम देकर प्रचारिक प्रसारित करता है। लेकिन जब चुनिंदा 50 पत्रकारों के नामों के ऐलान का वक्त आता है तो टॉप के दो पत्रकार दो अखबार के मालिक हो जाते हैं। और इन अखबार मालिक का नाम या तस्वीर ना तो उन डेढ सौ की फेरहिस्त में कहीं दिखायी देता है। और तो और जिन सम्मानीय लोगों को ज्यूरी का सदस्य बनाकर पत्रकारों को छांटा भी जाता है, उन्हें भी यह नहीं बताया जाता कि अखबार के मालिक पत्रकार हो चुके हैं या फिर दो अखबार के मालिक श्रेष्ठ पत्रकारों की सूची में जगह पा चुके हैं। असल में उन अखबार के मालिकों को नहीं बताया जाता है कि आप पत्रकारो की लिस्ट में सबसे उम्दा पत्रकार, सबसे साख वाले पत्रकार, हिन्दी की सेवा करने वाले सबसे श्रेष्ठ संपादक बनाये जा रहे हैं। जाहिर है यह महज चापलूसी तो हो नहीं सकती। क्योंकि धंधा चापलूसी से नहीं चलता। उसके लिये एक खास तरह के फरेब की जरुरत होती है जो फरेब बड़े कैनवास में मौजूदा पत्रकारिता के बाजारु स्तर को बढता हुआ दिखा दें। फिर पत्रकारिता की साख बनाये रखने के लिये पत्रकारों के बीच मौजूदा वक्त के सबसे साख वाले समाजसेवी अन्ना हजारे को बुला कर विकल्प की सोच और अलग लकीर खिंचने का जायका भी पैदा करने की कोशिश की जाती है।

लेकिन दिमाग में धंधा बस चुका है तो परिणाम क्या निकलेगा। यकीनन कॉकटेल ही समायेगा। तो जो अन्ना हजारे अपने गांव रालेगण सिद्दी से लेकर मुंबई की सड़कों पर दारु बंदी को लेकर ना सिर्फ संघर्ष करते रहे और उम्र गुजार दी बल्कि जिनके समाज सेवा की पहली लकीर ही दारुबंदी से शुरु होती है, उनसे ईमानदार पत्रकारिता का तमगा लेकर उसी माहौल में दारु भी जमकर उढेली जाती है। और तो और महारथी पत्रकारों को कॉकटेल में नहलाने की इतनी जल्दबाजी कि अन्ना के माहौल से निकलने से पहले ही जाम खनकने लगते हैं। हवा में नशे की खुमारी दौड़ने लगती है। अब यहां अन्ना सरीखे व्यक्ति खामोशी ही बरत सकते हैं क्योकि चंद मिनट पहले ही पत्रकारों से देश के लिये संघर्ष की मुनादी कर पत्रकारो को समाज का सबसे जिम्मेदार जो ठहराया। जाहिर है महारथी पत्रकारों की आंखों में उस वक्त शर्म भी रही लेकिन मेजबान की नीयत अगर डगमगाने लगी तो कोई क्या करे। और मेजबान को अगर समूचा कार्यक्रम ही धंधा लगने लगा है तो फिर वहा कैसे कोई पत्रकारिता, नीयत, ईमानदार समझ,मिशन,पत्रकारीय संघर्ष का सवाल उठा सकता है। यह सब तो बाजार तय करते हैं और बाजार से डरे सहमे पत्रकार ही नहीं ज्यूरी सदस्य भी इस कार्यक्रम पर अंगुली नहीं उठा पाते हैं कि उनके साथ धोखा हुआ है। हर कोई खामोश। और पत्रकारिता के नाम पर एक सफल कार्यक्रम का तमगा एक्सचेंज फार मीडिया के कर्ताधर्ता अपने नाम कर लेते हैं। फिर त्रासदी यह कि जिन पचास महारथी पत्रकारों के नाम चुने भी गये उसे दिल्ली के पांच सितारा होटल के समारोह के बाहर अभी तक रखने की हिम्मत एक्सचेंज फार मीडिया भी दिखा नहीं पाया है। समझना है तो एक्सचेंज4मीडिया के साइट पर जाइये और त्रासदी देख लीजिये। लेकिन हमारी आपकी मुश्किल यह है कि इस साइट पर जितने ज्यादा हिट या क्लिक होंगे, उसे भी वह अपनी लोकप्रियता से जोड़ लेंगे।

(यह लेख पुण्य प्रसून बाजपेयी जी के ब्लॉग http://prasunbajpai.itzmyblog.com/से साभार)

नीतीश जी, हवा बांधने से देश नहीं चलता!

नीतीश कुमार बिना नाम लिए जो सवाल नरेंद्र मोदी से पूछ रहे हैं, वही सवाल मैं नाम लेकर नीतीश जी से पूछना चाहता हूं- 
1. कैसा विकास होना चाहिए? 
2. हम विकास भी कर जाएं और भुखमरी के शिकार भी लोग रहें तो कैसा विकास? 
3. हम विकास भी कर जाएं और कुपोषण के शिकार भी लोग रहें तो कैसा विकास? 
4. हम विकास भी कर जाएं और पीने का पानी न मिले, तो कैसा विकास?”

नीतीश जी कहते हैं कि “विकास का मतलब बुनियादी ढांचे का विकास और मानव विकास दोनों है। जितना जोर बुनियादी ढांचे पर होगा, कल-कारखाने पर होगा, उससे कम जोर मनुष्य के विकास पर नहीं होना चाहिए।” उनका कहना है कि “ऐसा न विकास का मॉडल लोग चला दें कि और गैरबराबरी बढ़ जाए। विकसित लोग और विकसित हो जाएं और पिछड़े लोग और पिछड़ जाएं।”

नीतीश जी ये भी कहते हैं कि “ढाई हज़ार साल का इतिहास है। हम कभी तिजारत के लिए नहीं जाने जाते थे। हम या तो सुशासन के लिए जाने जाते रहे या ज्ञान के लिए जाने जाते थे। पाटलिपुत्र सत्ता का केंद्र था और नालंदा ज्ञान का केंद्र था।”

बातें बड़ी-बड़ी हैं। इनसे कोई असहमत नहीं हो सकता। लेकिन उनकी हर बात से सहमत होते हुए ही मैं वे सवाल उछाल रहा हूं, जो उन्होंने परोक्ष रूप से नरेंद्र मोदी के लिए उछाले हैं। जानता हूं कि जवाब नहीं मिलेगा, क्योंकि नीतीश जी उन सवालों के जवाब नहीं दिया करते, जो उन्हें असहज करते हैं। वो कहते ज़रूर हैं कि “हवा बांधने से देश नहीं चलता”, लेकिन सच्चाई यह है कि हवा बांधकर ही वे सब कुछ चलाना चाहते हैं। 

हो सके तो नीतीश जी यह बताएं कि बिहार में कुपोषण कितना कम हो गया है। उनके सत्ता संभालने के बाद से बिहार के मुज़फ्फरपुर और गया समेत करीब दस ज़िलों में इनसेफलाइटिस या एक्यूट इनसेफलोपैथी सिंड्रोम- जो भी कहें, उनसे होने वाली मौतों में बेइंतहां वृद्धि क्यों हुई है? पिछले साल ऐसे करीब तीन सौ बच्चे मारे गए, जिन्हें कायदे से समूची इक्कीसवीं सदी जीनी थी। हम सब ज़िंदा रहे और हमारी आंखों के सामने हमारे छह-छह महीने साल-साल दो-दो साल के वे बच्चे छटपटाते हुए बिलखते हुए दम तोड़ते रहे। राज्य के स्वास्थ्य मंत्री और सचिव ने ख़ुद कहा था कि ये बीमारी गंदगी, गरीबी और कुपोषण की वजह से फैलती है। अब अगर ये बीमारी पहले से ज़्यादा विकट रूप में सामने आ रही है, तो क्या इसका सीधा-सीधा मतलब ये नहीं है कि उन इलाकों में गंदगी, गरीबी और कुपोषण का असर बढ़ा है?

यह क्या माजरा है कि बिहार में ऐसी-ऐसी बीमारियों ने दोबारा सिर उठा लिया है, जिनके बारे में माना जाता था कि उनका उन्मूलन हो चुका है। अभी मुज़फ्फरपुर और कटिहार में चेचक के सैकड़ों केस सामने आए हैं। डायरिया से तो हर साल हमारे सैकड़ों बच्चे मरते ही हैं। अगर नीतीश जी ने लोगों को पीने का साफ़ पानी मुहैया करा दिया है तो फिर क्यों साफ़ पानी न मिलने की वजह से बड़ी संख्या में लोगों की अकाल-मृत्यु हो रही है? हो सके तो नीतीश जी बिहार के सिर्फ़ एक गांव का नाम बता दें, जहां पिछले साढ़े सात साल में सरकारी प्रयासों से लोगों को पीने का साफ़ पानी मिल गया हो। 

अगर बिहार में भुखमरी नहीं है तो क्यों जहानाबाद में महादलितों, जो उनके एजेंडे पर कथित रूप से सबसे ऊपर हैं, के बच्चे आज भी चूहे मारकर खा रहे हैं और क्यों पटना सिटी में गरीबों के बच्चे नालियों से मछलियां पकड़-पकड़कर खा रहे हैं? अगर बिहार में भुखमरी नहीं है, तो क्यों नीतीश जी के स्कूलों में कई बार ऐसा हुआ कि बच्चे छिपकली वाली खिचड़ी खा-खाकर बीमार पड़े और कइयों की तो मौत भी हुई? किसी मां-बाप की वो कौन-सी मजबूरी होती है कि वह अपने बच्चों को छिपकिली वाली खिचड़ी खाने के लिए घटिया स्कूलों में भेज देता है? बिहार में इस वक्त सरकारी स्कूलों की जितनी ख़राब दशा है, उसे देखते हुए यह कहना ग़लत नहीं होगा कि उन घटिया स्कूलों में अब सिर्फ़ उन्हीं परिवारों के बच्चे पढ़ रहे हैं, जिन परिवारों में भुखमरी की स्थिति है। बिहार में भुखमरी में जी रहे परिवारों का पता करना हो, तो सबसे पहले यह पता कर लीजिए कि यहां के घटिया सरकारी स्कूलों में कितने परिवारों के बच्चे पढ़ रहे हैं। 

अगर बिहार में ग़ैरबराबरी पर चोट करने वाली नीतियां अपनाई जा रही हैं, तो क्यों 38 में से 37 ज़िलों में प्रति व्यक्ति आय राज्य की प्रति व्यक्ति आय से काफी नीचे है? बिहार की प्रति व्यक्ति प्रति दिन की आय 70 रुपये 28 पैसे है, लेकिन सिर्फ़ राजधानी पटना के लोगों की आय इस औसत से ज़्यादा है- 146 रुपये 68 पैसे। बाकी 37 जिलों में से 36 ज़िलों के लोगों की आय 40 रुपये से नीचे है और 37वें ज़िले मुंगेर के लोगों की आय 51 रुपये 14 पैसे है। अगर बिहार में ग़ैरबराबरी नहीं बढ़ रही है, तो इस बात का क्या जवाब है कि आख़िर क्यों 7 ज़िलों में लोगों की आमदनी घट गई? क्यों शिवहर में आज भी एक व्यक्ति 15 रुपये 12 पैसे प्रतिदिन पर जी रहा है?

क्या नीतीश जी इस सवाल का जवाब दे सकेंगे कि बिहार में किसका विकास हो रहा है? बेईमान नेताओं, शराब-माफिया, ठेकेदारों, ज़मीन कब्ज़ाने वालों, बिल्डरों, घूसखोर अफसरों, भ्रष्ट मुखिया-सरपंचों के अलावा और किस-किसका विकास हो रहा है बिहार में? 

अगर बिहार में सचमुच का विकास हो रहा है तो पलायन दिन-ब-दिन क्यों बढ़ता जा रहा है? असम में, महाराष्ट्र में, दूसरे राज्यों में बिहारी मारे जा रहे हैं, दुरदुराए जा रहे हैं, इसके बावजूद वे बिहार में क्यों नहीं टिकते? आज बिहार के ज़्यादातर ग़रीब परिवारों के किशोर और नौजवान दूसरे राज्यों में मज़दूरी करने चले गए हैं। मनरेगा जैसी योजनाएं चलाए जाने के बावजूद ऐसे हालात क्यों बन गए हैं- क्या नीतीश कुमार जी इसका जवाब दे सकेंगे? अकेले मनरेगा में 80 प्रतिशत भ्रष्टाचार से किसका विकास हो रहा है? 20 लाख फ़र्ज़ी जॉब कार्ड का फ़ायदा किन ग़रीबों को मिल रहा है?

बिहार की पहचान अगर ज्ञान के केंद्र के रूप में रही, तो फिर छात्र अपने ही राज्य में रुककर पढ़ाई क्यों नहीं कर रहे? सच्चाई तो यह है कि प्राइमरी स्कूलों से लेकर विश्वविद्यालयों तक की जितनी बुरी स्थिति नीतीश जी के कार्यकाल में हो गई है, उतनी बुरी स्थिति बिहार के ढाई हज़ार साल के उस इतिहास में, जिसका नीतीश जी ज़िक्र कर रहे हैं, कभी नहीं थी। ख़ुद हम बिहार के सरकारी स्कूलों और कॉलेजों से पढ़कर निकले, लेकिन अब की तुलना में हालात तब काफी बेहतर थे। आज तो नीतीश जी के स्कूलों में सिर्फ़ मज़दूरों और ग़रीब किसानों के बच्चे पढ़ रहे हैं और अगर यही हाल रहा तो इन स्कूलों से अपवादों को छोड़कर सिर्फ़ मनरेगा के मज़दूर, नक्सली और बाहुबली नेताओं की बंदूकें ढोने वाले ही निकलेंगे- यह तय मानिए। 

किसी साथी ने इसी फेसबुक पर कहा था कि लालू के राज में जितनी ख़राब स्थिति सड़कों और कानून-व्यवस्था की हो गई थी, नीतीश के राज में उससे ज़्यादा ख़राब स्थिति शिक्षा की हो गई है। इसके बावजूद अगर नीतीश कुमार बिहार के ज्ञान का ढिंढोरा पीट रहे हैं तो इसे क्या कहा जाए? 

पिछले साढ़े सात साल में बिहार में कुछ सड़कें ज़रूर बनी हैं, लेकिन हिन्दुस्तान के किस पिछड़े से पिछड़े राज्य में इन बर्षो में सड़कें नहीं बनी हैं, कोई मुझे यह भी बता दे। और साथ ही यह भी बता दे कि बिहार में जो सड़कें बनी हैं, उनका स्तर क्या है, उनकी क्वालिटी कैसी है और इन सड़कों में नीतीश जी की सरकार का कितना योगदान है और केंद्र की सरकार का कितना योगदान है? साथ ही कितने पैसे इन सड़कों में खाए गए हैं? अगर खाने का स्कोप नहीं होता, तो क्या ये सड़कें बनाई जातीं?

सड़कों का ढिंढोरा एक तरफ- दूसरी तरफ इस राज्य में पिछले साढ़े सात साल में एक फैक्टरी नहीं लगी, एक यूनिट बिजली का उत्पादन नहीं हुआ, विकास के नाम पर घूसखोरी, कमीशनखोरी और दलाली का बोलवाला हो गया, चप्पे-चप्पे पर शराब बिकने लगी, ज़हरीली शराब से मौत की घटनाओं में बेतहाशा वृद्धि हो गई, लड़कियों को साइकिलें तो बांटी, लेकिन रेप और छेड़खानी की घटनाओं में इज़ाफ़ा हो गया, घटनाएं घटने तक भी बात रहती, तो अलग बात थी, लेकिन सरकार और पुलिस ने कई मौकों पर खुलेआम रेपिस्टों और छेड़खानी करने वाले मनचलों का साथ दिया, बात-बात पर आम लोगों पर पुलिस ने लाठी-गोलियां चलाईं- क्या यही विकास है और क्या यही सुशासन है?

अखबारों को विज्ञापनों की घूस खिलाकर, पत्रकारों की अंतरात्मा को कुचलकर, प्रचारात्मक ख़बरों को प्रचारित करके, नकारात्मक ख़बरों को सेंसर करके, सेवा-यात्राओं, अधिकार-यात्राओं, अधिकार-रैलियों, ग्लोबल समिटों, बिहार दिवस के चीप कार्यक्रमों, जिनमें पुलिस को लाठियां चलानी पड़ती हैं, इन सबके ज़रिए बिहार में हवाबाज़ी नहीं की जा रही है, तो क्या की जा रही है? 

बड़ा सवाल यह भी है कि नीतीश जी जो कसौटी देते हैं, उसपर क्या अपनी सरकार को भी कसकर देखते हैं या फिर उन्हें लगता है कि नरेंद्र मोदी का हौवा खड़ा कर वे भी फ़र्ज़ी धर्मनिरपेक्ष नेताओं की तरह अपनी दुकानदारी चलाते रह जाएंगे? मुसलमानों की बात करते हैं तो यह सवाल तो उठेगा कि बीजेपी, आडवाणी, जोशी, राजनाथ धर्मनिरपेक्ष और नरेंद्र मोदी सांप्रदायिक- कैसे? मोदी राज में दंगे हुए, तो आडवाणी की रथयात्रा से देश में कौन-सी सांप्रदायिक सद्भाव की बयार बह चली थी? गुड़ भी खाइएगा और गुलगुले से परहेज भी कीजिएगा- तो क्या भारत का मुसलमान इतना बेवकूफ़ है? …और आप अपने राज की भी तो बात करें। फारबिसगंज में सरकारी संरक्षण-प्राप्त माफिया के लिए गोली चलवाई गई और चार मुसलमानों की हत्या हुई। उन मुसलमानों का इंसाफ़ कहां है सरकार? 

मेरी व्यक्तिगत मान्यता है कि विशेष दर्जे के मुद्दे पर भी सिर्फ़ हवाबाज़ी हो रही है। एक तरफ केंद्र से तीन-चार हज़ार करोड़ रुपये का फ़ायदा पाने के लिए इतना शोरगुल, दूसरी तरफ चुपके से अंतिम समय में राज्य का योजना आकार 28 हज़ार करोड़ से घटाकर 25 हज़ार करोड़ कर देना, यानी उतने की सीधी कटौती, जितने के फायदे के लिए मुख्यमंत्री जी दिल्ली तक हाथ पसार रहे हैं- क्या दर्शाता है? 

बिहार को जितना दीन-हीन नीतीश जी बताते रहते हैं, कायदे से बिहार को उतना दीन-हीन होना नहीं चाहिए। बिहार के पास समंदर नहीं है तो क्या हुआ? बिहार के पास कई सदानीरा नदियां तो हैं। बिहार के पास उपजाऊ मिट्टी तो है। बिहार के पास क़षि आधारित उद्योगों की अपार संभावनाएं तो हैं। बिहार के पास मेहनतकश नौजवान तो है। बिहार के पास हिन्दुस्तान की बेहतरीन प्रतिभाएं तो हैं। क्या इन चीज़ों के सहारे कोई राज्य अपने पैरों पर खरा नहीं हो सकता? और अगर नहीं हो सकता, तो इस राज्य का कभी भला नहीं हो सकता- यह आप मुझसे लिखवा लीजिए। 

बिहार को केंद्र से तीन-चार हज़ार करोड़ की सालाना खैरात नहीं चाहिए, देश के स्तर पर आने के लिए मौजूदा मूल्य पर हर साल 3 लाख 65 हज़ार करोड़ की विशाल रकम चाहिए और इतनी बड़ी रकम अगर यह राज्य अपने पुरुषार्थ से पैदा नहीं कर सकता, तो भिक्षाटन के ज़रिए कभी नहीं जुटा पाएगा। इस 3 लाख 65 हज़ार करोड़ रुपये का अर्थशास्त्र मैं अपने चैनल पर समझा चुका हूं। कभी इसपर विस्तृत आलेख भी लेकर ज़रूर आऊंगा। 

साफ़ है कि बिहार में भी इस वक्त सिर्फ़ और सिर्फ़ हवाबाज़ी चल रही है। मैं नीतीश जी की इस बात से बिल्कुल सहमत हूं कि हवा बांधने से देश नहीं चलता। इसलिए उनसे अपील करूंगा कि किसी रात अंधेरे बंद कमरे में घंटे-दो घंटे बैठकर अपनी ही कही बातों पर ज़रूर ग़ौर करे।

साभार ……………………………….. अभिरंजन कुमार 

पत्रकारों से आम आदमी की अपेक्षा

प्रेस परिषद के रिपोर्ट के बाद बिहार और बिहार के बाहर काटजू सुर्खियों में है– बिहार में मीडिया के स्वतंत्रता को लेकर विरोध मार्च हो रहे हैं। सोशलसाईट से लेकर चौक चौराहे तक मीडिया और मीडियामैंन पर बहस छिड़ी हुई है ।हर कोई अपने अपने तरीके से परिषद के रिपोर्ट का विशलेषण कर रहे हैं। लेकिन इन सब के बीच पत्रकारिता पर कही कोई चर्चा नही हो रही है। फोकस में सिर्फ और सिर्फ नीतीश और नीतीश के इशारे पर नाचते मीडिया की चर्चा हो रही है मैं भी उस विवाद में पड़ गया था लेकिन आज मुझे लगा कि कहां बूरे फस गये थे अपना काम छोड़ कर वहां ऐसा कि आज सुबह मेरे ससुराल से फोन आया फोन उठाये तो मेरे साले जी पत्नी लाईन पर थी सीधा सवाल था उनका 20 और 21 फरवरी को बिहार बंद है उसका प्रभाव इंटर के परीक्षा पर भी पड़ेगा क्या परिक्षाये रद्द तो नही हो गयी मैंने कहा नही अभी तक तो कोई सूचना नही है फिर वो बोली अखबार में भी इसको लेकर कुछ भी नही छपा है मैने कहा आज बात करके शाम में बता देगे।फिर बच्चो को छोड़ने स्कूल चला गया लौटने के दौरान फिर से देखते हैं ससुराल वालो का ही फोन है साली महोदया, लाईन पर थी हलाकि उनके फोन करने का यह वक्त नही था। मुझे लगा क्या हुआ भाई चलते चलते बाईक पर फोन उठा लिया और क्या सब ठिक है अरे उनके बांस आने वाले हैं 20 और 21 को किसी चीज का बंद है क्या मैंने कहा है ट्रेड यूनियन का 20 और 21 फरवरी को भारत बंद है। और इसका प्रभाव भी पड़ेगा खास करके हवाई और रेल मार्ग पर इसका असर पड़ सकता है इसी को लेकर कल रात प्रधानमंत्री ने ट्रेड यूनियन के नेता से हड़ताल वापल लेने का आग्रह किया है चलिए पहले उनको बता देते है फिर बात करते हैं।घर पहुंचने के बाद मैंने कांल किया उन्होने बतायी सामने तीन अखबार है कसी में भी इसको लेकर कोई खबर नही है। खबर है तो आशाराम बापू की आप पत्रकारो को तो देश निकाला दे देना चाहिए क्या तरीका है पाठक को आप समान्य सी जानकारी भी नही दे सकते अभी सोच रहे थे गूंगल सर्च करे लेकिन फिर लगा मुझे आपके पास जानकारी हो सकती है।ये साली जी हमारे टीचर भी है चैनल पर लाईफ चल रहा हो या फिर फोनिंग या फिर मेरी खबरों की सबसे बड़ी भ्यूर हैं।खबर खत्म होते ही इनका फोन या फिर मैंसेज जरुर आता है क्या सुधार करना है या फिर क्या इस खबर में औऱ क्या हो सकता है-वही फेसबूक पर भी हमारे हर पोस्ट पर इनकी पैंनी नजर रहती है और कभी मैं इनका बुद्धू तो कभी छलिया तो कभी दिवाना रहता हूं अरे इनके बारे में बताते बताते मैं मुद्धा से ही भटक गया था।पत्रकार मित्रों ये पाठक है और एक संवेदनशील पाठक हैं एक पाठक की अपेक्षाओ पर हमलोग कहां तक खड़े उतर रहे है जरा सोचिए शायद इस तरह की खबरे लिखने पर नीतीश जी की और से मनाही नही होनी चाहिए इसको हमलोग जगह दे सकते हैं कहने का मतलब यह है कि हमलोग पाठक को आम सूचना भी दे पाने में विफल रह रहे है और लोगो में गुस्सा इसी बात को लेकर है।

____________________________________साभार —-> रंजू संतोष कि कलम से _____

परिचय

निर्भीक सोंच.. बेबाक अंदाज़… दैनिक भारत…..
सम-सामयिक विषयों पर विस्तृत विवरण

स्नेह भरा आमंत्रण मेहमान स्तंभकार बंधुओं को..

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This entry was posted on फ़रवरी 4, 2013, in Home.