जेडीयू को छोड़कर फ़ायदे में रहेगी, सुकून से जिएगी बीजेपी

सुशील मोदी बिहार में नीतीश कुमार के सबसे सुशील और वफादार भाई माने जाते रहे हैं, लेकिन जिस तरह से आगे आकर उन्होंने जेडीयू पर हमला बोला है, उससे साफ़ है कि दोनों दलों के बीच हालात कितने बिगड़ चुके हैं। अब दोनों दलों के बीच दो खेल एक साथ चल रहे हैं। एक तरफ़ दोनों एक-दूसरे को मक्खन लगाने की भी कोशिशें कर रहे हैं, दूसरी तरफ़ बात इतनी बिगड़ गई है कि संभालते-संभालते भी कुछ-न-कुछ उल्टा हो ही जाता है।

मक्खन लगाने की कोशिशों के तहत ख़ुद मुख्यमंत्री नीतीश कुमार का ही बयान लें। जो नीतीश कुमार नरेंद्र मोदी की आलोचना करके नहीं अघा रहे, उन्हीं नीतीश कुमार को अब गिरिराज सिंह तक की तारीफ़ सूझ रही है। मंगलवार 16 अप्रैल को एक कार्यक्रम में उन्होंने अपने ऊपर आम तौर पर हमलावर रहने वाले अपने पशुपालन मंत्री की तारीफ़ में कसीदे पढ़े। कहा कि वे अपने घर पर बकरी पालते हैं और मेहमानों को बकरी के दूध की चाय पिलाते हैं। महात्मा गांधी भी बकरी का दूध पिया करते थे। यानी नरेंद्र मोदी में नाथूराम गोडसे (सांप्रदायिकता) ढूंढ़ते-ढूंढ़ते नीतीश जी को गिरिराज सिंह में महात्मा गांधी नज़र आने लगे हैं। हा हा हा…

लेकिन अब गांधी ढूंढ़ने से बात कितनी बनेगी, कहना मुश्किल है, क्योंकि दोनों पार्टियों में बहुत सारे नेता भगत सिंह बनकर एक-दूसरे की असेंबली के बाहर बम पर बम फोड़े जा रहे हैं। इधर से सुशील मोदी ने बम फोड़ा- ‘‘बिना नाम लिये नरेंद्र मोदी के ऊपर संकेतों में जदयू ने जो हमला किया है, वह दुर्भाग्यपूर्ण है, और यह नहीं होना चाहिए था। भाजपा के देश भर के कार्यकर्ता और समर्थक इस प्रकरण से दुखी और मर्माहत हैं।’’ सुशील मोदी ने यह भी बता दिया कि “18 अप्रैल को राजनाथ सिंह ने दिल्ली में बिहार भाजपा की कोर कमेटी की बैठक बुलाई है। उसमें राज्य की वर्तमान राजनीतिक स्थिति पर चर्चा होगी। गठबंधन जारी रखने या न रखने के बारे में पार्लियामेंट्री बोर्ड उचित समय पर उचित निर्णय लेगा।”

जेडीयू की तरफ से बम फोड़ा बड़बोले बाबा माने जाने वाले शिवानंद तिवारी जी ने। गुस्से में बोले- “जिसे जाना है जाए, हम कोई पकड़कर रखे हैं। हम कोई उनका पैर पकड़ रहे हैं क्या? नरेंद्र मोदी सेक्युलर हैं तो (पीएम कैंडिडेट का) नाम घोषित करें न। हम कोई उनको रोके हुए हैं।”

इतना ही नहीं, बीजेपी प्रवक्ता मीनाक्षी लेखी के गोधरा कांड से जुड़े बयान पर तो नीतीश जी चुप्पी साध गए थे, लेकिन लालू जी के उकसावे पर बोल ही गए। लालू ने कहा था कि गोधरा कांड के समय नीतीश रेल मंत्री थे। उनको गोधरा कांड की ज़िम्मेदारी लेनी चाहिए। नीतीश जी ने कहा कि कोई डीरेलमेंट हुआ था जो हमारी ज़िम्मेदारी थी। कानून व्यवस्था का मामला राज्य सरकार का होता है, इसलिए राज्य सरकार की ज़िम्मेदारी थी। यानी फिर नरेंद्र मोदी पर निशाना।

“तीर” कमान से और बात ज़ुबान से निकल जाए, तो वापस नहीं आते। और यहां तो तीर पर तीर, एक से एक वीर। ऐसे में सबसे बड़ा सवाल यही है कि गठबंधन चलेगा कि नहीं? अविश्वसनीय, मौकापरस्त और पल-पल बदलती राजनीति के इस दौर में इसका पक्का जवाब देना तो अभी मुश्किल है, लेकिन मुझे लगता है कि पैंतरे दिखाने की शुरुआत तो नीतीश जी ने की, लेकिन एक सुनहरा मौका दे दिया है उन्होंने बीजेपी को, इस गठबंधन से निकल आने का। अगर बीजेपी यह साहस दिखाए तो निश्चित रूप से वह फायदे में रहेगी और नीतीश जी को इसके भयंकर राजनीतिक नुकसान उठाने होंगे।

पहले यह समझ लेते हैं कि जेडीयू से तलाक लेकर बीजेपी को क्या-क्या फायदे होंगे।

1. फायदा नंबर वन- अगर बीजेपी स्वाभिमान और आत्मनिर्भरता वाली पॉलिटिक्स करना चाहती है, तो उसे रोज़-रोज़ की बेइज़्ज़ती से मुक्ति मिल जाएगी। गिरिराज सिंह, अश्विनी चौबे सरीखे नेताओं से बात करिए तो इस बेइज़्ज़ती की टीस आपको महसूस होगी और पता चलेगा कि नीतीश कुमार ने समय-समय पर बीजेपी को किस तरह ज़लील किया है।

2. फायदा नंबर दो- जेडीयू के साथ रहकर बीजेपी लोकसभा की सिर्फ़ 15 सीटें लड़ पाएगी, लेकिन जेडीयू को छोड़कर 40 सीटों पर लड़ेगी। एक राष्ट्रीय पार्टी के लिए यह कोई अच्छी स्थिति नहीं होती कि वह किसी राज्य में, जहां उसकी ठीक-ठाक स्थिति और संभावना हो, वहां गठबंधन के नाम पर वह 40 में सिर्फ़ 15 सीटों पर लड़े, 25 पर न लड़े। अभी बीजेपी सारी सीटें भी जीत ले, तो 15 सीटें जीतेगी, लेकिन 40 सीटों पर लड़ने की सूरत में उसके पास अपनी सीटें और बढ़ाने का मौका रहेगा।

3. फायदा नंबर तीन- जिन सीटों पर आप नहीं लड़ते, वहां आपके कार्यकर्ताओं का उत्साह और मनोबल समाप्त हो जाता है। इस लिहाज से बिहार की 25 सीटों पर बीजेपी के कार्यकर्ता डेड पड़े हैं। जेडीयू से अलग होने की सूरत में उनमें जोश आएगा और कुछ कर दिखाने का मौका मिलेगा। बड़ी पार्टियों को हर चुनाव सिर्फ़ सीटें जीतने के ख्याल से नहीं, बल्कि अपने कार्यकर्ताओं का मनोबल बनाए रखने के ख्याल से भी लड़ना चाहिए। कार्यकर्ता सक्रिय होंगे, तो उन सीटों पर जनाधार भी तैयार होगा।

4. फायदा नंबर चार- पार्टी में चुनाव के समय टिकट को लेकर असंतोष और सिर-फुटौव्वल कम होगा। अभी आप सिर्फ़ 15 लोगों को टिकट दे सकते हैं, जेडीयू से अलग होने पर आप 40 नेताओं को टिकट देंगे। ज्यादा टिकट बंटेंगे, तो सिर-फुटौव्वल कम होगा। पार्टी कार्यालय में कुर्सियां कम टूटेंगी और मारपीट भी कम होगी। (कृपया पिछले विधानसभा चुनाव को याद करें।)

5. फायदा नंबर पांच- नीतीश जी का अहंकार टूटेगा। उन्हें अहसास होगा कि उनके सर्वशक्तिमान बनने में आधी शक्ति और सीटें बीजेपी की भी थीं। चूंकि सारी चीज़ों का क्रेडिट उन्होंने लूटा है, अपनी आदमकद फोटो के साथ हाथ हिलाते हुए “मैं बिहार हूं” का पोस्टर उन्होंने छपवाया है, तो सारा एंटी-इनकम्बेन्सी भी वही झेलेंगे। राज्य में बड़ी संख्या में लोग उनके दूसरे कार्यकाल में व्याप्त भ्रष्टाचार, नाइंसाफ़ी और उनके तानाशाही तेवर से नाराज़ हैं। ढाई लाख नियोजित शिक्षकों के परिवारों के 10 लाख वोटर तो सीधे-सीधे चुनाव में उन्हें धूल चटाने का इरादा करके बैठे हैं। दूसरे बहुत सारे नाराज़ लोग भी हैं। खासकर रेप-गैंगरेप-छेड़खानी की बढ़ती घटनाओं और शराब को बढ़ावा दिए जाने से नाराज़ महिलाएं।

6. फायदा नंबर छह- चुनाव में मुख्य मुकाबला बीजेपी और आरजेडी के बीच होगा और जेडीयू तीसरे नंबर की पार्टी बन जाएगी। सवर्णों के वोट बीजेपी को मिलेंगे और अल्पसंख्यकों के वोट आरजेडी को मिलेंगे। नीतीश कुमार के दलित-महादलित जनाधार में भी सेंध लगेगी। सुशील मोदी ने रविवार 14 अप्रैल को कहा भी है कि जो लोग दावा करते हैं कि दलित-महादलित पर हमारा प्रभाव ज्यादा है, उन्हें पता होना चाहिए कि दोनों वर्गों के बिहार के शीर्ष नेता भाजपा के पास हैं। उन्होंने कटिहार और आसपास के ज़िलों में अच्छा असर रखने वाले महादलित नेता रामजी ऋषिदेव, राजगीर से लगातार आठ बार के विधायक रविदास समाज के नेता और नीतीश कैबिनेट में मंत्री सत्यदेव नारायण आर्या, मेहतर समाज से विधायक भागीरथी देवी, रजवार समाज से विधायक कन्हैया रजवार और पूर्व केंद्रीय मंत्री और भाजपा अनुसूचित जाति मोर्चा के राष्ट्रीय अध्यक्ष संजय पासवान का जिक्र कर बताया कि बीजेपी में अनुसूचित जाति के 18 विधायक और एक सांसद हैं। सुशील मोदी का यह आत्मविश्वास सिर्फ़ बयान तक न रह जाए, उसे चुनाव में परखने का मौका भी मिलना चाहिए।

7. फायदा नंबर सात- नीतीश कुमार एक्सपोज़ हो जाएंगे। न इधर के रहेंगे, न उधर के। 17 साल बीजेपी के साथ रहकर जब उसे गरियाते हुए निकलेंगे तो हर कोई उनपर हंसेगा। इसी तरह जीवन भर जिस कांग्रेस को गरियाया, जब उसके साथ जाएंगे, तो उनकी स्थिति और हल्की और हास्यास्पद हो जाएगी। ऊपर से कांग्रेस कहीं उनका भी वही हाल न करे, जैसा हाल झारखंड में जेएमएम के पिता-पुत्र शिबू सोरेन और हेमंत सोरेन का किया। पहले बीजेपी के ख़िलाफ़ चढ़ाया, सरकार गिरवाई और बाद में औकात बता दी। वैसे ही बिहार में कांग्रेस पहले जेडीयू को चढ़ाकर बीजेपी से अलग करवाएगी, फिर हो सकता है कि न तो विशेष राज्य का दर्जा दे, न गठबंधन करे। बहुत मुमकिन है कि आखिरी लम्हों में कांग्रेस लालू और रामविलास से गठबंधन कर ले। याद रखें कि पार्टी ने लालू के खासमखास और उनकी सरकार में मंत्री रहे अशोक चौधरी को अपना प्रदेश अध्यक्ष बनाया है।

मालूम नहीं, बीजेपी के रणनीतिकार क्या सोचते हैं, लेकिन अगर बीजेपी को केंद्र में सरकार बनानी है, तो उसे ज़्यादा से ज़्यादा सीटें लड़ने और जीतने की सोच रखनी चाहिए। अगर 1999 से अब तक लगातार उसकी सीटें गिर रही हैं, तो मेरे विचार से इसकी एक बड़ी वजह गठबंधन की पार्टियों पर उसकी बढ़ती निर्भरता भी है। 1999 में उसने 183, 2004 में 138 और 2009 में मात्र 115 सीटें जीतीं। उत्तर प्रदेश जैसे राज्य में सत्तालोलुपता के चक्कर में पड़कर उसने मायावती जैसी मायावी नेत्री से गठबंधन किया और अपना जनाधार खो दिया। गठबंधन अपना जनाधार और सीटें बढ़ाने के लिए होना चाहिए, न कि जनाधार खिसकता रहे और गठबंधन में मस्त रहें।

अगर बीजेपी को इस बार कांग्रेस को पछाड़ना है और केंद्र में सरकार बनानी है, तो उसे अपना आंकड़ा करीब 200 सीटों तक पहुंचाना ही पड़ेगा, जो कि उसकी मौजूदा रणनीति में संभव नहीं दिखाई दे रहा। बीजेपी को समझना चाहिए कि वो जितनी अधिक सीटें जीतेगी, एनडीए में उसे कम से कम पार्टियों की ज़रूरत पड़ेगी, यानी सरकार ज़्यादा मज़बूती और स्थिरता से चलेगी, टांग-खिंचाई कम होगी, बड़े फ़ैसले लेने में आसानी होगी।

व्यक्तिगत मैं राष्ट्रीय पार्टियों के घटते दबदबे को कोई शुभ लक्षण नहीं मानता हूं, क्योंकि इस बात के बावजूद कि दोनों प्रमुख राष्ट्रीय पार्टियां निम्न कोटि की राजनीतिक नैतिकता और तमाम तरह के भ्रष्टाचार की प्रैक्टिस में संलग्न हैं, अधिकांश क्षेत्रीय दलों की तुलना में वे अब भी बेहतर हैं। क्षेत्रीय दल ज़रूरत से अधिक क्षेत्रवाद तो करते ही हैं, लेकिन भ्रष्टाचार, राजनीति के अपराधीकरण, वंशवाद, जातिवाद, सांप्रदायकिता और कई अन्य तरह की संकीर्ण राजनीति करने में भी राष्ट्रीय दलों के कान काटते हैं। इसका विस्तृत विश्लेषण कभी और किया जा सकता है, लेकिन मैं बहुत सोच-समझकर इस नतीजे पर पहुंचा हूं। इसलिए राष्ट्रीय दलों की अलग-अलग प्रदेशों में क्षेत्रीय दलों पर बढ़ती निर्भरता से मुझे कोई ख़ुशी नहीं होती है। मैं चाहता हूं कि देश में उदार और समग्र राष्ट्रीय सोच रखने वाली चार-पांच बड़ी पार्टियां हों। बस। इस लिहाज से कांग्रेस और बीजेपी के अलावा कुछ लेफ्ट पार्टियों को मैं और मज़बूत देखना चाहूंगा। साथ ही इन तीनों के अलावा एक चौथा मज़बूत और साफ-सुथरा राष्ट्रीय राजनीतिक विकल्प भी तैयार हो सके, तो और अच्छा।

बहरहाल, बीजेपी में अगर तनिक भी राजनीतिक विवेक, स्वाभिमान और जुझारूपन बचा है, तो यही उसके लिए सही समय है जेडीयू से अलग होकर बिहार में अपनी नई ज़मीन तैयार का और सांप्रदायिक राजनीति छोड़कर अपने चाल, चेहरा और चरित्र में महज नारों वाली नहीं, असली शुचिता लाने का।

………………………………साभार ………………………………………………अभिरंजन कुमार

Advertisements

नीतीश जी, हवा बांधने से देश नहीं चलता!

नीतीश कुमार बिना नाम लिए जो सवाल नरेंद्र मोदी से पूछ रहे हैं, वही सवाल मैं नाम लेकर नीतीश जी से पूछना चाहता हूं- 
1. कैसा विकास होना चाहिए? 
2. हम विकास भी कर जाएं और भुखमरी के शिकार भी लोग रहें तो कैसा विकास? 
3. हम विकास भी कर जाएं और कुपोषण के शिकार भी लोग रहें तो कैसा विकास? 
4. हम विकास भी कर जाएं और पीने का पानी न मिले, तो कैसा विकास?”

नीतीश जी कहते हैं कि “विकास का मतलब बुनियादी ढांचे का विकास और मानव विकास दोनों है। जितना जोर बुनियादी ढांचे पर होगा, कल-कारखाने पर होगा, उससे कम जोर मनुष्य के विकास पर नहीं होना चाहिए।” उनका कहना है कि “ऐसा न विकास का मॉडल लोग चला दें कि और गैरबराबरी बढ़ जाए। विकसित लोग और विकसित हो जाएं और पिछड़े लोग और पिछड़ जाएं।”

नीतीश जी ये भी कहते हैं कि “ढाई हज़ार साल का इतिहास है। हम कभी तिजारत के लिए नहीं जाने जाते थे। हम या तो सुशासन के लिए जाने जाते रहे या ज्ञान के लिए जाने जाते थे। पाटलिपुत्र सत्ता का केंद्र था और नालंदा ज्ञान का केंद्र था।”

बातें बड़ी-बड़ी हैं। इनसे कोई असहमत नहीं हो सकता। लेकिन उनकी हर बात से सहमत होते हुए ही मैं वे सवाल उछाल रहा हूं, जो उन्होंने परोक्ष रूप से नरेंद्र मोदी के लिए उछाले हैं। जानता हूं कि जवाब नहीं मिलेगा, क्योंकि नीतीश जी उन सवालों के जवाब नहीं दिया करते, जो उन्हें असहज करते हैं। वो कहते ज़रूर हैं कि “हवा बांधने से देश नहीं चलता”, लेकिन सच्चाई यह है कि हवा बांधकर ही वे सब कुछ चलाना चाहते हैं। 

हो सके तो नीतीश जी यह बताएं कि बिहार में कुपोषण कितना कम हो गया है। उनके सत्ता संभालने के बाद से बिहार के मुज़फ्फरपुर और गया समेत करीब दस ज़िलों में इनसेफलाइटिस या एक्यूट इनसेफलोपैथी सिंड्रोम- जो भी कहें, उनसे होने वाली मौतों में बेइंतहां वृद्धि क्यों हुई है? पिछले साल ऐसे करीब तीन सौ बच्चे मारे गए, जिन्हें कायदे से समूची इक्कीसवीं सदी जीनी थी। हम सब ज़िंदा रहे और हमारी आंखों के सामने हमारे छह-छह महीने साल-साल दो-दो साल के वे बच्चे छटपटाते हुए बिलखते हुए दम तोड़ते रहे। राज्य के स्वास्थ्य मंत्री और सचिव ने ख़ुद कहा था कि ये बीमारी गंदगी, गरीबी और कुपोषण की वजह से फैलती है। अब अगर ये बीमारी पहले से ज़्यादा विकट रूप में सामने आ रही है, तो क्या इसका सीधा-सीधा मतलब ये नहीं है कि उन इलाकों में गंदगी, गरीबी और कुपोषण का असर बढ़ा है?

यह क्या माजरा है कि बिहार में ऐसी-ऐसी बीमारियों ने दोबारा सिर उठा लिया है, जिनके बारे में माना जाता था कि उनका उन्मूलन हो चुका है। अभी मुज़फ्फरपुर और कटिहार में चेचक के सैकड़ों केस सामने आए हैं। डायरिया से तो हर साल हमारे सैकड़ों बच्चे मरते ही हैं। अगर नीतीश जी ने लोगों को पीने का साफ़ पानी मुहैया करा दिया है तो फिर क्यों साफ़ पानी न मिलने की वजह से बड़ी संख्या में लोगों की अकाल-मृत्यु हो रही है? हो सके तो नीतीश जी बिहार के सिर्फ़ एक गांव का नाम बता दें, जहां पिछले साढ़े सात साल में सरकारी प्रयासों से लोगों को पीने का साफ़ पानी मिल गया हो। 

अगर बिहार में भुखमरी नहीं है तो क्यों जहानाबाद में महादलितों, जो उनके एजेंडे पर कथित रूप से सबसे ऊपर हैं, के बच्चे आज भी चूहे मारकर खा रहे हैं और क्यों पटना सिटी में गरीबों के बच्चे नालियों से मछलियां पकड़-पकड़कर खा रहे हैं? अगर बिहार में भुखमरी नहीं है, तो क्यों नीतीश जी के स्कूलों में कई बार ऐसा हुआ कि बच्चे छिपकली वाली खिचड़ी खा-खाकर बीमार पड़े और कइयों की तो मौत भी हुई? किसी मां-बाप की वो कौन-सी मजबूरी होती है कि वह अपने बच्चों को छिपकिली वाली खिचड़ी खाने के लिए घटिया स्कूलों में भेज देता है? बिहार में इस वक्त सरकारी स्कूलों की जितनी ख़राब दशा है, उसे देखते हुए यह कहना ग़लत नहीं होगा कि उन घटिया स्कूलों में अब सिर्फ़ उन्हीं परिवारों के बच्चे पढ़ रहे हैं, जिन परिवारों में भुखमरी की स्थिति है। बिहार में भुखमरी में जी रहे परिवारों का पता करना हो, तो सबसे पहले यह पता कर लीजिए कि यहां के घटिया सरकारी स्कूलों में कितने परिवारों के बच्चे पढ़ रहे हैं। 

अगर बिहार में ग़ैरबराबरी पर चोट करने वाली नीतियां अपनाई जा रही हैं, तो क्यों 38 में से 37 ज़िलों में प्रति व्यक्ति आय राज्य की प्रति व्यक्ति आय से काफी नीचे है? बिहार की प्रति व्यक्ति प्रति दिन की आय 70 रुपये 28 पैसे है, लेकिन सिर्फ़ राजधानी पटना के लोगों की आय इस औसत से ज़्यादा है- 146 रुपये 68 पैसे। बाकी 37 जिलों में से 36 ज़िलों के लोगों की आय 40 रुपये से नीचे है और 37वें ज़िले मुंगेर के लोगों की आय 51 रुपये 14 पैसे है। अगर बिहार में ग़ैरबराबरी नहीं बढ़ रही है, तो इस बात का क्या जवाब है कि आख़िर क्यों 7 ज़िलों में लोगों की आमदनी घट गई? क्यों शिवहर में आज भी एक व्यक्ति 15 रुपये 12 पैसे प्रतिदिन पर जी रहा है?

क्या नीतीश जी इस सवाल का जवाब दे सकेंगे कि बिहार में किसका विकास हो रहा है? बेईमान नेताओं, शराब-माफिया, ठेकेदारों, ज़मीन कब्ज़ाने वालों, बिल्डरों, घूसखोर अफसरों, भ्रष्ट मुखिया-सरपंचों के अलावा और किस-किसका विकास हो रहा है बिहार में? 

अगर बिहार में सचमुच का विकास हो रहा है तो पलायन दिन-ब-दिन क्यों बढ़ता जा रहा है? असम में, महाराष्ट्र में, दूसरे राज्यों में बिहारी मारे जा रहे हैं, दुरदुराए जा रहे हैं, इसके बावजूद वे बिहार में क्यों नहीं टिकते? आज बिहार के ज़्यादातर ग़रीब परिवारों के किशोर और नौजवान दूसरे राज्यों में मज़दूरी करने चले गए हैं। मनरेगा जैसी योजनाएं चलाए जाने के बावजूद ऐसे हालात क्यों बन गए हैं- क्या नीतीश कुमार जी इसका जवाब दे सकेंगे? अकेले मनरेगा में 80 प्रतिशत भ्रष्टाचार से किसका विकास हो रहा है? 20 लाख फ़र्ज़ी जॉब कार्ड का फ़ायदा किन ग़रीबों को मिल रहा है?

बिहार की पहचान अगर ज्ञान के केंद्र के रूप में रही, तो फिर छात्र अपने ही राज्य में रुककर पढ़ाई क्यों नहीं कर रहे? सच्चाई तो यह है कि प्राइमरी स्कूलों से लेकर विश्वविद्यालयों तक की जितनी बुरी स्थिति नीतीश जी के कार्यकाल में हो गई है, उतनी बुरी स्थिति बिहार के ढाई हज़ार साल के उस इतिहास में, जिसका नीतीश जी ज़िक्र कर रहे हैं, कभी नहीं थी। ख़ुद हम बिहार के सरकारी स्कूलों और कॉलेजों से पढ़कर निकले, लेकिन अब की तुलना में हालात तब काफी बेहतर थे। आज तो नीतीश जी के स्कूलों में सिर्फ़ मज़दूरों और ग़रीब किसानों के बच्चे पढ़ रहे हैं और अगर यही हाल रहा तो इन स्कूलों से अपवादों को छोड़कर सिर्फ़ मनरेगा के मज़दूर, नक्सली और बाहुबली नेताओं की बंदूकें ढोने वाले ही निकलेंगे- यह तय मानिए। 

किसी साथी ने इसी फेसबुक पर कहा था कि लालू के राज में जितनी ख़राब स्थिति सड़कों और कानून-व्यवस्था की हो गई थी, नीतीश के राज में उससे ज़्यादा ख़राब स्थिति शिक्षा की हो गई है। इसके बावजूद अगर नीतीश कुमार बिहार के ज्ञान का ढिंढोरा पीट रहे हैं तो इसे क्या कहा जाए? 

पिछले साढ़े सात साल में बिहार में कुछ सड़कें ज़रूर बनी हैं, लेकिन हिन्दुस्तान के किस पिछड़े से पिछड़े राज्य में इन बर्षो में सड़कें नहीं बनी हैं, कोई मुझे यह भी बता दे। और साथ ही यह भी बता दे कि बिहार में जो सड़कें बनी हैं, उनका स्तर क्या है, उनकी क्वालिटी कैसी है और इन सड़कों में नीतीश जी की सरकार का कितना योगदान है और केंद्र की सरकार का कितना योगदान है? साथ ही कितने पैसे इन सड़कों में खाए गए हैं? अगर खाने का स्कोप नहीं होता, तो क्या ये सड़कें बनाई जातीं?

सड़कों का ढिंढोरा एक तरफ- दूसरी तरफ इस राज्य में पिछले साढ़े सात साल में एक फैक्टरी नहीं लगी, एक यूनिट बिजली का उत्पादन नहीं हुआ, विकास के नाम पर घूसखोरी, कमीशनखोरी और दलाली का बोलवाला हो गया, चप्पे-चप्पे पर शराब बिकने लगी, ज़हरीली शराब से मौत की घटनाओं में बेतहाशा वृद्धि हो गई, लड़कियों को साइकिलें तो बांटी, लेकिन रेप और छेड़खानी की घटनाओं में इज़ाफ़ा हो गया, घटनाएं घटने तक भी बात रहती, तो अलग बात थी, लेकिन सरकार और पुलिस ने कई मौकों पर खुलेआम रेपिस्टों और छेड़खानी करने वाले मनचलों का साथ दिया, बात-बात पर आम लोगों पर पुलिस ने लाठी-गोलियां चलाईं- क्या यही विकास है और क्या यही सुशासन है?

अखबारों को विज्ञापनों की घूस खिलाकर, पत्रकारों की अंतरात्मा को कुचलकर, प्रचारात्मक ख़बरों को प्रचारित करके, नकारात्मक ख़बरों को सेंसर करके, सेवा-यात्राओं, अधिकार-यात्राओं, अधिकार-रैलियों, ग्लोबल समिटों, बिहार दिवस के चीप कार्यक्रमों, जिनमें पुलिस को लाठियां चलानी पड़ती हैं, इन सबके ज़रिए बिहार में हवाबाज़ी नहीं की जा रही है, तो क्या की जा रही है? 

बड़ा सवाल यह भी है कि नीतीश जी जो कसौटी देते हैं, उसपर क्या अपनी सरकार को भी कसकर देखते हैं या फिर उन्हें लगता है कि नरेंद्र मोदी का हौवा खड़ा कर वे भी फ़र्ज़ी धर्मनिरपेक्ष नेताओं की तरह अपनी दुकानदारी चलाते रह जाएंगे? मुसलमानों की बात करते हैं तो यह सवाल तो उठेगा कि बीजेपी, आडवाणी, जोशी, राजनाथ धर्मनिरपेक्ष और नरेंद्र मोदी सांप्रदायिक- कैसे? मोदी राज में दंगे हुए, तो आडवाणी की रथयात्रा से देश में कौन-सी सांप्रदायिक सद्भाव की बयार बह चली थी? गुड़ भी खाइएगा और गुलगुले से परहेज भी कीजिएगा- तो क्या भारत का मुसलमान इतना बेवकूफ़ है? …और आप अपने राज की भी तो बात करें। फारबिसगंज में सरकारी संरक्षण-प्राप्त माफिया के लिए गोली चलवाई गई और चार मुसलमानों की हत्या हुई। उन मुसलमानों का इंसाफ़ कहां है सरकार? 

मेरी व्यक्तिगत मान्यता है कि विशेष दर्जे के मुद्दे पर भी सिर्फ़ हवाबाज़ी हो रही है। एक तरफ केंद्र से तीन-चार हज़ार करोड़ रुपये का फ़ायदा पाने के लिए इतना शोरगुल, दूसरी तरफ चुपके से अंतिम समय में राज्य का योजना आकार 28 हज़ार करोड़ से घटाकर 25 हज़ार करोड़ कर देना, यानी उतने की सीधी कटौती, जितने के फायदे के लिए मुख्यमंत्री जी दिल्ली तक हाथ पसार रहे हैं- क्या दर्शाता है? 

बिहार को जितना दीन-हीन नीतीश जी बताते रहते हैं, कायदे से बिहार को उतना दीन-हीन होना नहीं चाहिए। बिहार के पास समंदर नहीं है तो क्या हुआ? बिहार के पास कई सदानीरा नदियां तो हैं। बिहार के पास उपजाऊ मिट्टी तो है। बिहार के पास क़षि आधारित उद्योगों की अपार संभावनाएं तो हैं। बिहार के पास मेहनतकश नौजवान तो है। बिहार के पास हिन्दुस्तान की बेहतरीन प्रतिभाएं तो हैं। क्या इन चीज़ों के सहारे कोई राज्य अपने पैरों पर खरा नहीं हो सकता? और अगर नहीं हो सकता, तो इस राज्य का कभी भला नहीं हो सकता- यह आप मुझसे लिखवा लीजिए। 

बिहार को केंद्र से तीन-चार हज़ार करोड़ की सालाना खैरात नहीं चाहिए, देश के स्तर पर आने के लिए मौजूदा मूल्य पर हर साल 3 लाख 65 हज़ार करोड़ की विशाल रकम चाहिए और इतनी बड़ी रकम अगर यह राज्य अपने पुरुषार्थ से पैदा नहीं कर सकता, तो भिक्षाटन के ज़रिए कभी नहीं जुटा पाएगा। इस 3 लाख 65 हज़ार करोड़ रुपये का अर्थशास्त्र मैं अपने चैनल पर समझा चुका हूं। कभी इसपर विस्तृत आलेख भी लेकर ज़रूर आऊंगा। 

साफ़ है कि बिहार में भी इस वक्त सिर्फ़ और सिर्फ़ हवाबाज़ी चल रही है। मैं नीतीश जी की इस बात से बिल्कुल सहमत हूं कि हवा बांधने से देश नहीं चलता। इसलिए उनसे अपील करूंगा कि किसी रात अंधेरे बंद कमरे में घंटे-दो घंटे बैठकर अपनी ही कही बातों पर ज़रूर ग़ौर करे।

साभार ……………………………….. अभिरंजन कुमार 

पत्रकारों से आम आदमी की अपेक्षा

प्रेस परिषद के रिपोर्ट के बाद बिहार और बिहार के बाहर काटजू सुर्खियों में है– बिहार में मीडिया के स्वतंत्रता को लेकर विरोध मार्च हो रहे हैं। सोशलसाईट से लेकर चौक चौराहे तक मीडिया और मीडियामैंन पर बहस छिड़ी हुई है ।हर कोई अपने अपने तरीके से परिषद के रिपोर्ट का विशलेषण कर रहे हैं। लेकिन इन सब के बीच पत्रकारिता पर कही कोई चर्चा नही हो रही है। फोकस में सिर्फ और सिर्फ नीतीश और नीतीश के इशारे पर नाचते मीडिया की चर्चा हो रही है मैं भी उस विवाद में पड़ गया था लेकिन आज मुझे लगा कि कहां बूरे फस गये थे अपना काम छोड़ कर वहां ऐसा कि आज सुबह मेरे ससुराल से फोन आया फोन उठाये तो मेरे साले जी पत्नी लाईन पर थी सीधा सवाल था उनका 20 और 21 फरवरी को बिहार बंद है उसका प्रभाव इंटर के परीक्षा पर भी पड़ेगा क्या परिक्षाये रद्द तो नही हो गयी मैंने कहा नही अभी तक तो कोई सूचना नही है फिर वो बोली अखबार में भी इसको लेकर कुछ भी नही छपा है मैने कहा आज बात करके शाम में बता देगे।फिर बच्चो को छोड़ने स्कूल चला गया लौटने के दौरान फिर से देखते हैं ससुराल वालो का ही फोन है साली महोदया, लाईन पर थी हलाकि उनके फोन करने का यह वक्त नही था। मुझे लगा क्या हुआ भाई चलते चलते बाईक पर फोन उठा लिया और क्या सब ठिक है अरे उनके बांस आने वाले हैं 20 और 21 को किसी चीज का बंद है क्या मैंने कहा है ट्रेड यूनियन का 20 और 21 फरवरी को भारत बंद है। और इसका प्रभाव भी पड़ेगा खास करके हवाई और रेल मार्ग पर इसका असर पड़ सकता है इसी को लेकर कल रात प्रधानमंत्री ने ट्रेड यूनियन के नेता से हड़ताल वापल लेने का आग्रह किया है चलिए पहले उनको बता देते है फिर बात करते हैं।घर पहुंचने के बाद मैंने कांल किया उन्होने बतायी सामने तीन अखबार है कसी में भी इसको लेकर कोई खबर नही है। खबर है तो आशाराम बापू की आप पत्रकारो को तो देश निकाला दे देना चाहिए क्या तरीका है पाठक को आप समान्य सी जानकारी भी नही दे सकते अभी सोच रहे थे गूंगल सर्च करे लेकिन फिर लगा मुझे आपके पास जानकारी हो सकती है।ये साली जी हमारे टीचर भी है चैनल पर लाईफ चल रहा हो या फिर फोनिंग या फिर मेरी खबरों की सबसे बड़ी भ्यूर हैं।खबर खत्म होते ही इनका फोन या फिर मैंसेज जरुर आता है क्या सुधार करना है या फिर क्या इस खबर में औऱ क्या हो सकता है-वही फेसबूक पर भी हमारे हर पोस्ट पर इनकी पैंनी नजर रहती है और कभी मैं इनका बुद्धू तो कभी छलिया तो कभी दिवाना रहता हूं अरे इनके बारे में बताते बताते मैं मुद्धा से ही भटक गया था।पत्रकार मित्रों ये पाठक है और एक संवेदनशील पाठक हैं एक पाठक की अपेक्षाओ पर हमलोग कहां तक खड़े उतर रहे है जरा सोचिए शायद इस तरह की खबरे लिखने पर नीतीश जी की और से मनाही नही होनी चाहिए इसको हमलोग जगह दे सकते हैं कहने का मतलब यह है कि हमलोग पाठक को आम सूचना भी दे पाने में विफल रह रहे है और लोगो में गुस्सा इसी बात को लेकर है।

____________________________________साभार —-> रंजू संतोष कि कलम से _____

मीडिया और अभिव्यक्ति

मित्रों ये मोबाईल भी गजब की चीज है जहां तक आप सोच नही सकते मोबाईल वहां भी दस्तक देने से बाज नही आता है। आज सुबह मुख्यमंत्री के कार्यक्रम में जाने की जल्दी में बिस्तर से उठने के साथ ही भाग दौर शुरु हो गया इसी दौरान हमारे एक खास मित्र का फोन आया हाई हेलो हुआ और फिर मैं रात में बात करने की बात कर फोन रखने लगे। लेकिन मित्र इतने से शांत होने वाले नही थे। बात शुरु हुई प्रेस परिषद के रिपोर्ट और उसके बाद पटना की सड़कों पर निकले जुलुस को लेकर मैंने सीधा पल्ला झाड़ लिया भाई उस जुलुस में मुझे भी जाना था लेकिन निकलते वक्त एक फेसबूक फ्रेंड दिल्ली से आये इसी से नही जा सका ।उन्होने कहा बढिया है आपके मित्र ने गलत काम करने से रोक दिया मैंने कहा ऐसा क्या है। जिस समय जुलुस डाकबंगला से गुजर रहा था उस वक्त मैं भी डाकबंगला पर ही था। अरे यार तुम पटना में हो नही दिल्ली पहुंच गया सौभाग्यशाली था जो मैं उस मार्च को देख सका खोज रहा था तुम्हे उस जुलुस में लेकिन मुझे पूरा विश्वास था की तुम नही होगे ।क्या मजाक है सबसे आगे नवल किशोर चौधरी बैनर लिए बढ रहे थे मुझे बड़ी हस्सी आयी नवल किशोर चौधरी तो मीडिया के आईकोन बने हुए है जब भी नीतीश के सरकार पर प्रहार करना हो सारे चैनल पर चौधरी जी लगभग रोजाना मौजूद रहते हैं। फिर दिखे बीबीसी वाले मणीकांत ठाकुर जी क्या बात है पिछले सात वर्षो को उनकी स्टोरी निकला लो उनकी हर स्टोरी में नीतीश की ऐसी की तैसी किये रहते हैं हाल में भी शिक्षा से जुड़ी योजनाओ के खोटाले पर खबरे लिखे हैं। एक था जो कोई आईएस आईपीएस का पोटल चलाता है नौकशाही की बात कर रहे हो क्या—हा हा देखते है तुम बड़े प्रभावित रहते हो ।उनका सारा पोस्ट पढते है वो क्या लिखते है इसकी समझ मुझे भी है अधिकारियो के चूचलेबाजी के अलावा रहता क्या है और चले है मीडिया के फ्रिंडम की बात करने क्यो नही लिखते हैं यहां के भ्रष्ट अधिकारियो के बारे में कैसे थाने की बोली लगायी जाती है क्यो नही लिखते हैं कौन उनको रोक रखा है।और मीडिया का मतलब सिर्फ अखबार ही नही होता है क्या जरा पुछिए बंदर के हाथ में बिहार लिखने वाले पत्रकार का क्या हुआ जरा पुंछिए ना खबर के काऱण टाईम्स आंफ इंडिया के सम्पादक पर कार्यलय से निकलते वक्त गोली मारी गयी थी। पुछुए मीडिया के इन रहनुमाओ से क्या हाल था लालू राबड़ी के 15 वर्षो के कार्यकाल में कितने पत्रकार पीटे गये इन रहनुमाओ को आज याद नही होगा ।उस वक्त भी यहां के बड़े अखबार लालू के खिलाफ खबर लिखने से बचते थे।रही बात प्रेस परिषद के रिपोर्ट का तो मीडिया का मतलब बिहार में सिर्फ अखबार ही है क्या — भिजुउल मीडिया तो हर वक्त नीतीश की बैंड बजाता रहता है क्या वह मीडिया नही है।जरा इन रहनुमाओ से पुछिए ब्रमेश्वर मुखिया से शव यात्रा के दौरान एक अखबार ने लिखा था (गो बेंक अभ्यानंद गो बेंक) ये खबर किसी लंदन के अखबार ने नही छापी थी।इस मसले पर खुली बहस होनी चाहिए नेता का बयान कहा छपता है यह प्रबंधन तय करता है इसमें किसी पत्रकार की कोई भूमिका नही होती है और जिसे बिहार की जनता ने ही नकार दिया है उसे मीडिया कितने दिनों तक छापते चलेगा। और फिर अपने राज में मीडिया को कभी ब्रह्ममणवादी तो कभी सर्वणवादी कह कर गाली देने वाले महाश्य किसी मीडिया वाले से सम्बन्ध भी बना कर नही रखे कौन उनकी वकालत करेगा। और सुनो संतोष उस प्रतिरोध मार्च में भी वही अधिकांश लोग थे जो कभी मीडिया को पानी पी पीकर गाली दे रहे थे। सूनते सूनते मेरा कान पक गया था मैंने कहा बस कर यार अब रात में बात करते हैं। लेकिन हल्के अंदाज में ही इसने जो कह दिया वह साचने वाली बात तो जरुर है और आप भी गौर करिए और अगर आपके पास वर्तमान सरकार के खिलाफ कोई वैसी खबर है तो भेजिए छापने और दिखाने वाले वीर पुरुष बिहार में अभी भी मौंजूद है लेकिन सीधे सीधे मीडिया पर सवाल खड़े करने से बाज आये।

साभार ————–रंजू संतोष कि कलम से ———-

बिहार में प्रिंट मीडिया….

“बिके हुए अखबारों को खरीदना बंद करो”

क्या दुर्भाग्य है कि आज मां सरस्वती की पूजा का दिन है, लेकिन हमें चर्चा यह करनी पड़ रही है कि बिहार में मां सरस्वती के अखबारों में काम करने वाले बेटे-बेटियों के लिखने की आज़ादी जेपी के उन चेलों ने ही अखबार-मालिको को विज्ञापन की घूस खिलाकर खरीद ली है, जो इमरजेंसी का विरोध करके सियासत में पैदा हुए थे।

अगर सचमुच आत्मा जैसी किसी चीज़ का अस्तित्व होता होगा, तो आज निश्चित रूप से लोकनायक की आत्मा कलप रही होगी कि किस तरह के फ़र्ज़ी लोगों को उन्होंने सियासत की ज़मीन मुहैया कराई। अभिव्यक्ति की आज़ादी के लिए लड़ने का ढोंग करने वालों ने पहला मौका मिलते ही अभिव्यक्ति की आज़ादी का गला घोंटा।

तानाशाही का विरोध करने वाले ज़्यादा बड़े तानाशाह निकले। इमरजेंसी का विरोध करने वालों ने अपनी सरहद में अघोषित इमरजेंसी लगा दी। सादगी की सियासत करने वालों में आत्म-प्रचार की इतनी भूख होगी कि उसे हर रोज़ अपने राज्य में छपने वाले सभी अखबारों के पहले पन्ने पर अपनी बड़ी-सी फोटो और गुणगान चाहिए- यह कल्पना से भी परे था।

इस दुनिया में बहुत सारे लोग लंबे समय तक यह समझने की कोशिश करते रहे कि आइंस्टीन के दिमाग में क्या था, लेकिन हम उस नेता का दिमाग समझना चाहते हैं, जिसने अपनी ही सत्ता रहते हुए राजधानी की सड़कों पर होर्डिंग्स लगवाकर एलान कर दिया कि मैं बिहार हूं। उसे यह भी याद नहीं रहा कि बिहार में साढ़े दस करोड़ लोग और भी हैं। कोई एक व्यक्ति राष्ट्र या राज्य नहीं हुआ करता।

हमें अफसोस है कि जब नेताजी ने राज्य के प्रिंट मीडिया को पूरी तरह ग्रिप में ले लिया, तब उन्हें इलेक्ट्रॉनिक मीडिया की ग्रोथ भी खटकने लगी। जिस भाषण में उन्होंने राष्ट्रपिता महात्मा गांधी की खिल्ली उड़ाने वाले शराब-कारोबारी का जमकर प्रशस्ति-गान किया, उसी भाषण में उन्होंने इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के तथाकथित ग्रोथ का मखौल उड़ाया।

हद तो तब हो गई, जब वो चाहते थे कि उनकी और डीजीपी की मौजूदगी में आपराधिक इतिहास वाले एक विधायक-पति द्वारा कार्बाइन लहराने और आम लोगों पर लाठियां बरसाने की तस्वीरें राज्य का इलेक्ट्रॉनिक मीडिया नहीं दिखाए। इसके लिए उनके प्रवक्ता ने इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के ख़िलाफ़ जमकर अपनी भड़ास निकाली।

दुर्भाग्यपूर्ण है, शर्मनाक है, पर सच है कि राज्य में प्रिंट मीडिया पूरी तरह सत्ता की दलाली करने में जुटा हुआ है। हम तो अब तक यही समझते थे कि चाहे नेता हो या पत्रकार, चाहे सरकार हो या अखबार- किसी लोकतंत्र में उसकी प्रथम और अंतिम जवाबदेही जनता के ही प्रति होती है। लेकिन यह क्या? यहां तो अखबार सरकार के प्रति जवाबदेह हैं।

मीडिया घरानों और सरकार के नेक्सस में जनता की आवाज़ कहीं गुम-सी हो गई है। जनता के ही पैसे ख़र्च करके जनता को ज़रूरी सूचनाओं, जानकारियों और ख़बरों से वंचित रखा जा रहा है। जन-आंदोलनों की आवाज़ दबाई जा रही है। राज्य में पुलिसिया बर्बरता बेइंतहां बढ़ गई है। मौत बांटने वाली शराब का धंधा बड़े-बड़े लोगों के संरक्षण में फल-फूल रहा है।

अब अपराधी ही नहीं, पुलिस वाले भी रंगदारी मांगते हैं। राज्य में शिक्षा और स्वास्थ्य व्यवस्था ध्वस्त हो चुकी है। हाथों में पत्थर लेकर बच्चे भी सड़कों पर हैं, हाथों में चप्पलें लेकर शिक्षक भी सड़कों पर हैं। इन सबके बीच भग्नावशेषों से बदतरहाल उनके स्कूल अपनी किस्मत को कोस रहे हैं। राज्य के सरकारी अस्पतालों में प्राइवेट नर्सिंग होम्स ने दलाल फिट कर रखे हैं। प्रतिरोध हो, तो पीएमसीएच जैसे अस्पताल में गोलियां चल जाती हैं। मरीज़ की जान की परवाह किसी को नहीं, लेकिन उसकी जेब पर सबकी निगाहें हैं।

सात साल में एक यूनिट बिजली नहीं बनी। एक गांव में पीने का साफ़ पानी नहीं पहुंचाया जा सका। भ्रष्टाचार का देश का सबसे ऊंचा पहाड़ पटना में खड़ा हो गया है। ग़रीब जनता कराहती हुई पूछ रही है कि इंसाफ़ किस चिड़िया का नाम है, कम से कम उसकी फोटो ही दिखा दो। मां-बहनों के साथ बलात्कार हो जाए, तो यह राज्य उसे इंसाफ़ दिलाने के लिए नहीं, मामला दबाने के लिए काम करता है।

फिर भी कहिए कि बिहार में सब चकाचक है। अखबारों के पन्नों पर संपूर्ण सुशासन है और सत्तासीनों के कंठ में लच्छेदार भाषण है। पिछले टर्म में केंद्र के पैसे से कुछ सड़कें बन गईं और कुछ लड़कियों को साइकिलें बांट दी गईं। अब बिहार को कुछ और नहीं चाहिए। क्रेडिट भी मिल गया। दोबारा सत्ता भी मिल गई। अब मीडिया से अपेक्षा यह है कि हमारी लूट-खसोट पर अपना मुंह बंद रखो।

अंग्रेज़ों की फूट डालो और राज करो वाली नीति यहां भी एप्लाई की गई। बिहार में बेहद चालाकी से प्रिंट मीडिया और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया की एकता तोड़ दी गई। आज दोनों दो ध्रुव की तरह दिखाई देते हैं। किसी इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के पत्रकार के साथ कुछ हो जाए, तो बिहार का प्रिंट मीडिया नहीं बोलेगा। उस वक्त न वो पत्रकार का, न बिहार का, बल्कि सरकार का हित देखेगा।

इसके बावजूद हम यही कहेंगे कि कसूर प्रिंट के पत्रकारों का नहीं, सरकार का है और मीडिया घरानों का है। दोनों के नेक्सस में बेचारा पत्रकार पिस रहा है, डरा हुआ है, लाचार है। उसका भी परिवार है। उसके भी बीवी-बच्चे हैं। क्या करेगा वह? अपनी नौकरी बचाए या क्रांति करे? उसकी इसी मजबूरी और डर का फ़ायदा यह नापाक गठजोड़ उठा रहा है।

और ये बेचारे काटजू साहब बिहार के अखबारों को सेंसरशिप से क्या मुक्त कराएंगे, ख़ुद उन्हीं की ख़बर को यहां के अखबारों ने सेंसर कर दिया। हालत यह हो गई कि काटजू की जांच टीम की रिपोर्ट से जुड़ी ख़बर तक सरकारी विज्ञापन की घूस खाने वाले बिहार के बड़े अखबारों ने नहीं छापी। जहां इतनी गुलामी हो, वहां आज़ादी की लड़ाई लड़ने के लिए कौन आगे आएगा?

ऐसे में अगर प्रिंट मीडिया के हमारे भाई-बहन अपनी ही लड़ाई के लिए आगे नहीं आ रहे, तो हम उनका डर भी समझते हैं और मजबूरी भी। किडनैप हुए किसी व्यक्ति से यह उम्मीद नहीं की जा सकती कि वह किडनैपर से लड़े, इसलिए अभी उनकी यह लड़ाई हमें ही शुरू करनी होगी, पर एक दिन जब किडनैपर के किले में छेद हो जाएगा, तब हमें यकीन है कि उनका भी हौसला बढ़ेगा। वो भी दहाड़ेंगे और किडनैपर की सारी हेकड़ी भुला देंगे।

फिलहाल इस लड़ाई में बिहार की क्रांतिधर्मी जनता का समर्थन सबसे ज़्यादा ज़रूरी है। उनके भीतर से आवाज़ें उठनी चाहिए। अपनी सरकार से उन्हें सवाल पूछने चाहिए। अपने जनप्रतिनिधियों का घेराव करना चाहिए। अगर वह मानते हैं कि वे बिके हुए अखबारों को खरीद रहे हैं, तो उन्हें खरीदना तत्काल बंद कर देना चाहिए।

सड़कों पर उतरकर उन अखबारों को जला देना चाहिए, जिन अखबारों का एक-एक शब्द बिका हुआ है। जिन अखबारों में पत्रकारों की सच्चाई की स्याही नहीं, मजबूरी का ख़ून छपा हुआ है, उन अखबारों को ख़रीदकर उनका धंधा चमकाना बंद करना चाहिए। बिहार में स्वतंत्र पत्रकारिता का परचम बुलंद हो और पत्रकारों को आज़ादी मिले- इसके लिए यह बेहद ज़रूरी है।

यह होगा- तभी मीडिया घरानों को यह संदेश जाएगा कि सरकार के साथ मिलकर जो नापाक गठजोड़ उन्होंने बनाया है, उसकी वजह से पाठक उनके अखबार से नफरत करने लगे हैं। और सरकार को भी इतनी अकल आ जाएगी कि जैसे चुनाव-पूर्व मनपसंद सर्वेक्षण कराकर चुनाव नहीं जीते जाते, वैसे ही अखबारों में फ़र्ज़ी रिपोर्ट छपवाकर न सुशासन लाया जाता है, न जनता का दिल जीता जाता है।

इसलिए हमारी आज की आखिरी पंक्ति यही होगी कि बिहार और देश के कलम के सिपाहियो एक हो। ये लोग ज़मी बेच देंगे, गगन बेच देंगे। कली बेच देंगे, चमन बेच देंगे। कलम के सिपाही अगर सो गए तो, वतन के ये मसीहा वतन बेच देंगे। जय कलम। जय हिन्द।

…………………………………………………………………………अभिरंजन कुमार कि कलम से..

श्रद्धांजलि

साथियों,

“गम का खज़ाना तेरा भी है मेरा भी…”
आज मेरे साहेब- जगजीत सिंह साहेब जी कि जयंती है, न मेरी कुवत है न मेरी कलम में इतना जादू कि अपनी भावनाओं को शब्दों में पिरो कर कुछ कह सकूँ… लेकिन कुछ नहीं कहा तो फिर किया क्या. साहेब के नगमों के चंद लाईनों को आपके सामने रख रहा हूँ…

साहेब… चिठ्ठी न कोई सन्देश, जाने वो कौन सा देश जहाँ तुम चले गए…
साहेब.. चाक जिगर के सी लेते हैं.. जैसे भी हो जी लेते हैं…
साहेब.. रंज और गम कि बस्ती का मैं बासिन्दा हूँ.. ये तो बस मैं हूँ कि इस हाल में भी जिंदा हूँ..
साहेब.. शाम से आँख में नमी सी है.. आज फिर आपकी कमी सी है..
साहेब.. किसका चेहरा मैं देखूं.. तेरा चेहरा देख कर..
साहेब.. तुम को देखा तो ये ख्याल आया.. ज़िन्दगी धूप.. तुम घना साया..
साहेब.. अपने होठों पर सजाना चाहता हूँ.. आज फिर तुम्हे गुनगुनाना चाहता हूँ..
साहेब.. हजारों ख्वाशियें ऐसी कि हर ख्वाहिश पर दम निकले, बहुत निकले मेरे अरमान, लेकिन फिर भी कम निकले
साहेब.. होश वालों को खबर क्या बेखुदी क्या चीज़ है..आपको सुनिए फिर समझिये जिंदगी क्या चीज़ है..
साहेब.. मैंनू तेरा शवाब ले बैठा.. मैंनू जद भी तुस्सी हो याद आये.. दिन दिहारे शराब ले बैठा..
साहेब.. झुकी-झुकी सी नज़र बेक़रार आज भी है..
साहेब.. किसी नज़र को तेरा इंतज़ार आज भी है..
साहेब.. होठों से छू लो तुम मेरा गीत अमर कर दो..
साहेब.. दुनिया जिसे कहते हैं.. मिट्टी का खिलौना है..
साहेब.. तेरा चेहरा कितना सुहाना लगता है.. तेरे आगे चाँद पुराना लगता है..
साहेब.. कल चौदवीं कि रात थी.. शब्-भर रहा चर्चा तेरा..
साहेब.. कैसे-कैसे हादसे सहते रहे.. फिर भी हम हसतें रहें.. जीते रहें..
साहेब.. ये दौलत भी ले लो..ये शोहरत भी ले लो.. भले छीन लो मुझ से मेरी जवानी.. मगर फिर कुछ सुनाओ आप अपनी जुबानी..
साहेब.. “क्या भूलूं क्या याद करूं..”

बात निकली है तो दूर तलक जाएगी..

………………………………………………………………………………………….प्रभात रंजन झा

बिहार का विकाश

जब बात होती है बिहार में परिवर्तन की तो हम उत्साह के साथ यह कहते हैं कि हाँ बिहार बदल रहा है. सही बात है परिवर्तन कि जो लहर हम अभी देख रहे हैं वह सराहनीय है.. लेकिन यहाँ कुछ बातें विचार योग्य भी है, मसलन कि जिस रफ़्तार से परिवर्तन हो रहा है क्या यही सही है? क्योंकि जब मुख्य मंत्री खुद ही यह स्वीकार करते हैं कि अभी बिहार को औसत राष्ट्रीय स्तर पर पहुँचने के लिए ३५ वर्ष लगेंगे. विचारनीय विषय यह है कि अगर हम निरंतर इसी गति से विकाश करते हैं तो क्या राष्ट्रीय विकाश के स्तर के आस-पास पहुंचेंगे भी? क्योंकि जिस गति से राष्ट्रीय विकाश हो रहा है उस गति से हमारा विकाश तो होता नहीं दिख रहा है . ३५ क्या ३५० वर्षों में भी यह संभव नहीं हो पायेगा.

दूसरी आवश्यक बात जो अत्यंत जीवंत है वो है विकाश और भ्रटाचार के बीच का समानुपाती औसत. हम निरंतर विकाश कर हैं लेकिन भ्रष्टाचार भी उसी तेजी से हमारे बीच अपनी पैठ बना रहा है. सरकारी ऑफिश में काम तो हो रहा है लेकिन बिना पैसे के कुछ भी नहीं. आज ईमानदारी कि परिभाषा यह है कि जो आपके दिए पैसों पर आपका काम बिना हिल-हुज्ज़त के कर दे वो इमानदार और जो अधिक मांगे वो भ्रष्ट. क्या ये सही है? मुद्दा विचारनीय है..

नरेगा, इंदिरा आवास योजना, सरक निर्माण विभाग, स्वास्थ्य योजना, शिक्षा संस्थान या फिर राज्य सरकार द्वारा संचालित किसी भी योजना में भ्रष्ट लोगों ने सेंध लगा रखी है और उसके समुचित दोहन कर रहें हैं. सवाल ये है कि अगर आम आदमी इससे त्रस्त है और इसके बारे में जानता है तो क्या सरकार अनजान है? या फिर ये माना जाये कि सरकार ने इसकी मौन स्वीकृति दे रखी है.. पुलिस महकमे के बारे में कुछ नहीं कहा जाए तो ही अच्छा है…

पंडित नेहरु ने कहा था कि सरकारें लोक-कल्याणकारी होनी चाहिए.. लेकिन अगर लोक कल्याण  कि ये ही परिभाषा है तो ये सरासर गलत है. लेकिन आम आदमी करे क्या.. वो तो दो समय का खाना जुटाने में ही सारी उर्जा खपा देता है तो और बातों के लिए समय कहाँ से निकाले..

हे बिहार के निति-नियंताओं कृपा कर इन विषयों पर भी कभी-कभी सोंचा करिए.. हम आम जनता आपकी ओर आशा कि दृष्टि से देखते हैं..

धन्यवाद्

………………………………………………………………………………………………….प्रभात रंजन झा