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This entry was posted on फ़रवरी 4, 2013, in Home.

राज्यरानी एक्सप्रेस से कटकर 35 लोगों की मौत

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राज्यरानी एक्सप्रेस से कटकर मरने वालो कि संख्या हुई 35 लोगों की मौत, भीड़ ने लगाई आग , बिहार सरकार हादसे मे मरने वालो को दो – दो लाख रुपया देगी , जनता दरबार मे मुख्यमंत्री ने की घोषणा ।

समस्तीपुर रेलवे डिविजन में खगड़िया−सहरसा रूट पर धमाराघाट स्टेशन है, जिसके पास ट्रेन से कटकर 35 लोगों के मरने की पुष्टि हो चुकी है। सहरसा और खगड़िया के बीच धमाराघाट स्टेशन के पास यह हादसा हुआ, और सभी श्रद्धालु कात्यायनी स्थान मंदिर जा रहे थे। मरने वालों में 27 महिलाएं, चार बच्चे और छह पुरुष शामिल हैं।

जानकारी के अनुसार, राज्यरानी एक्सप्रेस (गाड़ी संख्या 12567) सोमवार की सुबह सहरसा से पटना जा रही थी। मानसी रेलखंड पर धमारा रेलवे स्टेशन के पास मां कात्यायिनी का एक मंदिर है, जहां पूजा के लिए लोग जमा थे। श्रावण माह के आखिरी सोमवार होने की वजह से बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं की भीड़ थी। वे मंदिर में जल चढ़ाने आए थे। यहां प्रसिद्ध सोमवारी मेला भी लगता है। लोग ट्रैक पार कर दूसरी तरफ मंदिर की ओर जा रहे थे। लोगों को किसी भी ट्रेन के आने की सूचना नहीं दी गई थी, इसी बीच अचानक राज्यरानी एक्सप्रेस आने से पटरी पर खड़े लोग इसकी चपेट में आ गए।

बिहार के अतिरिक्त पुलिस महानिदेशक (कानून व्यवस्था) ए. के. भारद्वाज ने इस हादसे में 35 लोगों के मरने की पुष्टि की है। स्थानीय सांसद दिनेश चंद्र यादव ने भी 35 लोगों की मौत की पुष्टि की है। मृतकों की संख्या बढ़ भी सकती है।

अपुष्ट सूचना के अनुसार, गुस्साए लोगों ने ट्रेन के एक ड्राइवर को पीट-पीट कर मार डाला है। इससे पहले लोगों ने दोनों ड्राइवरों को बंधक बना लिया था। बताया जा रहा है कि बदलाघाट और आस-पास के दोनों स्टेशनों के कर्मचारी डरकर भाग गए हैं।

घटनास्थल पर मौजूद अन्य लोगों ने ट्रेन में मौजूद ड्राइवर समेत बाकी स्टाफ की पिटाई की और ट्रेन की एक एयरकंडीशन बोगी को आग के हवाले कर दिया. ड्राइवर ने बाद में दम तोड़ दिया.इस हादसे के बाद लोगों में भारी आक्रोश है। गुस्साए लोगों ने ट्रेन के दोनों ड्राइवरों को उतार लिया और उनकी जमकर पिटाई की है। इसके अलावा भीड़ ने राज्यरानी एक्सप्रेस और यहां खड़ी एक और ट्रेन में आगजनी की। बताया जा रहा है कि राज्यरानी एक्सप्रेस के 4 डिब्बे जलकर खाक हो गए हैं।

कैसे हुआ हादसा:

हादसा बदला घाट और धमारा घाट के बीच हुआ है. इन दोनों घाट के बीच कात्यायनी मंदिर है, जहां आज सावन का आखिरी सोमवार होने की वजह से बड़ी संख्या में श्रद्धालु मौजूद थे.

घटना वाली जगह 3 ट्रैक हैं और हादसा बीच वाले ट्रैक पर हुआ. दरअसल अगल-बगल के ट्रैक पर खड़ी पैसेंजर ट्रेन से यात्री उतरकर ट्रैक पार कर रहे थे कि तभी अचानक राज्यरानी एक्सप्रेस आ गई.

रेल राज्यमंत्री अधीर रंजन चौधरी ने बताया है कि राज्यरानी की स्पीड 80 किलोमीटर प्रति घंटे थी. ब्रेक लगाने के बावजूद ट्रेन नहीं रुक सकी और हादसा हो गया.

अधीर रंजन के मुताबिक स्थानीय प्रसाशन से चूक की वजह से हुआ हादसा.

समस्तीपुर के डीआरएम अरूण मलिक ने बताया कि आक्रोशित लोगों ने पूरे स्टेशन को बंधक बना लिया है। उन्होंने 15 लोगों के मरने की पुष्टि करते हुए कहा कि मृतकों की संख्या ज्यादा भी हो सकती है। रेलवे ने मेडिकल रिलीफ वैन रवाना कर दिया है। उन्होंने कहा धमारा रेलवे स्टेशन पर सड़क मार्ग से पहुंचना मुश्किल है, सिर्फ रेल मार्ग से पहुंचा जा सकता है।

प्रभात रंजन झा

“शहीदो, हम शर्मिंदा हैं, क्योंकि ऐसे नेता ज़िंदा हैं!”

नीतीश बाबू के मंत्री भीम सिंह ने न सिर्फ़ शहीदों का अपमान किया है, बल्कि मीडिया का भी अपमान किया है। भीम सिंह जब भी मुंह खोलते हैं तो समझ में आ जाता है कि कितना पढ़े-लिखे हैं। पहले उन्होंने कहा- “जवान तो शहीद होने के लिए ही होते हैं न! सेना और पुलिस में नौकरी क्यूं होती है?” लब्बोलुआब यह है कि जवान शहीद होने के लिए होते हैं और नेता अपने सुख और सियासत के लिए उन्हें शहीद करवाने के लिए।

पत्रकार ने जब पूछा कि आप गए नहीं वहां? तो उनका जवाब था- “आपके बाबूजी गए थे वहां? आपकी माताजी गई थीं वहां?” मीडिया और पत्रकारों का अपमान करने वाले इस बयान का जवाब यह है कि उस पत्रकार के पिताजी और माताजी वहां गए या नहीं गए, लेकिन इतना तय है कि ऐसे घटिया नेताओं के मां-बाप जो भी जहां कहीं भी होंगे, आज ज़रूर अपने आपको कोसते होंगे कि हमने कैसी नालायक औलादों को जन्म दिया, जो उल्टे हमारी कोख को ही कलंकित करने में जुटे हैं।

जब विवाद बढ़ा तो नीतीश बाबू के निर्देश पर भीम सिंह ने इन शब्दों में खेद प्रकट किया- “तोड़-मरोड़कर परोसे गए बयान से भी जो देशवासियों को दुख पहुंचा है, उसके लिए मैं खेद प्रकट करता हूं।“ साफ़ है कि भीम सिंह अब भी अपने पिछले बयान का बचाव कर रहे हैं और चैनलों पर जो दिखाया जा रहा है और जिसे पूरा देश सुन रहा है, उसे वे तोड़-मरोड़कर पेश किया हुआ बता रहे हैं। यानी भीम सिंह को कोई पश्चाताप नहीं है। दूसरी बात कि वे सिर्फ़ खेद जता रहे हैं। माफ़ी नहीं मांग रहे। …और जब वे माफ़ी मांग ही नहीं रहे तो माफ़ी के काबिल कैसे हो सकते हैं? इसलिए नीतीश कुमार को चाहिए कि वे भीम सिंह को फ़ौरन अपने मंत्रिमंडल से बर्खास्त करें।

भीम सिंह जिस सरकार का हिस्सा हैं, उसी के लिए उन्होंने एक बार कहा था कि उसका कान ख़राब हो गया है। आज पूरी सरकार कह रही है कि उनकी ज़ुबान ख़राब हो गई है। ज़ुबान ख़राब। कान ख़राब। आंखें भी ख़राब, क्योंकि जवान इन्हें मरने के लिए बने हुए दिखाई देते हैं और जनता कीड़े-मकोड़ों की तरह दिखाई देती है। ऐसे नेताओं को वोट देकर संसद और विधानसभाओं में नहीं भेजना चाहिए, बल्कि इनके लिए चंदा इकट्ठा कर इन्हें अस्पताल में भेजना चाहिए।

और आख़िर में एक और सच्चाई पर से पर्दा हटा दूं। देशवासी तो इतने से ही परेशान हुए जा रहे हैं कि शहीदों को रिसीव करने पटना एयरपोर्ट पर कोई मंत्री क्यों नहीं पहुंचा या एक बेलगाम मंत्री ने उल्टा क्यों बोल दिया, जब आप यह सुनेंगे कि आरा में शहीद शंभू शरण की चिता को गोइठा (गोबर से बने उपलों) और किरासन तेल से जलाया गया, तो आपको कैसा लगेगा? क्या इसे ही राजकीय सम्मान कहते हैं? न चंदन की लकड़ी, न घी। बिहार की सरकार ने न तो कहीं कोई इंतज़ाम किया, न एक भी मर्यादा निभाई।

इसीलिए आइए, हम अपने मृतक जवानों को तो श्रद्धांजलि दें, लेकिन अपने ज़िंदा नेताओं के लिए भी शोक ज़रूर रखें, क्योंकि उनकी आत्मा-मृत्यु कब की हो चुकी है और इस लोकतंत्र में वे अपने शरीर को एक लाश की तरह ढोए चले जा रहे हैं। साल के तीन सौ पैंसठ दिन ऐसे नेताओं की तेरहवीं मनाई जानी चाहिए। शहीदो, हम शर्मिंदा हैं, क्योंकि ऐसे नेता ज़िंदा हैं!

साभार -अभिरंजन कुमार

मैं शोक में डूबा हुआ हूं

मैं शोक में डूबा हुआ हूं
मुझे इतना ज़्यादा शोक हो गया है कि
नींद नहीं आ रही
खाना नहीं पच रहा
मन बेचैन है
दिमाग ख़राब है।
शोक भुलाने के लिए
प्लेट में भुना हुआ काजू है
मुर्गे की टांगें हैं
और बोतल में शराब है।

शोक मुझे इसलिए नहीं है कि
छपरा में 23 संभावित लाल बहादुर शास्त्रियों को
खाने में ज़हर देकर मार दिया गया।
शोक मुझे इसलिए भी नहीं है कि
बगहा में एक छोटा जलियांवाला बाग बना दिया गया
और पुलिस ने छह लोगों को भून डाला।
इस बात का भी शोक नहीं है मुझे
कि उत्तराखंड की बाढ़ में
बहुत सारे जीते-जागते हंसते-खेलते इंसान
बिल्कुल लाचार मवेशियों की तरह
या यूं कहें कि पत्तों की तरह बह गए
और बहुतों का तो पता भी नहीं चला।

आख़िर इन मौतों का शोक मुझे क्यों होगा?
इन मौतों के लिए तो मेरे राज्य की विधानसभा भी शोकाकुल नहीं है
इन मौतों के लिए तो मेरे राज्य की सरकार भी शोकाकुल नहीं है
इन मौतों के लिए शोक प्रकट करके मैं अपनी गरिमा क्यों गिराऊं?
अपने को छोटा क्यों बनाऊं?
बड़े-बड़े लोग इन छोटे-मोटे लोगों को इंसान की श्रेणी में गिन लेते हैं
यही क्या कम अहसान है उनका?
वरना ये तो कीड़े-मकोड़े हैं
और कीड़े-मकोड़ों की मौत के लिए मैं क्यों शोक-संतप्त होने लगा?

मैं शोकाकुल हूं इसलिए
क्योंकि मेरे मुख्यमंत्री के पैर के अंगूठे में चोट लग गई है।
फ्रैक्चर हो गया है।
चोट भी ऐसी-वैसी नहीं
सीधे बोलती बंद हो गई आठ दिनों के लिए।
सोचिए अंगूठे की वह चोट कितनी भयानक होगी
कि आठ दिनों तक ज़ुबान न खुले।
आगे पीछे गाड़ियों के काफिले
सिक्योरिटी गार्ड्स के तामझाम
और डॉक्टरों की टीम की देख-रेख में
बुलेटप्रूफ कार में बैठकर भी
दो किलोमीटर तय करना मुश्किल हो।
मैं अपने मुख्यमंत्री को ऐसी भयानक चोट लगने के लिए शोकाकुल हूं।
आख़िर मेरा मुख्यमंत्री सही-सलामत रहेगा
तभी तो राज्य में “सुशासन” रहेगा।
विशेष राज्य के दर्जे पर भाषण रहेगा।
ग़रीबों के लिए सड़ा हुआ राशन रहेगा।

बच्चों का मर जाना कौन-सी बड़ी बात है
कि मैं उस पर शोक में डूब जाऊं।
यह भारत देश है
यहां एक बच्चे मरेगा, चार पैदा हो जाएंगे।
और ग़रीब तो ऐसे भी बच्चे पैदा करने में माहिर हैं।
इसलिए अगर मेरे राज्य की विधानसभा
छपरा में 23 बच्चों की मौत पर शोकाकुल नहीं है
अगर मेरे राज्य की सरकार
को बगहा में गोली से छह लोगों की मौत का अफ़सोस नहीं है
तो मुझे क्या पड़ी है ?

अभी मुझे अपने मुख्यमंत्री के पैर के अंगूठे की चोट पर शोक-संतप्त रहने दीजिए
और मारे गए बच्चों का ज़िक्र कर मूड मत ख़राब कीजिए।

साभार – अभिरंजन कुमार

मुझे कुछ कहना है

मुझे कुछ कहना है
____________________
मैँ सरकारी विद्यालय
सरकार द्वारा संचालित और पोषित…
प्रतिष्ठा और गौरव मेरा अतीत
मैँने ही जन्माया है उन तमाम
बुद्धिजीवियोँ को…
जो देखने लगे हैँ मुझे आजकल
नीची नजरोँ से…
मेरे द्वारा ही पुष्पित और
पल्वित हुए हैँ वे लोग
जिनसे हो रहा हूँ आज
उपहासित और अपमानित
उन्हे नहीँ पता कि कब का
कर दिया गया है मुझे बहिष्कृत
तथाकथित सभ्य समाजोँ से
और छोड़ दिया गया है मेरे हिस्से मेँ शोषितोँ,दलितोँ, वंचितोँ और गरीबोँ के बच्चोँ को…
भूखे शिक्षकोँ और चावल की पोटलियोँ को
बना दिया गया है मेरा एक अध्यक्ष जो
अनपढ, जाहिल और गंवार से ही चुना जाता है..
विकसित कर दिया गया है मुझे अनुदान वितरण केन्द्र के रुप मेँ
कुलमिला कर कहुँ तो
लूटा है सरकार और समाज ने
मेरी अस्मिता को
चारोँ ओर लगा दिये गये हैँ
मेरे दुश्मनोँ को
मेरा पुर्ननिर्माण कमीशन के विकेन्द्रीकरण के साथ जारी है
जाहिर है
थाली मेँ जहर तो मिलेगी ही
बंधु…
मैँ लाचार हूँ चुपचाप
अपनी दुर्दशा और दीनहीनता झेलते रहने के लिये
उफ..बहुत सफाई दे दी मैँनेँ
अनुरोध है हमारे अपने बुद्धिमान विद्यार्थियोँ से
कृपया मेरे बच्चोँ को खाना देने की जिम्मेदारी आप ही उठाएँ
शेष आपको बुद्धिमान बनाया है
तो इन्हेँ भी बना देगेँ
और हाँ…
मुझे गाली देना बंद कर देँ
वर्ना वर्ग संधर्ष झेलने को तैयार रहेँ…….. ये मेरी चेतावनी आपके नाम…

साभार : धनञ्जय  कुमार

पत्रकारिता के नाम पर फ्रॉडगिरी

पत्रकारिता के नाम पर फ्रॉडगिरी

पुण्य प्रसून बाजपेयी/ पत्रकार और पत्रकारिता के नाम पर कोई कितनी फ्रॉडगिरी कर सकता है। या फिर मौजूदा दौर में पत्रकारिता एक ऐसे मुकाम पर जा पहुंची है, जहां पत्रकारिता के नाम पर धंधा किया भी जा सकता है और पत्रकारों के लिये ऐसा माहौल बना दिया गया है कि वह धंधे में अपनी उपस्थिति दर्ज कराकर धंधे को ही मुख्यधारा की पत्रकारिता मानने लगे। या फिर धंधे के माहौल से जुड़े बगैर पत्रकार के लिये एक मुश्किल लगातार उसके काम उसके जुनुन के सामानांतर चलती रहती है, जो उसे डराती है या फिर वैकल्पिक सोच के खत्म होने का अंदेशा देकर पत्रकार को धंधे के माहौल में घसीट कर ले जाती है।

दरअसल, यह सारे सवाल मौजूदा दौर में कुकुरमुत्ते की तरह पनपते सोशल मीडिया के विभिन्न आयामों को देखकर लगातार जहन में उतरते रहे हैं लेकिन हाल में ही या कहें 20 जुलाई को देश के 50 हिन्दी के संपादकों/ पत्रकारों को लेकर एक्सचेंज फॉर मीडिया की पहल ने इस तथ्य को पुख्ता कर दिया कि पत्रकार मौजूदा वक्त में बेचने की चीज भी है और पत्रकारिता के नाम का घोल कहीं भी घोलकर धंधेबाजों को मान्यता दिलायी जा सकती है। और समाज के मान्यता प्राप्त या कहें अपने अपने क्षेत्र के पहचान पाये लोगों को ही धंधे का औजार बनाकर धंधे को ही पत्रकारीय मिशन में बदला जा सकता है।

दर्द या पीडा इसलिये क्योंकि राम बहादुर राय (वरिष्ठ पत्रकार), श्री राजेंद्र यादव ( वरिष्ठ साहित्यकार), श्री पुष्पेश पंत (शिक्षाविद्) श्री सुभाष कश्यप (संविधानविद) श्री असगर वजागत (वरिष्ठ रंगकर्मी), श्री वेद प्रताप वैदिक( वरिष्ठ पत्रकार) श्री निदा फाजली (प्रसिद्ध गीतकार व शायर) प्रो. बी. के. कुठियाला ( कुलपति माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय) श्री राजीव मिश्रा ( सीईओ, लोकसभा टीवी) श्री रवि खन्ना ( पूर्व दक्षिण एशिया प्रमुख, वाइस ऑफ अमेरिका), सरीखे व्यक्तित्वों की समझ को मान्यता देकर डेढ़ सौ पत्रकारों में से पचास पत्रकारों का चयन करता है। बकायदा हर संपादक की तस्वीर और नाम देकर प्रचारिक प्रसारित करता है। लेकिन जब चुनिंदा 50 पत्रकारों के नामों के ऐलान का वक्त आता है तो टॉप के दो पत्रकार दो अखबार के मालिक हो जाते हैं। और इन अखबार मालिक का नाम या तस्वीर ना तो उन डेढ सौ की फेरहिस्त में कहीं दिखायी देता है। और तो और जिन सम्मानीय लोगों को ज्यूरी का सदस्य बनाकर पत्रकारों को छांटा भी जाता है, उन्हें भी यह नहीं बताया जाता कि अखबार के मालिक पत्रकार हो चुके हैं या फिर दो अखबार के मालिक श्रेष्ठ पत्रकारों की सूची में जगह पा चुके हैं। असल में उन अखबार के मालिकों को नहीं बताया जाता है कि आप पत्रकारो की लिस्ट में सबसे उम्दा पत्रकार, सबसे साख वाले पत्रकार, हिन्दी की सेवा करने वाले सबसे श्रेष्ठ संपादक बनाये जा रहे हैं। जाहिर है यह महज चापलूसी तो हो नहीं सकती। क्योंकि धंधा चापलूसी से नहीं चलता। उसके लिये एक खास तरह के फरेब की जरुरत होती है जो फरेब बड़े कैनवास में मौजूदा पत्रकारिता के बाजारु स्तर को बढता हुआ दिखा दें। फिर पत्रकारिता की साख बनाये रखने के लिये पत्रकारों के बीच मौजूदा वक्त के सबसे साख वाले समाजसेवी अन्ना हजारे को बुला कर विकल्प की सोच और अलग लकीर खिंचने का जायका भी पैदा करने की कोशिश की जाती है।

लेकिन दिमाग में धंधा बस चुका है तो परिणाम क्या निकलेगा। यकीनन कॉकटेल ही समायेगा। तो जो अन्ना हजारे अपने गांव रालेगण सिद्दी से लेकर मुंबई की सड़कों पर दारु बंदी को लेकर ना सिर्फ संघर्ष करते रहे और उम्र गुजार दी बल्कि जिनके समाज सेवा की पहली लकीर ही दारुबंदी से शुरु होती है, उनसे ईमानदार पत्रकारिता का तमगा लेकर उसी माहौल में दारु भी जमकर उढेली जाती है। और तो और महारथी पत्रकारों को कॉकटेल में नहलाने की इतनी जल्दबाजी कि अन्ना के माहौल से निकलने से पहले ही जाम खनकने लगते हैं। हवा में नशे की खुमारी दौड़ने लगती है। अब यहां अन्ना सरीखे व्यक्ति खामोशी ही बरत सकते हैं क्योकि चंद मिनट पहले ही पत्रकारों से देश के लिये संघर्ष की मुनादी कर पत्रकारो को समाज का सबसे जिम्मेदार जो ठहराया। जाहिर है महारथी पत्रकारों की आंखों में उस वक्त शर्म भी रही लेकिन मेजबान की नीयत अगर डगमगाने लगी तो कोई क्या करे। और मेजबान को अगर समूचा कार्यक्रम ही धंधा लगने लगा है तो फिर वहा कैसे कोई पत्रकारिता, नीयत, ईमानदार समझ,मिशन,पत्रकारीय संघर्ष का सवाल उठा सकता है। यह सब तो बाजार तय करते हैं और बाजार से डरे सहमे पत्रकार ही नहीं ज्यूरी सदस्य भी इस कार्यक्रम पर अंगुली नहीं उठा पाते हैं कि उनके साथ धोखा हुआ है। हर कोई खामोश। और पत्रकारिता के नाम पर एक सफल कार्यक्रम का तमगा एक्सचेंज फार मीडिया के कर्ताधर्ता अपने नाम कर लेते हैं। फिर त्रासदी यह कि जिन पचास महारथी पत्रकारों के नाम चुने भी गये उसे दिल्ली के पांच सितारा होटल के समारोह के बाहर अभी तक रखने की हिम्मत एक्सचेंज फार मीडिया भी दिखा नहीं पाया है। समझना है तो एक्सचेंज4मीडिया के साइट पर जाइये और त्रासदी देख लीजिये। लेकिन हमारी आपकी मुश्किल यह है कि इस साइट पर जितने ज्यादा हिट या क्लिक होंगे, उसे भी वह अपनी लोकप्रियता से जोड़ लेंगे।

(यह लेख पुण्य प्रसून बाजपेयी जी के ब्लॉग http://prasunbajpai.itzmyblog.com/से साभार)

यूनिवर्सिटी की क़िताबों में ‘अल-क़ायदा’ की कविता पर विवाद

यूनिवर्सिटी की क़िताबों में ‘अल-क़ायदा’ की कविता पर विवाद
क्या भारत के किसी विश्वविद्यालय के पाठ्यक्रम में अल-क़ायदा के संदिग्ध चरमपंथी की कविता पढ़ाई जा सकती है
केरल की कालीकट यूनिवर्सिटी के पाठ्यक्रम में अल-क़ायदा के संदिग्ध चरमपंथी इब्राहिम अल-रुबैश की कविता ‘ओड टू द सी’ यानी ‘समंदर के लिए गीत’ शामिल की गई है.यह कविता यूनिवर्सिटी के बीए और बीएससी के छात्रों को पढ़ाई जा रही है.यूनिवर्सिटी ने इब्राहिम अल-रुबैश के बारे में लिखा है कि अल-रुबैश को अमरीका ने 2001 में पाकिस्तान-अफगानिस्तान की सीमा के नजदीक पकड़ा था जहां वो पढ़ाया करते थे.अल-रुबैश को जब पकड़ा गया तब वो एक तीन महीने की बच्ची के पिता थे.अल-रुबैश ने ग्वांतानामो बे की जेल में पांच साल बिताए. दिसंबर 2006 में अमरीका ने उन्हें रिहा करके सऊदी अरब भेज दिया था.सऊदी अरब ने 3 फरवरी, 2009 को संदिग्ध सऊदी चरमपंथियों की जो सूची जारी की उसमें अल-रुबैश का भी नाम था.अल-रुबैश की कविता ‘ओड टू द सी’ को ‘पोयम्स फ्रॉम ग्वांतानामो : द डिटेनीज़ स्पीक’ कविता संग्रह में शामिल किया गया था.ये कविता संग्रह 2007 में बेस्टसेलर रहा.ग्वांतानामो बे मानवाधिकार हनन के लिए बदनाम है .ये कविता 2011 में यूनिवर्सिटी के पाठ्यक्रम में शामिल की गई थी. बीबीसी ने जब कालीकट यूनिवर्सिटी के बोर्ड ऑफ स्टडीज़ के पूर्व चेयरमैन और अभी वायनाड के पझस्सी राजा कॉलेज में प्रोफेसर के राजगोपालन से बात की तो उनका कहना था, “जब कविता को पाठ्यक्रम में शामिल किया गया तब अल-रुबैश के अल-क़ायदा से रिश्तों के बारे में नहीं पता था, नहीं तो कविता को नहीं शामिल किया जाता.”वहीं यूनिवर्सिटी के बोर्ड ऑफ स्टडीज़ के मौजूदा चेयरमैन पी महमूद का कहना है कि कविता को पाठ्यक्रम में जारी रखने पर अगले महीने होने वाली बोर्ड की मीटिंग में फैसला किया जाएगा.हालांकि यूनिवर्सिटी में कुछ लोगों ने इस कविता का विरोध किया है लेकिन कोई भी खुलकर सामने नहीं आ रहा. ट्विटर पर ज़रूर कुछ लोगों ने कविता के विरोध में ट्वीट किए हैं.
बीबीसी ने इब्राहिम अल-रुबैश की कविता ‘ओड टू द सी’ का अंग्रेज़ी से हिंदी में अनुवाद किया है. पढ़ें पूरी कविता. समंदर के लिए गीत/ओ समंदर, मुझे अपनों की ख़बर दे/इन अविश्वासी लोगों की ज़ंजीरें न होतीं तो, कूद पड़ता मैं तुझ में,/ग्वांतानामो बे में क़ैदियों की स्थिति को लेकर काफ़ी चिंताएँ व्यक्त की जा चुकी हैं/
पहुंच जाता अपनों तक, या ख़त्म हो जाता तेरी बांहों में

तुम्हारे किनारे ग़म हैं, बंधन हैं, दर्द हैं और नाइंसाफी हैं.

तुम्हारा कड़वापन मेरे सब्र का इम्तिहान लेता है.

तुम्हारी ख़ामोशी मौत जैसी है, तुम्हारी लहरें अजीब हैं

तुम्हारी लहरों से उठती ख़ामोशी में छिपा है धोखा

तुम्हारी ख़ामोशी कोशिश करने वाले कप्तान को ख़त्म कर देगी

और डूब जाएगा मांझी भी

शरीफ़, चुप, अनसुना करने वाले और गुस्से से दहाड़ते

तुम अपने साथ मौत लाते हो

हवा परेशान करे तो, तुम्हारी नाइंसाफी जायज़ है

हवा ख़ामोश करे तो सिर्फ बहते जाते हो

ओ समंदर, क्या हमारी बेड़ियों से तुम नाराज़ होते हो?

ये मजबूरी है हमारी कि हम रोज़ आते और जाते हैं

तुम्हें पता है कि हमारा गुनाह क्या है?

तुम्हें पता है कि हम अंधेरे में धकेले गए हैं?

ओ समंदर, इस कैद में तुम हमें चिढ़ाते हो

हमारे दुश्मनों से मिलकर बेरहमी से हमारा पहरा देते हो

ये चट्टानें नहीं बतातीं कि क्या गुनाह किए गए?

क्या वो क्यूबा, हारा हुआ, नहीं बताता तुम्हें कहानियां?

क्या मिला तुम्हें हमारे तीन साल के साथ से?

समंदर पर कविता की कश्तियां; सुलगते सीने में एक दबी हुई आग

शायर के शब्द हमारी ताकत के अक्षर हैं

उसकी शायरी हमारे दर्द भरे दिलों के लिए दवा है

 

साभार : उपेन्द्र कश्यप

इनकाउटंर का दर्द

इनकाउटंर का दर्द
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थोड़ी देर पहले हमारे एक आईपीएस अधिकारी मित्र फोन आया था इशरत जहां फर्जी मुठभेड़ के सिलसिले में। उन्होने बातचीत के दौरान मुझसे कई सवाल किये जिसका में जबाव नही दे सका, उम्मीद है आप मुझे उनके सवाल के जबाव में मदद करेगे।
इन अधिकारी से मेरा कोई 10 वर्ष पूराना रिश्ता है। संयोग ऐसा रहा कि इनके साथ कई जिलो में साथ काम करने का मौंका मिला ये एसपी थे तो मैं पत्रकार लेकिन कभी भी मानवाधिकारी या फिर फर्जी मुकदमें को लेकर हमलोगो के बीच टकराव नही हुआ। जब भी मेरी जानकारी में ऐसा कुछ पता चला या फिर मैंने खबर चलाया तो 24 घंटे के अंदर कारवाई हो जाती थी।
लेकिन आज उनके कई सवालो का जबाव मेरे पास नही था सबसे बड़ी बात यह है कि यह सवाल वैसे पुलिस अधिकारी का है जो खुद मानवाधिकार और कानून को लेकर काफी गम्भीर है।इनका पहला सवाल था इशरत जहां इनकाउन्टर में जेल में बंद आईपीएस अधिकारी और इस इंनकाउटर में मारे गये चारो व्यक्ति के बीच पहले से कोई रंजिश थी क्या। दूसरी बात आईपीएस अधिकारी सौ आतंकी को मार गिराये वो सीधे डीजीपी नही बन सकता है ।ठिक है मैंने माना कि पकड़ कर चारो को मारा गया किसके लिए ।
गुजरात देश का एक मात्र राज्य है जहां आतंकी जाने से पहले हजार बार सोचता है पूरे देश में आये दिन आंतकी घटनाये हो रही हैं।आप लोग इनते डिवेट करा रहे है अब लोग इशरत को बिहार से जोड़ रहे हैं अगर पुलिस और सेना इस नजरिया से काम करने लगे तो कितने घंटे चैन से सो सकते हैं हमारे देश की जनता। सीमा पर सेना पड़ोसी मुल्क से फिस्किंग कर ले अंदर पुलिस अपराधियों से मिल जाये कितने देर अराम से रह लेगे।पुलिस पर तो आरोप क्या हर कोई कहता है चोर और अपराधी से मिला है। कहने वाले तो यहां तक कह रहे है कि पुलिस ही अपराध करा रहा है। तीन दिन थाना बंद करके देख लिजिए। समाज में इतना ही दम है तो चला कर देख लिजिए ।चोर को या अपराधी को पुलिस किसके लिए पिटता है पिटना गलत है मैं भी मानता हूं लेकिन हमारे पास पिटाई के अलावा कोई और व्यवस्था है जिससे किसी अपराधिक घटनाओ को सुलझाया जा सके ।
इतने जो लोग चीख चीख कर भाषण दे रहे हैं कभी वो पुलिस के थाने में जहां वो रात गुजारता है चले जाये एक दिन वो रह जाये तो मान जायेगे।फिर समाज के प्रबुद्ध लोगो से आग्रह है 5 घंटे थाना के कार्यकलाप में शामिल होकर देखे, टीवी में या फिर कारगिल चौक से भाषण देना आसान है।
पुलिस क्यों फर्जी इनकाउटंर करती है इस पर कभी सोचे हैं पुलिस के पास जब कोई विकल्प नही बचता है तब उसको मारता है किसके लिए अमन चैन देश में और समाज में कायम रहे। आप छोटा कोई क्रायम करिए जमानत लेने में हालत खराब हो जायेगा लेकिन वैसे अपराधी को जेल भेजिए आज गया और कल बाहर ।और बाहर निकलते ही क्रायम शुरु आप गवाही नही दिजिएगा कोर्ट तारीख पर तारीख देगा कैसे चलेगा व्यवस्था। पुलिस को गाली देने से समस्या का समाधान हो जायेगा। पंजाब के आंतकियों को क्या बातचीत से पटरी पर लाया गया।
केपीएस गिल के दहशत से पंजाब नियंत्रण में आया और बाद में क्या हुआ गिल के साथ काम करने वाले कई आईपीएस अधिकारियो को जेल जानी पड़ी कई ने तो आत्महत्या कर लिया। किसके लिए ठिक है उस दौर में कई निर्दोश लोग भी मारे गये लेकिन पुलिस के पास दशहत फैलाने के अलावे और कोई ट्रेनिंग नही दी जाती है जब स्थिति नियत्रंण से बाहर होने लगती है तभी पुलिस इस तरह के एक्सन में आती है। और इस दौरान कई निर्दोश लोग भी मारे जाते हैं।लेकिन शांति के लिए समाज और देश को इस तरह कि किमत तो चुकाना ही पड़ेगा।नही तो तैयार रहिए आ रहा है नक्सली अब हमारी बारी तो खत्म होने पर है।संतोष जी कभी नक्सलियों के खिलाफ चलाये जा रहे अप्रेशन के दौरान साथ चलिए फोर्स कितना टूट चुका है इसका एहसास हो जायेगा।फोर्स का मनोबल इतना गिर गया है कि कोई हमला होता है तो पुलिस लड़ने के लिए नही जान बचाने के लिए गोली चलाता है और तब तक गोली चलाता रहता है जब तक कि बच कर निकल नही जाता है। क्यों नही समस्या का समाधान हो रहा है। नक्सल इलाके में विकास नही हुआ इसके लिए पुलिस जिम्मेवार है क्या, जगंल का दोहन हो रहा है इसके लिए पुलिस जिम्मेवार है ,विकास गांवो तक नही पहुंचा इसके लिए पुलिस जिम्मेवार है ,जमीन के विवाद का हल नही हो रहा है, इसके लिए पुलिस जिम्मेवार है, देश में फैल रहे आंतकवाद के लिए पुलिस जिम्मेवार है क्या।जब हम जिम्मेवार नही है तो फिर मुझे इन समस्याओ के कारण उपजे आक्रोश को शांत करने की जिम्मेवारी क्यो दी जा रही है जब कि सबको पता है कि पुलिस का क्या काम है। हम ज्यादा परेशान हुए दिन का चैन और रात की नींद लूटी तो फिर हम वही करेगे जो इशरत के साथ किया गया । इसको कोई रोक नही सकता सारे सिस्टम को साथ मिलकर काम करने की जरुरत है और रही बात पुलिस को संतोष जी आप याद रखिएगा किसी भी राज सत्ता का प्रतीक पुलिस होता है और पुलिस को जिस तरीके से साधन विहिन रखा जा रहा है नुकसान उठाने के लिए तैयार रहिए। नये लड़के जो आ रहे हैं ना उन्हे कोई कमीटमेंन्ट नही है समाज ,व्यवस्था और देश के प्रति नौकरी छोड़ने में इन नये लड़के को वक्त नही लगता है। टाईलेन्टेंड लड़के आ रहे हैं उनसे आप ज्यादा कुछ करा भी नही सकते हैं कप्तान और खेलाड़ी दोनो का वही हाल है एमएम पास पुलिस बन रहा है ।उसको अपना डियूटी पता हो या न हो राईट जरुर पता है।पुलिस को आधुनिक तकनीक से लैंस करिए सुविधा दिजिए काम का बोझ कम किजिए मानवीय व्यवहार मिलेगा नही तो चलिए इसी तरह आरोप प्रत्यारोप चलता रहेगा। और एक समय बाद पुलिस वेतन लेगी और घर जायेगी लोग भुगतते रहेगे।
उस आईपीएस अधिकारी के परिवार के बारे में कभी सोचा है किसके लिए फर्जी इनकाउंटर किया ।पंजाब में एक दर्जन से अधिक आईपीएस अधिकारी या तो जेल में है या फिर सोसोईड कर लिया है किसके लिए पुलिस वालो की जमीन जोत लिया या फिर बहु बेटी का इज्जत ले लिया। सोचिए संतोष जी आने वाला वक्त बेहद मुश्किल होने वाला है। आपसे अपना दर्द इसलिए शेयर कर रहा हूं कि मुझे लगता है आप इस सच से समाज को अवगत करायेगे और लोगो में पुलिस के प्रति नजरिया बदलेगा। बाय चलिए आज मुलाकात होनी चाहिए साथ व़ृदावन का डोसा खाते हैं।

 

साभार : रंजू संतोष